अध्याय सूचकांक 13 कुल

1. अध्याय 1: ब्रह्म पुराण का मंगलाचरण, नैमिषारण्य का वर्णन और सूत-ऋषि संवाद 2. अध्याय 2: स्वायम्भुव मनु की वंश-परंपरा और शतरूपा की तपस्या 3. अध्याय 3: देवदानवोत्पत्ति-वर्णनम् - देवता, दानव और अन्य प्राणियों की उत्पत्ति 4. अध्याय 4: पृथु से लेकर सभी देव-दानवों के राज्याभिषेक का वर्णन 5. अध्याय 5: मन्वन्तरवर्णन - सभी मनुओं और उनके युगों का विस्तृत विवरण 6. अध्याय 6: सूर्य की उत्पत्ति का वर्णन (आदित्योत्पत्ति-कथनम्) 7. अध्याय 7: सूर्यवंश वर्णन - इला की कथा और मनु के पुत्रों की कहानी 8. अध्याय 8: सूरयेवश वर्णन - सत्यव्रत की तपस्या और वशिष्ठ का आशीर्वाद 9. अध्याय 9: चंद्रवंश-वर्णन और सोम की उत्पत्ति का विवरण 10. अध्याय 10: पुरूरवा की कथा और चन्द्रवंश का वर्णन 11. अध्याय 11: देवासुर-संग्राम, रजि की वरदान-विजय और ब्रह्मा का शस्त्र-उपदेश 12. अध्याय 12: ययाति का चरित्र-वर्णन और सोमवंश की महिमा 13. अध्याय 13: पुरु वंश का विस्तृत वर्णन और राजकुल का इतिहास
Brahma Purana • अध्याय 4

अध्याय 4: पृथु से लेकर सभी देव-दानवों के राज्याभिषेक का वर्णन

अध्याय 4 : चतुर्थोऽध्यायः

ब्रह्मपुराणम्‌ २९

मा रोदीरिति तं शक्र धुनःष्ुनस्याश्नवीत्‌ । सोऽभवत्‌ सप्तधा ग्॑स्तमिष्रो स्पितः पुनः ५१२०

एककं सप्तधा चरेः वच्चेभेदारिकषयंणः। मरतो नाम ते देवार वभूवृष्टिजसत्तमाः ॥ १२९॥

यथोक्तं दै मधघदता तथैव मरुतोऽभवन्‌ । देवाश्चैकोनपञ्ाशत्सहापा वच्रपाणिनः ॥ १२९५

तेषामेवं प्रवृत्तानां भूतानां द्विजसत्तमाः। रोचयन्‌ वै गणश्रेष्ठानु देवानाममितोजसाम्‌ ॥ १२३५

निकायेषु निकायेपुरहुरि: भरादात्‌ प्रजापतीन्‌ । चमशस्तानि राज्यानि ृथुपूव्वाणि भो द्विजा. १२४0

स हरिः पुस्ो बोर: कृष्णो निष्णुः प्रजापतिः। पजन्यस्तपनोऽ"्नन्तत्तस्य सरमवमिदं जगत्‌ ० १२५१

भूतसरमनिमं सम्यगुजानतो द्विजसत्तमाः नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कु तः॥ १९६

इति श्रीबाहों महापुराणे देवसुराणामुत्पत्तिकथन नाम तृतीयोऽध्यायः ६0

चतुर्थोऽध्यायः

पृथूमारभ्य सवंदेवदानवादीना राज्याभियेक-वर्णनम्‌ १५६१

लोमहुपंण उवाचं

अमिविच्याधिरजेदरः पृथुं चन्यं पितामहुः। ततः क्रमेण राज्यानि व्यदिषटुमुपचक्तमे ॥ श

कषु) रोने लगा ५११९१ स्तर > उससे कलश रोओ।' उस यमं वे' सात मांग हो गये। चनु को दमन क्ले

वाले इन दे प्रोध करके बज ही से एक एक वे" सात सात दुक कर दिये॥ १२५] विप्रवर्य वे मप्त्‌ (वायु)

नामने देवता टृ इस १0 जैसे इस्द्र ने वहा, बैसी हो वे उनचासों वायु देवता द के सहायक बन गया रेत

द्िजवर्य इम प्रकार उत्पन्न हए प्राणियो तया अत्यन्त तेजस्वी देवत्ताओ के" समूह व प्रसत करन दाले हरि न

राजा गृथु के बाद के राग्डाकौ प्रत्येक समूह में प्रजापतिया को दे दिया ॥१२३-१२५ा द्विजवर ! वही हरि

पुरुष, दौर, ढूप्ण, जिप्ण, प्रजापति मव, सूयं और अनस्त (शेप) कहलाता है। उससे यह सपूर्ण जगत्‌ उत्पस हुआ है) चद जो व्यक्ति इस प्राणिष्टित्ते जानता है, उस्का फिर जन्म नहीं होता, परठोक वी सो उस भय ही

बयां है? ॥१२६॥

श्री बहममहापुराण में देदना नार राक्षस का उत्पत्ति कथन नामक तीसरा अन्याय समाप्त ॥दे।

अध्याय ४

पृथु से लेकर सभी देव-दानवों के राज्याभिषेक का वर्णन

छोमहपेण घोले--बेन मे पत पद्‌ वा राज्याभियेक कर बरहम तम से राज्यों का वितरण करने सगे 0१)

शष्‌ प्नरवत्वह। एल बाला दे व हरिम हवि | ४ व ०पतिसु। ऋ० | गे ०पति। केस घुस

पद्टा स्यवत कृष्णं शं०। धग ऽनो व्योनरत०। ७ व सच ८ व अप्यापयक्थ रा०। ९ ग॑ शच्या दिरा०।

