अध्याय 12: ययाति का चरित्र-वर्णन और सोमवंश की महिमा
अध्याय 12 : द्वादशोऽध्यायः
ब्रहापुराणमुं ७१
र्म्मकेतोस्तु दायादः सत्यकेतुमंहारणः। सत्यकेवुसुतश्चापि विभूर्नाम प्रजेश्वरः ॥५७॥
थानत्तंस्तु विभोः पुत्रः सुकुमारक तत्ततः। सुकुमारस्य पु्स्तु घृप्टकतुः सुधामिकः ॥५८॥
धृष्टकेतोस्तु दायादो वेणुहोत्रः प्रमेदवरः। देयुटोघसुतङ्चापि भार्गो नाम प्रजेश्वरः ॥५९॥
वत्सस्य वत्सभूमिस्तु भार्गभूमिस्तु भागंजः। एते स्वद्धिरसः पुत्रा जाता वतोऽय भावे ॥६०॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया ष्वदयास्त्रयः पुत्राः सहंस्श्चः। इत्येते काश्यपः प्रोक्ता नहुषस्य निबोधत ॥६१॥
इति श्रीब्राह्म महापुराणे सोमवंशे वृदक्षत्रपसूतिनिरूपणं भामेकादकोऽध्यायः॥ ११५॥
द्वादशोऽध्यायः
सोमनंशवर्णन भामुवंस-व्णेनम्
खोमहर्धंण उवाच
उत्पन्नाः पितुकन्यायां विरजायां महौजसः। नहुषस्य सु दप्यादाः पडिग्द्रोपसतेजसः ॥ १॥
पृति्ंयातिः संपातिरापातिर्यातिरेव च। सुयातिः पष्ठस्तेपां वै यातिः पार्थिवोऽभवत् ॥२॥
नामक प्रजेश्वर पुत्र हुआ। ५७ विभु के पुत्र वा नाम आतर्त और उसके पुत्र का नाम सुकुमार् था। सुकुमार दा पुत्र धृष्टकेतु बडा वामक थां॥५८॥ चुप्टकेतु का पुत्र वेणुहोत्र प्रजाओ का स्वामी हुआ। वेशुहोत्र दा पुत्र भागं नामक प्रजेश्वर हुआ ५९ वर वे" वत्खमूमि नामक पुत्र हुआ। मार्ग के पूवं का नाम मार्गेमूमि था। में अगिरा के पुव भृगु वश्च में उत्पन्न हुए ॥६०॥ ब्राह्मण, कषत्रिय आर व॑स्य--ये तीन पुर हजारो की सख्या में कुश्यप-वश में उदूमूत हुए। अब नहुप के वश को सुनिए ६१॥
श्री बहदमहापुराण के सोम-वद के वर्णन-प्रसग मे वृदक्षययमूति-निख्पण नामिक ग्यारहूवाँ अध्याय समाप्त ॥ ११)
अध्याय १२
ययाति का चरिम-वर्णन
लोमहु्पण ने कहा--"महातिजस्वी नहुप के इन दे समाव तेजस्वी छह पुव विरा नामन पितृकन्या से उत्पन हुए--यति, ययाति, सयाति, मायाति यतति गौरं छठा सुरादि १ उनमें सै ययाति राजा हुआ! १-२१ रस धर्मक ययाति ने भुतस्य क्री यो नामक कन्या को प्त किया। यति मल मे चित लगाकर ब्रह्मनिष्ठ मुनि वत ष्म ०र:। स्वविभुस्तु रख भर्गो। ३ख न्स्तुमर्गं०। क मूतिस्तु। ५ग॒मागंवात्। ईक शस्या अयौ पुत्रा-। ७ ख. «न्दोपेन्दते ०।
७२ चि दादसोऽध्यायः
ककुत्स्यकन्यां गां नाम सभ रमधार्कः। यतिस्तु मोक्षमास्थाय ब्रह्मभूतोऽभवन् भूनिः॥३॥
तेषां ययातिः, पञ्चाना दिलित्य वसुधामिमाम्। दैवयानोमुशनसः सुता भार्यामवाप सः ॥४॥
शाम्मिंप्ठामासुरीं चव तनयां वुपप््वेणः। यदुञ्च तुववसुञ्चेव देवयानी व्यजायत ॥५॥
दुह्य चातुं च प्पुरं च श्षमिमष्ठा वापपर्व्वणी। तस्मे , श्र ददी प्रीतो स्थं परमभास्वरम् ॥६॥
मद्भदे काश्चन्, दिव्यं दिव्यैः परमवाजिसिः। युत प्मनोजवेः शुच्चेपेंद कायं समुदरहुन् ॥५७॥
स तेन रथमुख्येन, धड़त्रेणाजयन्महीम् । प्ययातिमुंधि दपस्तथा देवान् सदानवान् ॥८१॥
स॒ रयः "कौरवाणां तु सब्वंधामभवत्तदा। सेवत्तेवसुनामस्तु कौरवाज्जनमेजयात् ॥९॥
