अध्याय 30 : यज्ञों और दानों का माहात्म्य
यज्ञों और दानों का माहात्म्य
शौनकादि ऋषियों ने प्रार्थना की – “हे सूत जी! वेदों में यज्ञों और दानों की बड़ी महिमा गायी गयी है। ब्रह्म पुराण में यज्ञों और दानों का क्या स्वरूप बताया गया है? किस प्रकार के यज्ञ करने चाहिए? दान कब, किसे और किस वस्तु का करना चाहिए? इनका पुण्य-फल क्या है? कृपया हमें यज्ञ और दान का सम्पूर्ण माहात्म्य सुनाइए।” सूत जी ने कहा – “यज्ञ और दान ये दोनों धर्म के नेत्र हैं। यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं और दान से मनुष्य का हृदय शुद्ध होता है। दोनों ही स्वर्ग और मोक्ष के साधन हैं।”
यज्ञों के प्रकार और उनका फल
यज्ञ अनेक प्रकार के हैं – अग्निहोत्र, दर्श-पूर्णमास, चातुर्मास्य, पशुयज्ञ, सोमयज्ञ, अग्निष्टोम, वाजपेय, राजसूय और अश्वमेध। अग्निहोत्र प्रतिदिन प्रातः-सायं किया जाता है, जो घर को पवित्र करता है। दर्श-पूर्णमास यज्ञ अमावस्या और पूर्णिमा को किया जाता है। राजसूय यज्ञ केवल चक्रवर्ती राजा ही कर सकता है। अश्वमेध यज्ञ सब यज्ञों में श्रेष्ठ है, जिसे करने से सम्राट होने का गौरव प्राप्त होता है। यज्ञ में आहुति दी गयी सामग्री अग्नि के माध्यम से सूर्य तक पहुँचती है और सूर्य वर्षा करके अन्न उत्पन्न करता है – इस प्रकार यज्ञ सृष्टि-चक्र का आधार है।
अग्निहोत्रं च यज्ञानां गृहस्थस्य विधीयते ।
स्वर्गद्वारमपावृत्य यज्ञाः पुण्यतमाः स्मृताः ।।
अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो राजसूयस्तथैव च ।
यज्ञैर्देवाः प्रतुष्यन्ति वृष्टिं चाप्यनुमन्यते ॥
दान का महत्त्व और उसके नियम
दान सबसे श्रेष्ठ धर्म है। दान देने से मनुष्य का धन शुद्ध होता है और परलोक में उसकी गति होती है। दान तीन प्रकार का है – सात्विक, राजस और तामस। बिना फल की इच्छा के सुपात्र को उचित समय पर दिया गया दान सात्विक है। प्रत्युपकार की भावना से दिया गया दान राजस है। अपमान करके अयोग्य पात्र को दिया गया दान तामस है। सबसे उत्तम दान भूमि-दान, गो-दान, स्वर्ण-दान, अन्न-दान और विद्या-दान हैं। ग्रहण, संक्रान्ति, अमावस्या और तीर्थ-स्थल पर दिया गया दान अक्षय फल देता है।
दान का फल और श्रवण-माहात्म्य
सूत जी ने कहा – “हे ऋषियो! जो मनुष्य यज्ञ करता है और दान देता है, वह स्वर्गलोक में देवताओं के साथ आनन्द भोगता है। दान न करने वाला कृपण अगले जन्म में दरिद्र होता है। इस अध्याय का श्रवण करने वाला मनुष्य यज्ञ और दान दोनों का फल प्राप्त करता है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे त्रिंशोऽध्यायः समाप्तः ॥