द्विजानां वीरया चैव नक्षत्रग्रहयोस्तथा। यज्ञानां तपसाँ चैव सोमं राज्येऽभ्धपेचयत्‌ ॥२॥

अपां तु वरुण राज्य राज्ञां वैश्रवणं प्पतिमू । आदित्यानां तया विष्णुं वसुनामथ पावकम्‌ ॥३१

प्रजापतीनां दक्षं तु मरतामथ वासवम्‌ । दैत्यानां दानवानां वं प्रह्वादममितोजसम्‌ ॥॥४॥

वैवस्वतं पितणाञ्व॒ यमं राज्येऽभ्यष

सर्व्वमूतपिदाचाना गिरोश शूलपाणिनम्‌ । श्ौलानां हिमवन्तजच नदीनामथ सागरम्‌ ॥ ६॥

भंधर््वाणामधिपतिं चे चित्ररथं प्रभुम्‌ । भमाना वासुकिं चरे सर्पाणामय तक्षकम्‌ ॥ ७॥

वारणानां हु राजानमेरावत्तमथादिशत्‌ । उच्चेंवससदवालां मदडल्चैव पक्षिणाम्‌ ॥ ८॥

भूृमाणामय शाद्दूरं सोवृषन्तु भवा पतिम्‌ । घनस्पतीनां राजानं प्लक्षमेकाम्यपेचयत्‌ ॥ ९॥

एवं विभज्य राज्यानि सकरमेणेवे पितामहः । दिलों पालानथ ततः स्थापथामससं प्रभु ॥ १०॥

पर्वस्या दिशि पुत्रं तु यैराजस्य प्रजापतेः । दिश' पां सुधम्वानं राजानं सोऽस्यपे चयत्‌ ॥ ११॥

दक्षिणस्या" दिशि तथा कर्दमस्य प्रजापतेः । पुत्रे 'श्भपदं भाम राजानं सोऽभ्य चयत्‌ ॥ १२॥

परिचमस्या दिशि तथां रजसः पुत्रमच्युतम्‌ । केतुमन्तं महारमानं राजानं सोऽभ्यपेचयत्‌ ॥ १३॥

तथा हिरण्यरोमाणं पञ्जेन्यस्य प्रजापतेः । उदोच्यां दिति दुद्धंप॑ राजानें सोऽभ्यपे चयतु ॥ १४॥

तैरियं पृथिवौ सर्व्वा सप्तद्वीपा सपत्तना । यथाप्रदेशमद्यापि धर्मेण प्रतिपाल्यते ॥ १५॥

राजसूयाभिषिवतस्तु पृथुरेतेर्नसधिषेः । वेददृष्टेन विधिना राजा र्ये नराधिपः ॥ १६॥

ब्राह्मण, त्रा, नक्षत्र, ग्रह यक्त रौर तपस्या के राज्य में उन्दरान सोम को अमिषिक्त किथा ॥ २॥ जख का राज्य वस्ण को दिया स्र कुवेरकोराजाभा बा स्वामी बनाया ! विष्ण को जादित्या का राजा, भन्नि को वसुझो का, दक्ष को प्रजएपतिय का, इन्द को मस्त बा और अत्यर्त सेजस्वी प्रह्लाद दो दत्यो अर दानवो था, सूपंपुतर यम को पितरो का तथा यक्ष, राक्षस राजा, सम्पूर्ण मठ और पिशाचों का स्वामी झूलपाथि महादेव जी को बनाया ॥ १३॥ हिमालय को पहाड़ों का राजा, समुद को नदियों का, चितरथ को गन्वर्वों का, वासुवि को तागों का, तक्षक को सापो का, ऐरावत हाथियां का, उच्चै गवा को घोडो का, गत्ड को पक्षियों का, बाघ को मृंगी को, बैठ को गौओ का अर वरदको वनश्पतिया का राजा बनाया ॥ ६॥

इसे प्रकार अेमश राज्याको विकर मभू ब्रह्मा ने दिशाओं की स्थापना की ॥ १०॥

पूर्व दिशा का र'जा वैराज प्रजापति के पुत्र सुधन्वा को बताया ॥ ११॥ दक्षिण दिशा मे कदम भ्जापतिके धुन झखपद को राजा तनाय है पश्चिम दिशाका राजा रजस्‌ दे पुम महात्मा केतुमान्‌ को बनाया ॥ १३॥ अर उत्तर दिशा मे पर्जन्य प्रजापति दे' पु+ प्रचण्ड तजरवी हिरिण्यरीमा वो राजा बनाया पणो! उन राजाओं दवारा अब तक्‌ सातो द्वीप, नगर और प्रदेश सहित इस पृथियीं का धर्मपूवक पालन हो रहा है

इन राजाओं च राजसूय धाय स अभिपिक्त पृथुक वेद में वतलाये हुए विधान के अनुसार राजा बनाया ॥ १६॥

१्ग अपि) रक भ्मुम्‌। इक गे. ०्मेण प्रपि०। वः से र्स्मा महात्मान ब०। ५ यरः दास्वप्रद। ६ श्ूयेऽमि०) ७क. ष शजराण्।

ब्रह्मपुराणम्‌ २३

ततो मन्वन्तरेऽतीते चाकषुपेऽमिततेजसि । वैवस्वताय मनवे पुधिर्या राज्यमादिश्नत्‌ ॥ १७॥

तस्थ विस्तरमाख्यास्ये मनोवविस्वतस्य ह! भ्भवतां चानुकूल्याय यदि श्नोतुनिहेच्छय | महदेतदधिष्ठानं पुराणे त्दधिष्ठितम्‌।