कुरोः पत्रस्य राजेखराज्तः पारिक्षितस्य ह! जगाम स रयो नाकं श्लापाद्भर्मस्य घीमतः ॥१०॥
गर्गसय हि सूतं बालं स राजा जनमेजयः। फालेन, हिसयामास ब्रह्महत्यामवाप सः॥११॥
स रूोषान्धो सर्जापिः परिधादधितस्ततः। पौरजानषदेस्त्यवतो न लेनें शाम फहिचितू ॥१२॥
ततः स दुःखसन्तप्तो नालभत्संबिंदं क्वचित्। पयिमेन्ं घीनक राजा शरण प्रत्यपद्यत ॥१३॥
याजयामास चं ज्ञानी शौनको जनमेजयम् । अइवमेषेन राजानं पावनायं द्विगोत्तमाः॥१४॥
स॒ लोहगन्धो स्यनदात्तस्यादभूथमेत्य ह्। सं च दिव्यरथो रातौ वश्षवेदिपतेस्तदा ॥१५॥
दत्त: शपफेण पुष्टेन लेमे तस्माद्वृहद्रयः! यृहद्धास्यमेभव गतो माहं नृपम् ॥१६॥
भेया। ययानि ने पावो म्यो की गुध्वी को जीतकर घुकाचायें की देवयानी नाम कन्या से विवाद विदा ॥१७-१८॥
पश्चातू उने वृषपर्वा नाभव खथ वी पनिष्ठा नामकं पुत्री वो पत्नी बनाया । यदु और तुमु नाथव दो पुव देदयानी से उसब्र हए ।
दर्मिप्टाने दुह्य, अनु मर पुर नामव पुत्रो वो उत्यप् सिया ययाति को षद ने ग्रहो भने वेग थे उमा वैय वाले तयः पद रग दाते दिष्य घोड़ी से युच्च आर परम प्रकार से सुशोमित सुदर्ण-निमित स्य दिया॥
उठ रथ से पुद्ध में अजय यपाति ने छह रात्रि में देवता मौट् र्ठ खदित शपूर्ण पृथ्वी को मौत छिपा ॥१९॥। संवर्ददतु नमक षड् रष बुर्दशियो दे पास रदा। परन्तु महाराज परीधित बे पुर--जनपमेजप देः समय बहू रप महात्मा गे के शाप से नष्ट हो गया॥२०-२१॥।
बदादितू राजा जनमेजय दवारा यणं थे पुरी हत्या हो जाने से उसे बहाइत्या भा दोप स्य गया परह) तय लोह-गरप से युक्त राजा जनमेजय इघर-उपर मांगने लगा। जनता में उता परित्पाग र दिया। उसे दही मी शान्ति नहीं मिल रही थी ॥२२॥।
सत्वं अशान्त, शन्तप्त राजा विद दोनर थे पास गया) बाण -खेष्ठ जाती धौनव ने राजा जनसेजय को पवित बने के एर् उससे मदमे यम जाया ॥२३॥।
यशाल में राजा बय लोट्नगस्प न्ट हो भया। उय समय दनद मे संतुष्ट होरर पटी दिम्यरष रजरा चेदिपतिं (पियाल) को दे दिया। उससे बुहुदप से प्राप्त पिया पे ऋमथ वह् रप बुहदप के हाथ थे बाईडप (गरदप) नामक राजा के हाथ से पडा ॥२४॥।
तब शुददरी सीम ने जराषन्ध को सारइर यहीं उत्तम रष हक ये पर एस ०म्। सयारदारय कार्य से नतचदिस्य । व मनोरम! ॥२५॥। न्न दिग्यवेन अनाम् मविरेरेमोटारारइ० ॥२६॥। दश रप दिप्ेदद। ॥२७॥।
श्रहपुराणम् *७३
ततौ हत्वा जरा्न्वं भीमस्तं स्थमुत्तमम् । प्रददौ वासुदेवाय श्रौत्या कौरवनन्दनः ॥१७॥।
सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृथ्वीं ससागराम् ! "विभज्य पञ्चधा राज्य पुत्राणां नाहुषस्तदा ॥१८॥।
यथापिदिश्व पूर्वस्यां यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत् । मध्ये भुं च राजानमम्ययिञ्यत् स्र नादुपः ॥१९॥
अनिदिष्टा भया मिक्षा ब्राह्मणस्य प्रतिभुता। अनपाकृत्य तां राजन ग्रहीष्यामि ते जराम् ॥२६॥
जरायां बहवो दोषाः पानभोजनकारिताः। तस्माज्जराम् न ते राजन् ग्रहीतुमहमुत्सुहे ॥२७॥
