अध्याय 39 : कुमार कार्तिकेय का जन्म
कुमार कार्तिकेय का जन्म और उनका तेज
ऋषियों ने अत्यन्त जिज्ञासा से पूछा – “हे सूत जी! तारकासुर नामक दैत्य ने देवताओं को अत्यन्त कष्ट पहुँचाया था। हमने सुना है कि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने ही उसका वध किया। उनका जन्म कैसे हुआ? किस प्रकार शिव-पार्वती के तेज से उनका प्रादुर्भाव हुआ? कृपया कुमार कार्तिकेय के जन्म की विस्तृत कथा सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “कार्तिकेय का जन्म केवल तारकासुर के वध के लिए ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण देव-संकट निवारण के लिए हुआ था। यह कथा परम पुण्यदायिनी है।”
तारकासुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि केवल शिव-पुत्र ही उसे मार सके। उसके अत्याचारों से त्रस्त देवता ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी ने कहा – “शिव-पुत्र तो अभी उत्पन्न नहीं हुआ है। तुम सब कामदेव की सहायता से शिव को समाधि से जगाओ और उनका पार्वती के साथ समागम कराओ।” देवताओं की प्रार्थना पर कामदेव ने शिव जी पर पुष्प-बाण चलाया। शिव जी का ध्यान भंग हुआ और उन्होंने क्रोध में अपना तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे कामदेव भस्म हो गये। किन्तु शिव का तेज पार्वती में प्रविष्ट हो गया।
देवकार्याय शम्भोस्तु तेजः स्कन्नं पुरातनम् ।
अग्निना सरिता नीतं कृत्तिकासु च गालितम् ।।
शरवणे ततो जातः कुमारस्तेजसां निधिः ।
षडाननो द्वादशभुजो देवसेनापतिर्महान् ॥
तेज का हरण और कृत्तिकाओं की गोद में पालन
शिव का यह तेज इतना प्रचण्ड था कि इसे कोई सहन न कर सका। पहले अग्निदेव ने इसे धारण किया, किन्तु वे जल गये। तब अग्निदेव ने गंगा जी को सौंप दिया। गंगा भी इसे न सह सकीं और उन्होंने शरवण (नरकुल के बन) में छः कृत्तिकाओं के पास रख दिया। उन छः माताओं के दूध से एक अद्भुत बालक प्रकट हुआ, जिसके छः मुख थे। छः कृत्तिकाओं के दूध पीने और पालन-पोषण के कारण उनका नाम ‘कार्तिकेय’ पड़ा। छः मुखों के कारण ‘षडानन’ और शरवण में जन्म के कारण ‘शरवणभव’ नाम पड़ा।
देवताओं का आगमन और सेनापत्य-अभिषेक
जब देवताओं को इस बालक के जन्म का समाचार मिला, तो वे ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र सहित शरवण पहुँचे। उन्होंने उस तेजस्वी बालक को देखा, जो बाल-सूर्य के समान प्रकाशमान था। सबने उसे देव-सेनापति पद पर अभिषिक्त करने का निश्चय किया। कार्तिकेय को देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र और वाहन भेंट किये – शिव ने शक्ति दी, विष्णु ने गदा, इन्द्र ने मयूर वाहन, अग्नि ने शक्ति-शस्त्र, सूर्य ने तेज आदि। मयूर पर आरूढ़ होकर कार्तिकेय ने देव-सेना का नेतृत्व ग्रहण किया।
मयूरवाहनं दृष्ट्वा देवाः सेनापतिं तदा ।
जयशब्दं प्रमुञ्चन्तः प्रणेमुर्दनुजान्तकम् ।।
कार्तिकेय-जन्म कथा का पुण्य-फल
सूत जी बोले – “जो मनुष्य कार्तिकेय के जन्म की यह कथा पढ़ता या सुनता है, उसके सन्तान-कष्ट दूर होते हैं और उसे पुत्र-प्राप्ति होती है। यह कथा शत्रुनाशक और तेजवर्धक है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