सुनय ऊचुः

नाशुचेः क्षुद्रमनसो नाश्ठिष्यस्यान्रतस्य च॥११॥

कौर्तयेयमिर धिप्राः कृतघ्नायाहिताय च॥२५॥

स्वर्यं, यददास्यमायुष्य धन्य वेदश्च प्षम्मितम्। रहस्यमूपिमि भ्रोवतं श्णुध्व वे य थातयम्॥१२६०॥

यदचेमे, कोत्तयेनित्यं पुथोवष्यस्य विस्तरम्। ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य न स ज्ञोचेत्क़ ताझृतम्॥२७॥

इसके अनतर अत्य तं तेजस्वी चुप भवन्तर वीत जाने पर वैवस्वत मनु को पूथिवी का राज्य चलाने मे रिए ब्रह्मा थे अदिश दिपा॥१७॥ यदि जाप सुनना चाहेंगे ता उस वैवस्वत मन्, क्य विस्तृत वर्णन में आप जागो के कल्याण थे लिये कहूंगा। यह मान् चरित्र पुराण मे चित्रित त्रिया गया है॥१८॥।

मुनियो ने कायं रमये। पृथु की जन्म कया का विस्तृत बर्णन कीजिये। जिस प्रकार उस महामा ने इस पृथिवी का दोहन किया, या यम गजाओआ मे दंदताओ महर्पिया दैच्या मे, नागा यक्लाने, बुक्षो ने, पहाड़ों ने, पिश्चाचाने गयवों थे, दिजवरों म और महापरादपी राक्षसः न पूथिवी का दृहा उनकी मित्र मिन्न पात्रा को, बछडों तथा दुको और दृह वाला को त्रमदाः वतलाइये॥१९ २०॥ मगवन प्रे जिस कारणे भुद्ध होवर महपिया ने वेण के हाथ वा मथन दिया था वह कारण भी बतलाइये॥२

लोमहर्षण घोलें--ब्रा्मणश्रेष्ठो। वेण के पुत्र पूथ वा बर्णन मैं विस्तार से बष्टगा। धर्म के ल्ये आप लोग एकाग्र और सावधान होकर सुनिये॥२८॥ ब्राह्मणों अपविन हुदयहीन, अश्चिष्य अव्रती, शतध्न कौर झयु को यह नहीं सुनाऊँगा॥५ ऋषिया ने इस रहस्य को स्वर्गध्रद यर, वन और आयु देने काल्य तथा वेद-सम्मत कहा है। इसे यथायं रुप से सुनिये॥२६॥ जो स्पवित ब्राह्मणा को नमस्वार कखे वेश के पुत्रपृषु की कथा बा विस्तृत वर्णन प्रतिदिन करेगा, बह विहित और भविदित क्यों से दसी नहीं हासा॥२७॥

है गे ण्थिवीरार) एक स्तामानु० देख मृता। ख न्याचपितृचिर। पक स ०्वैययपिस्। ९ घ. वस्खान्सीर०। ७फ तत्पदी०। ८ व मून। ९ ख धरणता०। १०ब ख द्रिजोत्तमा। श्च वा। श्र्ख ण्मयं परममा०। १३ ख भम क्थये०।

३4 चतुथाऽघ्यायः

आसीद्मस्य संगोप्ता पू्व्वमत्रिसमः प्रभुः। अप्िवंदों समुतपन्नसत्वद्धो नाम प्रजापतिः॥२८॥

तस्य पु्ोऽभवद्वेणो भात्य्थं धम्मकोविदः। जातो मृत्युसुतायां वे सुनीथायां प्रजापतिः॥२९॥

षप मातामहदोयेण तेन कालात्मजात्मजः! स्वधम्मं पृष्ठतः एतवा प्कामलोभेध्ववत्तत॥३०॥

मर्य्यदों मेदयामास ग्धम्मेपितां स पार्थिवः! बेदधम्मानितिक्रम्य सोऽयम्मंनिरतोऽभवत्॥३१॥

नि.स्वाध्यायवपट्‌फाराः प्रजास्तस्मिन्‌ प्रजापतौ। प्रवृत्तं न पपु सोमं हत यज्ञेषु देवता:॥३२॥

न॒ यष्टव्यं न होत्तव्यमिति तस्य प्रनापतेः। अगसीत्‌ प्रतिज्ञा करूरेय विनाशं प्रत्युपस्थिते॥३३॥

अहमिज्यश्च यष्टा च. यत्येति भूगूदह*। सयि'्यज्ञो *विधातव्यो मपि होतथ्यमित्यपि॥३४॥

तमतिकाम्तमर्पयादभाददानमसाम्प्रतम्‌। ऊचुमंहुर्पप' सर्वे मरीचि्रमुखास्तदा॥३५॥

ययं दीक्षां प्रवक्ष्यामः संवत्सरगणान्‌ वहून्‌! अधम्मं कुर मा देण एष धम्म॑ः सनातनः॥३६॥

निधने प्रसूतस्त्वं प्रजापतिरसंशयम्‌। प्रजाश्च पालपिष्येऽहुभ्भितीहु " समयः इ

का ततोइ-ताइकर , वेद धर्मों का उल्ल्यन वर पापाचरण मे अनुरकेा हो गया ॥ हे है॥ उमग्रज्यनि दे वाद में प्रजा

चेदार्ययन गौर समथ-जप से वचित हो गई थी। यहा में आटूति दिए हुए रोग वा पान देवगण नहीं करते थे ॥६२॥

रर्वनाथ उपस्गित होने पर उस प्रजापति की यह भर लाज्ा थी-- कोई याग ने करे, को स्वन मे वरे"॥३६॥