सन्ति ते बहवः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप। प्रतिग्रहीतुं धर्मम् पुत्रमन्यं वृणीष्व वे ॥२८॥
स एवमुक्तो यदुना राजा कोपसमन्दितः। उवाच वदतां श्रेष्ठो ययाहिर्गृहीत्य सुतम् ॥२९॥
ललित
भरीतिपूके वासुदेव (इष्ण) को दिया ॥१६-१७॥
ययाति में मुद्र खित सात दीप बाली इस पृथिवी को जीतकर इसके पाँच साथ करके पुनः कट दिया ॥१८॥ नृप-युत्तर पयाति थे पूर्व दिया में ज्येष्ठ पुत्र यदु को नियुक्त किया।
मध्य देश में राजा पुरु का अभिषेक क्रिया और दक्षिण दिशा का राज्य तुसु को दिया ॥१९॥
एवं आजकी नगर सहित इय सप्तद्वीपा पृथ्वी का अपने-अपने प्रदेश में धर्मपूर्वक प्रतिपालन कर रहे हैं। मुनिवर! उनकी प्रजा में वा वर्णन आगे चलकर वर्णूंगा ॥२०-२१॥
धनुष शौर बाणो को त्याग कर पांचों पुरु-पेष्ठ पुत्रो को सब मार सौंप कर राजा यथातिं वृद्धावस्था वी प्राप्त हुआ ॥२२॥
अस्मो कांग त्याग कर अजेय राजा ययातिं प्रसन्नता से पृथ्वी बा परिभ्रमण करम लगा ॥२३॥
इस अकार पृथिवी कय दिमाग वरखें' ययाति ने अपने पुत्र यदु से कहा--
शव { भेरी वृद्धावस्था को ग्रहण दरो। मैं अपना बुढ़ापा तुम्हें दर तुम्हारी युवावस्था को स्वयं लेकर कायन्तिर से इस पृथ्वी पर विचरण करूंगा।
पिता भी यात सुनकर यड न उत्तर दिया ॥२५-२६॥
यदु बोला--अपने अपराध्य मिन्ना देखे वे' लिए एव ब्राह्मण से प्रतिन्ता वी थी। राजन्। उसकी पूति क्रिएं विना मैं माप्का बुढ़ापा प्रण वहीं कर सकता ॥२६॥
राज्। खाद्य-यान से उत्पन्न भनक पार क रोग वृद्धावस्था में होते हैं। इरि में उसे ग्रहण करने का उत्साह कटो दिखा सकता ॥२७॥
मुझसे बढ़कर प्रिय माते अनवर पुत्र हैं। है प्रभो! उनमें से किसी को माप उसकी जवानी लेने मे' लिए चुन ले ॥२८॥
यदु के इस प्रकार कहें पर राजा कुपित हुआ। वकताओं में श्रेष्ठ ययाति ने पुर की भर्त्ता बसे हुए मद्यापारस्।
शख ण्ज्यस्वतदारा०। २ग पुरू! १०
॥ द्रदस्यऽष्यायः ॥
ययातिश्वाच ॥
{क {माश्रमस्तवान्योऽस्ति को दा, धर्म्मों, विधीयते। मामनादृत्य वरदे यदहं तव देशिकः ॥३०॥
एवमुद्वा यदु विप्राः शदाषेनं स सन्युमान्। अराज्या ते प्रजा मूढ भवित्रीति न' संशयः ॥३१॥
हय् च तुव्वंस: चैवाप्यनुं च दिणसत्तमाः। एवसेंवाब्रवीड्राला परत्याद्यातवच तैरपि ॥३२॥
शशं तानतिष्ुढौ ययातिरपराजितः। ययावत् कथित स्वं मयास्य द्विजसत्तमाः ॥३३॥
एवं दाप्त्या सुतान् सर्व्वाइचतुरः "पुरुपूर्वजान्। तदेव वचनं राजा परदमप्याह भो द्विजाः ॥३४॥
तर्णसतव शूपेण चरेयं पृथिवीमिमाम्। जसां त्वपि समाध
कमोड मैं तुम्हारा गृह है २०॥
विप्रवन्द ऐसा कहकर प्रोषी राजा से यदु को शाप दिया—"मूखे तेरी प्रजा राज्य रहित होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।" हौ द्विजवद! राजा ने इसी प्रकार तुर्वसु और अनु से भी कहा और उन लोगों ने भी शाप अस्वीकार वर दिया ॥ ३२॥
डिज श्रेष्ठ अजेय ययाति ने भी अन्त कोच में आकर उन को भी दही दाप दिया।
