अध्याय 18 : समुद्र और उसमें स्थित द्वीपों का माहात्म्य
समुद्रों का माहात्म्य और उनमें स्थित द्वीप
ऋषियों ने पूछा – “हे सूत जी! आपने सप्तद्वीपों और समुद्रों का उल्लेख किया था। अब हम विशेष रूप से उन समुद्रों के माहात्म्य और उनमें स्थित द्वीपों के रहस्यों को जानना चाहते हैं। समुद्रों में कौन-कौन से रत्न निवास करते हैं? वहाँ की अद्भुत वस्तुएँ क्या हैं? तथा उन द्वीपों में किन-किन प्रजाओं का निवास है? कृपया हमारी जिज्ञासा शान्त करें।” सूत जी ने कहा – “ये सातों समुद्र ब्रह्मा जी की सृष्टि-क्रीड़ा के अद्भुत उदाहरण हैं। प्रत्येक समुद्र का अपना एक द्रव्य है और उनमें अनेक रत्न एवं दिव्य प्राणी निवास करते हैं।”
सात समुद्रों का स्वरूप और उनके द्रव्य
सर्वप्रथम लवण समुद्र है, जो खारे जल का है और जम्बूद्वीप को घेरे हुए है। इसके बाद इक्षुरस (गन्ने के रस) का समुद्र, सुरा (मदिरा) का समुद्र, घृत (घी) का समुद्र, दधि (दही) का समुद्र, दुग्ध (दूध) का समुद्र और अन्त में शुद्ध जल का समुद्र है। ये सातों समुद्र एक-दूसरे को वलय के समान घेरे हुए हैं। प्रत्येक समुद्र अपने से पहले वाले समुद्र से दुगुना विस्तृत है। लवण समुद्र में अनेक रत्न, शंख, मोती और प्रवाल पाये जाते हैं। दुग्ध समुद्र तो भगवान विष्णु का निवास-स्थान है, जहाँ शेषशायी भगवान विराजमान हैं।
लवणेक्षुसुराघृतदधिदुग्धजलार्णवाः ।
सप्त सागररत्नाढ्याः द्वीपेषु परिवेष्टिताः ॥
समुद्र मन्थन और चौदह रत्न
लवण समुद्र के भीतर ही क्षीरसागर का एक भाग है, जहाँ देवताओं और असुरों ने अमृत-प्राप्ति के लिए समुद्र-मन्थन किया था। उस मन्थन से चौदह रत्न निकले – कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष, अप्सराएँ, देवी लक्ष्मी, वारुणी, चन्द्रमा, शंख, धन्वन्तरि अमृत-कलश लेकर, पाञ्चजन्य शंख और हलाहल। शिव जी ने हलाहल पीकर संसार की रक्षा की और विष्णु ने लक्ष्मी जी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
समुद्रों में स्थित प्रमुख द्वीप
लवण समुद्र में अनेक छोटे-बड़े द्वीप हैं, जिनमें लंका, शंखद्वीप, कुशद्वीप आदि प्रसिद्ध हैं। लंका का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था और यह कुबेर की राजधानी थी। दुग्ध समुद्र में श्वेतद्वीप है, जहाँ एकान्त भक्त निवास करते हैं। घृत समुद्र में हिरण्य द्वीप है, जो स्वर्ण से आच्छादित है। प्रत्येक समुद्र और द्वीप का अपना विशेष गुण और तपस्या-बल है। जो इनका स्मरण करता है, उसे समुद्र-यात्रा का पुण्य मिलता है।
क्षीरोदस्य समुद्रस्य मध्ये श्वेतद्वीपं शुभम् ।
यत्र नारायणः साक्षाद्वसत्यमिततेजसः ॥
समुद्र-द्वीप श्रवण का फल
सूत जी ने कहा – “यह समुद्रों और उनमें स्थित द्वीपों का माहात्म्य परम गोपनीय है। जो मनुष्य इस अध्याय का पाठ करता है, वह समुद्रतट पर किये गये दान-स्नान का पुण्य प्राप्त करता है और उसकी सम्पत्ति में अभिवृद्धि होती है। यह कथा सुनने से पितर तृप्त होते हैं और देवता प्रसन्न होते हैं।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे अष्टादशोऽध्यायः समाप्तः ॥