भुमुघरेष्ठ | उसी घोषणा थी हि-- मैं ही यश हुं, यम बरने याग्य और याश्यि हैं। मुझे ही रइयपर यश और द्वन करै ३८ मर्यादा का उस्टघन व रने वादे और यशा से अनूचि मांग ऐने वा रे उस प्रजापति से सरीचि-

आादि मुनियासि उगे समझाने हुए वदहा--॥३५॥ येण हम लोग अभी बढ़त वर्षा तर यञ टीशा प्राप्त वरगे।

तुम भपमें मत करो। यह सनातन पमं है॥३६॥ नि संदेह सुम अति से उपन प्रजापति सा अधि 3 देदातदेनि

पर शमे प्रतिज्ञा को थी कि मैं प्रजा का पालन वरूंगा ॥ हे 3 सड़पिया द्वारों इम प्रकार वटे जाप पर ये में

अनभि दुर्दूद्धि वेद न हँसएर बडा ३८

येणने बहा--मुसे ठोऽ पपं वा निमा द्या गन है? मैं गिगक उपदेश सु भूति, तान,

सपरथा और सन्य ममर दरादर सथारमे कौन टै? ॥३९॥ यद प्राणियों तै विशेषषर घमो बा उन्यनि.रयान

ष स्व रष ग वामापि देव ये ण्दारपापयार। ४ ग पमपि०(५ ग्‌ बतुइर

य यहा जग दिपाप्या। ८ गे मार्क्‌ न्मी ह्यना ग ब्मिति में च द्ग पर्ता।

ब्रह्मपुराणम्‌ २५

प्रभवे सर्वभूताना धर्मणा च विद्यत । सम्गूढा न बिदुनूल भवतो, मा विचेतस ४४०१

इच्छन्‌ दहेय पृथिवीं स्यादयेय सलैस्तयः । घा वै मुव च रन्धेय नाते कार्या विचारणा ४१)

यदा न शक्यते मोहादवलेंपाध्न पार्थिव । अपनेतु सदा वेस्ततं कुद्धा महंथ ॥४२॥

त॒ निगृहुष महात्मानो धिर्फुरन्त सहाबरूम। भ्ततोऽस्य सब्यमूर ते ममन्धुजतिमन्यव ॥४२॥

ग्तस्मित्तिमंथ्यमाने दे राज्ञ ऊरौ तु जज्तिवान। हुर्वोऽतिमात पुरुष कृष्णइचेति वभूव हू १८८

स भीत प्रानजलिरभूत्वा तस्यिदान द्विमससमा । ्तमत्रिविहवल दृष्टवा निपीवेंट्यन्रवीत्तदा ॥९]

निपादयशकर्चसि अभूव वदता चरा *। घीवरानसुजस्चापि वेणकल्सपसम्भवान ४६0

ये चाये विन्ध्यनिलयास्तया* पव्वेतसश्रया । सघम्म॑रुचयो विप्रास्ते तु वे बेणपल्मषा ॥४७।॥

तत पुनमेहात्मान पाणि पेणस्य दक्षिणम! अरणीमिव ्सरन्था ममन्यु्जतिमन्यव ४८)

पृथुस्तस्मात समुत्पन्न कराज्ञवलनसलिभ । दीप्यमान स्ववपुषा साक्षादग्निरिव" जवलन ०५४९

अय सोध्जगव नाम धनुगृहय महारदम। दाराश्च दिव्यान रक्षार्थं फवच च महाप्रभम ॥\५०॥

तस्मिन जातेध्य भतानि सम्प्रहृष्टानि, सव्वन । समापेतुर्महाभागा वेणस्तु त्रिदिव ययो ॥५१॥

समृत्पतेन भो विप्रा स्तपुमरेण महात्ना। श्रा स पुस्पव्छचय पुन्ना्नो नरपात्तदा पपरा

त समुदाइच नदाश्च रत्नान्यादाय सव्यश्च } तोयानि चाभिपेकाय सव्वं एवोपतस्थिरे ५५३

लि

उसके बाद बुद्ध मनिगण वेण के दाहिन हाथ से अरणी (यज्ञीय जल मथन काष्ठ) की तरह मथ लगे। उस हाथ से साक्षात अग्नि के समान दीप्तिमान वर्ण उत्पन्न हुआ॥४९॥ प्रजा की रक्षा के लिये उस मकर ध्वनि करक सजग नामक धनुष तथा दिव्य बाण और धनिमान क्षेत्र को वारण किया॥५०॥

पृथु के उत्पन्न होने पर सभी प्राणी हित होकर उसके पास पहुँचे। वेण तो स्वर्ग चला गया था॥५१॥ द्विजवय महामा यजुर्व जम लेन से वन पुरुष चण्ड वण पनामक मेरवे से बच गया॥५२॥ स्व जार के खम्भ आर नच्याँ पृथु के अमिपक के लिय रन आर ज एकर उपस्थित हु॥५३॥

स्यावराणि च भूतनि जङ्गमानि च सर्व्वशः। समागम्य तदा वैण्यमभ्यपिञ्चन्षराधिपम्‌॥१५४॥

पितामह भगवान्‌ देवेरास्िरसैः सह्‌ स्यावराणि च भूतनि जङ्गमानि च सर्व्वशः। समागम्य तदा वैण्यमभ्यपिञ्चन्षराधिपम्‌। महता राजराजेन प्रजास्तेनानुरल्जिताः पथु॥१५४॥

सोऽभिधिकतो भहावेना विधिवद्धम्नेकोविदेः। आधिराज्य तदा राज्ञां पृयुदेष्पः प्रतापवान्‌॥१५५॥