परन्तु इस बारे में मैंने सब कुछ यथार्थ कहा ॥३३॥ पुर से ज्येष्ठ चौर पुत्रों को इस तरह शाप देकर राजा ने पुत्र पुष्य से कहा—"युवा। यदि तुम स्वीकार करो तो मैं अपनी बुढ़ा तुम्हें दे दूं और तुम्हारी युवावस्था को प्राप्त करके मैं पृथ्वी-महत्ता का चक्कर लगाऊँ॥ देर-रे५॥
प्रतापी दुवे पितृता की बुढ़ाई ले लो। ययाति ने पुत्र को सौंप लेकर पृथ्वी पर विचरते हुए ॥३६॥
कामो का अन्त बर्सो से के विकार से राजा ययाति विवाचः वेः सयु चैव नामक वन में रमण करने लगा ॥ ३७॥
परन्तु जब कामु योग से वह तृप्त नहीं हुआ, तब उसने पुत्र से अपनी युवावस्था की लेकर उसकी जवानी लौटा दी ॥३८॥
मुन्यिप्टो। उस समय राजा ययाति ने गायाएँ गोरे, जिन्हों सुनकर मनुष्य भोग को उसी प्रकार सदुचित वर ले जिस प्रकार बूथ अपने अगा को सब आए ये मेद लेता है॥३९॥
यदा भावं न कुरते सर्व्वमूतेषु पापकम्। कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥४२॥
तदा तेभ्यो न विभेति यदा चास्मान्न चिम्यति। यदा नेच्छति न दवेष्टि ब्रह्य सम्पद्यते तदा ॥५४३॥
या दृस्त्यनादुम्म॑त्तिभिर्या न जीवति जीर्यतः। यो सौ प्राणान्तिको रोगस्तां तृष्णां त्यजत सुखम्। भ४४॥
जीर्यन्ति जौय्य॑तः फेण दन्ता जीर्न्ति जयतः। धनाज्ञा जीवितादया च जौय्येतोऽपि न जीवंति ४५॥
यच्च फामसू्खं सोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्। तृष्णाक्षयसुखस्येते नार्हन्ति पोडदीं कलाम्। पथ॥
एवमुक्त्वा स राजा सदारः भाविद्द्वनम्। काकेन महताः चायं चचार विपुलं तपः॥४७॥
भृगु तुङ्गे, गतिं श्राय तयसोऽन्ते सहाय्य। "यनदनम् देहम् त्सुज्य सदारः स्वर्गमाप्तवान् ॥१४८॥
तस्य वदो मुनिष्ेष्ठाः पञ्च राजपिसत्तमाः। ये्याप्ता पृथिवी सर्वा सूर्य॑स्येव गभस्तिभिः ॥४९॥
यदोस्तु वदं वक्ष्यामि धृणुष्वं राजसत्दतमू। यत्र नारायणों भन्ने हरिदृष्णिकुलोइहुः ॥१५०॥
सृस्य प्रनावानायुष्मान् कोत्तिमाईच भवेन्रर। ययातिचरितं नित्यमिदं शृण्वन् द्विजोत्तमा ॥ ५१॥
॥ इति भोग्राह्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरितनिटपणं नाम द्वादशोऽप्यायः ॥ १२१ ॥
पाप-सावना सही होती, घटी ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥४२॥ जो विषी से इष्टता है, न उसी से कोई रहता है, न कुछ चाहता है और न किसी से दोष करता है, वह ब्रह्म में लीन होता है ॥ ४३॥
जो तृष्य दुबुद्धिवालों से दुन्त्य-ज्य है, वृद्धावस्था के साथ वृद्ध नही होती और प्राणो का नास करने वाली रोग है, उस तृष्णा को त्यागने से सुख मिल्दराहै क्र दारीर ने ज
को पिरणो से वह व्याप्त रहती है
राजाओं से यावत् यदु का वंश मैं वहाँ, जहाँ वृद्धि और दान नाद।।४९।।
यथा अदपीर्ण हुए चे
आप लोग सुनें। द्विज। जो व्यक्ति इस ययातिवंश का निय श्रवण करेंगा,।।४०।।
यद् स्वर्थ, प्रजावान्, आयुष्मान् और कीर्तिमान् होगा
है।।
श्री ब्रह्मांडपुराण में चन्दवंशवर्णन प्रकरण में यपानि चरति निरूपण नामक वार्ता अध्याय समाप्त शरद।
रेल चापि ग दायएपि। ट्स ग रगे तप्रयैत्वात् धनाशङ् चरित्या हु स०।।