वित्रापरङ्जितास्तस्य प्रजास्तेनानु रञ्निताः। अनुरागात्ततस्तस्य नाम राजाभ्यजायत॥१५६॥

जापस्तस्तम्भिरे तस्य समुद्रमभियास्यतः। पर्वेतइंच ददुम्मरभिं ध्वजनेद्धइ्च नाभवत्‌॥१५७॥

अकृष्टपच्या पूथिवौ सिष्यन्त्यत्नानिः चिन्तनात्‌। सरव्वकामदुधा गावः पुटके पुटके मधु॥१५८॥

एतस्मप्नेव फाले तु यज्ञे पैतामहं शुभे। सूतः सूर्यां समुत्पन्नः सौत्येऽहनि महामतिः॥१५९॥

तस्मिन्नेव महायज्ञे यने प्रालोऽय मागघ'। पृथोः स्तवार्थं तौ तत्र समाहतो महपिभिः॥१६०॥

तावूचुष्देषयः सवे स्तूयतामेष रपायिव.। कर्म्मेतदनुरूयं बा पत्रं चायं नराधिपः॥१६१॥

तावूचतुस्तदा स््वास्तानृीन्‌ सूतमागधौ। मावा देवानूपीदचेद प्रीणयावः स्थकम्मभिः॥१६२॥

स चास्प विद्मो वे कर्म्म "नाम" वा लक्षणं 'पशः। स्तोत्रं येनास्य कररय्याच"रा्स्तेनस्विनो द्विजाः॥१६३॥

ऋषिभिस्ती निपुवतो तु भविष्य: स्तूयतामिति। यानि कर्माणि तवान्‌ पृथुः पदचान्महाबलः॥१६४॥

ततः प्रभृति वे लोके स्तवेषु मुनिसत्तमा.। आडीरवदाः प्रमुज्यन्ते सूतमागधवन्दिभिः॥१६५॥

तयोः स्तवान्ते सुप्रीत पृथू" प्रादात्मजेदयर:। अनूपदेशं सूताय मगधं मागधाय च॥१६६॥

ग्या, स्थावर और जगम प्राणौ सव तरफ से आकर वेणुःपुत्र (पृथु) का राज्याभिषेकं करने लगे॥१५४॥ महाराज पृथु न प्रजावगं को हर्ष मति से प्रसन्न किया॥१५५॥ तव धर्मशों ने महान्‌ तेजस्वी पृथु का सविधि राज्याभिषेक किया॥१५६॥

(आचरण से) जो प्रजा उनके पिता से दिरक्ष थी, उसे उन्होंने पुन: अनुखन बना लिया। प्रजा द्वारा अनुराग किये जाने के कारण पृथु का नाम राजा पड़ गया॥१५७॥ महाप्रतापी राजा पृथु जब समुंद्र की तरफ गमन करता था तो समुद्र का जल स्तमित हो जाता था और पर्वत उसे रास्ता दे देते थे। उसकी पताका कमी नहीं रुकी॥१५८॥

विना बीज बोये ही केवल चिन्तन से ही पृथिवी अन्न उत्पन्न करती थी। गायें इच्छानुसार दूध देती थी। दोना भर मर घृत मिलती थी॥१५९॥ इसी समय ब्रह्मा के मंगलमय यज्ञ में सूती से महामति पृथु सौत्य नामक दिन में उत्पन्न हुआ॥१६०॥

और उसी महायज्ञ में विदान्‌ मागघ भी उत्पन्न हुआ। महर्षियों ने सूत और मागघ को पृथु की स्तुति करने के लिये यहाँ आमंत्रित किया॥१६१॥ ऋषियों ने सूत और मागघ से पृथ

मोर यय से अपरसित होने इं कारण हम कते स्तुति दरें ॥ ६४

ऋषिया मे उनते बहा--भविप्यत्‌ कर्मों से आप स्तुति कीजिये। मुन्मिष्ट ! तव हे केवर महाबलवानू पृथु ने जितने जो फर्म दिये, उन सद वा प्रयोग मूत, मागप और वदी जन आयोर्वाद के रुप मे करने छे ॥६५-६६॥

उककी स्तुति वे मन्त में प्रजा के स्वामी पृथु ने परसपर है शम्यं दुर्वे्य० । २ ०भात्ययलत' । स ३ ग. चिन्तया बस ण्म न तथा सल। ५ क. मास्व रमा ई के श्दागमञ्जया। स्त्रो ।७ क स.वुर्योवेरा०। ८, ख. ०निर्वलोगा

ब्रह्मपुराणम्‌ २७

तं दृष्ट्वा परमप्रीताः प्रजाः प्रोचुर्मनी पिण: । 'वृत्तीतामेष वो दाता भविष्यति नराधिप' ॥ ६८॥

ततो ष्यं महात्मानं प्रजा. समसिदुद्ुवुः सवं नो वृत्तिं विघत्स्वेति सहंपिवचनात्तदा ६९

सोऽभिहृतः श्रजाभिस्तु प्रजाहितचिकीषंया । घुग हय पृषरादच प्पुथिवोसाइवदुबली ।७०।

ततो भ्वैण्यभयत्रस्ता = गोभूत्वा प्राद्रवन्मही । तां पृथुर्धनुरादाय प्रचन्तीमन्वधावत ॥७१॥

सा लोकान्‌ ब्रह्मलोकादीन्‌ गत्वा वैण्यभयात्तदा) प्रददराग्रतो वैण्यं प्रगृहीतद्यसनम्‌ ॥७२॥

ज्वलदुरमिनिधितैबणि्ॉप्ततेजसमन्ततः* । महायोगं महात्मानं दुरद्ध्ममरेरपि ॥७३॥

अलभन्तो तु सा त्राणं वेण्यमेंवान्वपद्यत। कृतानजलिपुटा भूत्वा पूज्या लोकेसित्रमिरतदा ॥७४॥

श्डवाच वैण्यं, नाघर्म्म॑ स्त्रीवणे परिपडयसि। फयं धारयिता चासि प्रजा राजन्‌ विना सया ॥७५॥

मपि लोकाः स्थिता" दानन्मवेदं धार्म्मते जगत्‌ । मदिनाशे विनदयेयःप्रना पार्थिव विद्धि तत्‌ ॥७६॥

न भामति हन्तुं वै ५ श्रेयदचेत्वं चिकौर्षसि। प्रजानरं पुथिवीपाल भरु चेदं वचो मम ॥७७॥

उपायत^^ समारब्धाः सव्ये सिध्यन्त्पुपफ्रमा'। उपायं पश्य येन त्वं धारयेथा प्रजाभिमाम्‌ ॥७८॥

हवापि" मां न दावतसत्वं प्रजानां पोषण नृप अनुकूला भविष्यामि यच्छ कोपं महामते ॥७९॥

अवध्यां च त्त्रियं व्यौ च स्मयं भ'्राहस्ति्मंगयोतिगतेष्वधि' ९) पव व ५। ष्थचयेयंपृथिवोपाल^० न चम्मं त्यक्तुमर्हसि ॥८०॥

होगर अनूप देश सूत को दिया और मगध देश मागध को॥ ६७) पूयु को देखकर अत्यन्त प्रन विद्रानोनेप्रनाजो से कटाह राजा तुम्हें जीविका प्रदान करेगा" ॥६८॥

तव महात्मा पृथू के पास जाकर प्रजा कहने लगी--माप हमे जीविका दें ।' तव महधियो के वचन से प्रजाओ से पिरे हुए वलौ पृषु, ने प्रजा के कल्याण वी इच्छा से धनुष और बाण लेवरपूचिवी को खदेडा॥६९-७०॥

पृषु के मय से काँपती हुई पृथ्वी गाय का रुप घारण कर भागने ल्मी भगगती हुई पृथ्वी के पीछे धनुष लेकर पृषु भौ दौड़ने लगा। ७१॥ मयमीत पृथिवी ब्रहम-लोग' आदि सभी छोवो में गईं, विन्तु उसने अन्त तव" चमक्ते हुए तीक्ष्ण बाणो से कान्तिमान्‌, महायो महात्मा अं-रदेवताजा से भी मजेय पु वी अपने सामने घनुप लिए हुए देखां॥७२-७३॥

कंदी प्राण ने पादर (अन्तत ) पृथु वो हीं शरण मे जाकर वह तिमुवन-पूज्या पृथवी हाथ जोडक-र उससे बहने लमी--+७४॥ शीकरे मारने मे भध को आप नही देखते ? राजन्‌। मेरे विना प्रजाओ वा घारण आप करे करे ? ॥७५।

खव लोक मुझमे स्थित है। में सत्ार को घारण कसती हूँ। 'राजन्‌ ! मेरा नाश हो जानें पर प्रजा

२८ चतुर्थोध्याय

एवं बहुविध वाक्य भूत्वा राजा महामना कोप निगूहुण धर्मात्मि चतुधामिदमजीवीतु।

पृथुरुवाच

एकस्यार्थे तु यो हन्यादात्मनो था परस्य च। बहून् वा श्राणिनोऽनन्त भवेत्तस्येह पातकम्। ॥८२॥

सुखमेधन्ति बहवो यस्मिस्तु निहतेऽकुभे। तस्मिन् रते नास्ति भद्रे पातक चोपपातकम्। ॥८३॥

सोऽह प्रजानिमित्त स्वां हनिष्यामि वसुन्धरे। यदि मे श्वचनानाद्य करिष्यसि जगद्धितम्। ॥८४॥

स्व निहत्याद्य बाधेन मच्छासनपयः मुखीम्। आत्मान प्रयपित्वाहु प्रजा धारयिता स्वयम्।

सा त्व दास्नमास्याय भम भस्मभृता वरे। सन्जीदय प्रजा सर्वा समर्था ह्यसति धारणे। ॥८६॥

इहितृत्व च मे गच्छ तद एनमहं क्षरम्। नियस्छेय स्वद्धार्थमुन्त घोरदर्शनम्। ॥८७॥

वसुधोवाच

सर्वदमेतदह वीर विधास्यामि न सञ्चय। उत्स तरु ममर सम्पद्य क्षरेय येन वत्सल्म।

समाव कुर सववेद मा त्व धर्मभूता वर। यथा विस्यन्दमान में क्षीर सव्येन भावयेत्। ॥८९॥

लोमहर्षण उवाच

तत उत्सारयामास श्रौखार्शतसहस्त्रणज्न। धनुष्कोटया तदा रवष्यस्तेन शेला विव्द्धिता। ॥९०॥

नहि पूर्वदविगते वै नियमे पृथिवीतले। सधिभाः पुराणा वा प्रामाप्या वाभवत्तदा। ॥९१॥

इस तरह वी वदत सी वात सुनवर महामना पर्मा मा राजा शान्त हो पृथ्वी दे कहन लगा।

हिंदी अनुवाद

पृथु ने कहा—मद्र! एक अपन लिए अथवा दूसरे के लिए बहुत प्राणियों को अथवा एक को जो मारता है, उसको अनन्त पाप लगता है। ॥८२॥ जिस पापी के मरने में वन्ते सुख हो उस मारने में पाप शौर उपपाप नहीं लगता। ॥८३॥ पृष्व! मेरी जानी में दि तुम संसार का कल्याण नहीं करती हो तो प्रजा के कारण मैं तुम्हें मार डालूंगा। ॥८४॥ शासन को न मानने वाली तुम्हारी आज मार कर मैं प्रजा को धारण करने के लिए अपना विस्तार करेगा। ॥८५॥ अते हे धर्मचरण दुश्मन! मेरा शासन स्वीकार वर प्रथा का पालन पोषणकर। प्रजा को धारण करने में तुम पूर्ण समर्थ हो। ॥८६॥ यदि तुम्हें मेरी पुत्री बनना स्वीकार है तो तुम्हारा बंधन के लिए तैयार इस मयवर बाण को मैं रोक दूं। ॥८७॥

पृथिवी ने कहा—वीर! निःसंदेह मम साथ सवार है। पर आप मेरे चष्टे को देखिये जिससे मैं वात्सल्यपूर्ण होकर दूध दूं। ॥८८॥ धर्मघरीण! जाप मुझे सव भोर से समतल बना दें जिससे मेरा झरा हुआ दूध सवं जगहं पहुँच जाव। ॥८९॥

लोमहर्षण ने कहा—तव पूर्व में धनुष के निर्णय से सेत हजारों पर्वत को उखाड दिया। इससे पहाड बढ़े गए। ॥९०॥ पलो सृष्टि में जद पृथ्वा पद सह ऊपर नसायद थीं तव गाँवा या नगरा वय विभाग नहीं। ॥९१॥

न श्रास्यानि न गोरक्ष्यं न कृषिनं च किक्खयः। नैव सत्यानृतं चासीन्न लोभो न च मत्सरः। ॥९२॥

यैवस्वतेऽन्तरे तस्मिन् साम्प्रतं समुपस्थिते। वेण्यात्मभूति चै विप्राः सववेस्येतरय सम्भव:। ॥९३॥

यत्र यत्न समं स्वस्या भूमेरासीत्तदा द्विजः। तन तत प्रमा सर्वा विदासं समरोयन्। ॥९४॥


ब्रह्मपुराणम् २९

आहार: फलमूलानि मदानामवत्तदा ? छच्छं ण महता प्युपत इत्येवमनुशुश्रुम ॥ ९५७॥

सीकल्पपित्वा वत्सं सु मनुं स्मायम्भुवं प्रभुम् । स्वपाणौ पुरपव्याघ्रो दुदोह पृथिवीर ततः ॥९६॥

सस्यजश्तानि सर्व्वाणि पृथुर्वेग्यः प्रतापवान् । तेनतेन प्रजाः सर्व्वा वततन्तेऽद्याि सर्व्वं सः ॥१९७॥

ऋषपदच तदा देवाः ष्पितरोऽ्य सरीसृपाः । दैत्या यक्षा: पुण्यजना गर्दर्व्या: पव्वेता नगाः ॥९८॥

एते पुरा दविजधेष्ठा दुदृहुरधरणीं किल । क्षीरं वत्सदंच पारं, च तेषां दोग्धा पृथर्यूथक् ॥१९१९॥१

ऋषोणाममवत्मोसो वत्सो दोग्धा दृहुस्पत्िः क्षरे तेषा तपो ब्रह्म पारं छन्दासि भो द्विजा: ॥१००॥

देवानां काञ्चनं पात्रं वत्सस्तेयां दातक्तुः । शोरमोजस्करं चैव दोग्धा च भगवान्रविः ॥ १०१॥

पितृणां राजतं पाम यमो वत्सः प्रतापवान् । जन्तकश्चाभवदोग्धा क्षीर तेषां सुधा रमृता ॥११०२॥

नागाना तक्षको चत्स पात्रे चालाबुसशकम् । दोम्धा त्वेरादतो नागस्तेषा क्षीरं दिप स्पृतम् ॥ १०३॥

असुराणां भघुर्दोघा क्षीरं मायामयं स्मृतम् । विरोचनरतु बत्सोध्भूदायस पाथमेंच च॥ १०४॥

यक्षाणामामपात्रं तु वत्सो वैश्रवणः प्रमु । दोर्धा रजतनाभस्तु क्षीरान्तर्घानमेव च ॥ १०५॥

सुमाली राक्षवेन्राणां वत्सं क्षोर च शोणितम् । दोग्धा रजतनाभस्तु कपाठं पात्रमेव च ॥ १०६॥

हुआ था॥९१॥ अनं गो-रक्षा, खेती वाणिज्य सत्य मिथ्या, लोम, डाह--ये सव नहीं ये॥९२॥ द्िजचयं !

वैवस्वत मन्वन्तर होने पर पृथु-कार स ही इनकी उत्पत्ति हुई॥९३॥ विप्रदुन्द । जहाँ-अहाँ पृथ्वी बरावर धी, वहाँ

सर्वत्र प्रजा स्ने लगी॥६४॥ उस समय की जनता परिश्रम भर कष्ट से फछ-मूल भोजन प्राप्त तरतं थी--

ऐसा हम, सुना है॥९५। पुरुप-दुगव पुथु > समर्थ स्वायमवु मनू को क्छडा बनाकर अपन हाथ हो पृथ्वी को

जव दहा तो सभी प्रकार के अनपैदा हुए। उन्ही माज्यपदार्थों से जनता का पोषण अब मो हो रहा है॥९६-९७॥ द्विजवर !

कषि, देवता, पितर, नाग, दैत्य यक्ष राझंस मन्यं पहाड, बुझ--इन्होन पदे पृथिवी को दृहा १९८२६ विश्वृन्द !

उमये ध, बछडा, पात्र, हर दाला--ये स्तर अलग अलग व्यक्ति हुए॥९९॥ कषिया न सोम को वडा बृहस्पति

को सद्मा, और बेदी को दोहन) धतानर तपस्या रूप दूध को ठुहा॥१००॥ देवताआ « स्वण क दोहनी मे इन्द्र

को बछड़ा और मयवानू सूय को हर काला वसाकर केजस्वर दूध को दुहा ५१०१ पिठरा दे चांदी को पातर, परतापी

यम को बद्धडा, अन्तम (वाल) को धने वाला बताकर अमृत रूप दूध वा दौहन क्रिया १०२ नागो न तृक्षक को

बेछडा, तूवी को पचर, ऐरावत नाग को दुददुदवाला बनाकर घिप रूप दूध की दृहा ॥१०३॥ त्या > मधु (देत्य )

को दुहेंपवाला, विरोचन (प्र द्ञाद-पुत्र) को बडा और लोहा को पात्र बनाकर माया रुप दुव दुह ॥१०४॥ यक्षों "+

चाँच को प्राकर, कुबेर को वछडा, रजतनाम को दुदनेवाला बना कर अन्तर्थान (छिप जात की विया} रूप दूध को

दरा १०५ राक्षो >. सुमाली को वडा, रजतनाम को दुडुनवाला सौर काल को पतव वनरं योगित सूप

गन्धर्वाणां चि्ररयो वत्सः पात्र च पङ्कजम् । दोग्या च मुदचि. क्षीर

पृथुना प्रविभक्ता च झोधिता च वसुन्धरा । शस्याकरवती फीता पुरपत्तनशालिसी ॥ ११४॥

एुवस्प्रभावे वैण्यः स राजासीद्राजतत्तम- नमस्यञ्चैव पुज्यद्च भूतप्रामनं संक्षयः ॥ १११५॥

पराह्यणैश्च महाभागेरवेदवेवाद्धपारगे- । पृथुरेव नमस्का्यो ब्रह्मयोनिः सनातनः ॥ १११६॥

पारयिवेइच भहाभागेः\ पारथिवत्वमिहेच्छुनि । आदिराजो भमस्का्यः पुयर्वेण्यः प्रतापवान्‌ ॥ १११७॥

योधरपि च विक्रान्ते' प्राप्तुकामेजंप युधि । मादिराजो ममस्काय्यो योधानां प्रथमो भूपः ॥ १११८॥

यो हि योद्धा रण याति कीर्तयिस्या पृथुं नृपम्‌ । स घोररु पात्संग्रामातु "क्षेमी भवति कोत्तिमान्‌ ॥ १११९॥

श्येरपि च प्वित्तादुषंवेयवृन्तिविघापिभिः | पृथुरेव नमस्कार्यो वृत्तिदाता महाथलाः ॥ १११२०॥

दूध को दुहा १०६)! गन्पर्वों नें चित्ररध को बडा कमल को पात्र, सुरुचि को दुहनेवाला बनाकर पवित्र गस्घ रूप

दूध को दुहा ॥१०७॥

पहाडो ने शिला को पात्र, हिमालय को वडा आर सुमेरू को दुहमवाड़ा बनाकर एल भौर

ओपपधि रुप दूष दहा ॥१०८॥

वृसो ने पाकर को वछडा, पुष्पित सम्खू को दहनेवाला पलास को पात्र बनाकर कटे-जले हुए वृक्षो से निकला कोपलरूप दूष दुहा ॥१०९॥ बही पृथ्वी विधात्री, पावनी वसुध, जननी, सवेकेमदोप्प्री, स्ैनस्थप्रतेदणी और मेदिनी नाम से विश्यात है मौर समुद तक पलो हुई है।॥ १११० १११॥ मपु-नटम के मेद से व्याप्त होने क कारण ब्रहावादी इसे मेदिनी कहते ई ॥११२॥ कित्रगण । राजा पृथु द्वारा पु्ीरुप मे स्वीकारं की जाने से यह श्वी बहलाई ॥ है १३॥ पृथु पृथ्वी को विमक्तं वर उसका सस्वर किया, जिससे यह धन, वान्य, मौव, नगर आदि से समृ दई ॥११४५। इस तरह प्रतापी आर नृपश्रेप्ठ राजा पृथू प्राथियों म पून्य और प्रणम्य व, इसमें सशय नहीं ॥ १११५॥ वेद-वेदागों में पारगत महाभाग द्वाह्मणा को चाहिएबि सनातन और ब्रह्मयानि पुथु को ही नमस्कार करें॥ १११६0 राजत्व चाहने वाले महामाय राजाओं को मौ परम प्रतापी आदिराजा पृथु को नमस्वार करना भाहिये। ॥११७॥ पुद्ध म जय की इच्छा रखने वाले. पराक्रमो योद्धाओं को मी आदि राजा पृथु को नमस्कार करना चाहिये॥ १११८॥ जो सैनिक राजा पृथु दा स्मरण करे युद्ध मे जाता है, वह घोर संग्राम में मी विजयौ होता है। है १९॥ महाधनवान्‌ वेश्य मी जीवित देनवाले महायशस्वे पृषु को ही नमस्कार करं॥१२०॥ उसी तरह है के. दिसवस्य। रेक ण्या घ परिप्टु० ।३ के ०रप्रमवती च सा। ए० गे गरव नमसार्यो मे ० ५ग जवै फलेप्युमि । ६ स्‍वानैराप्तु ० । से. «यों वृत्तिदाता महायशा । या। ८ स ०मत्तरति बहुवी ०।९ ल. न्ता

मैशप० ।