अध्याय 4 : ब्रह्मा के मानस पुत्रों की उत्पत्ति
ब्रह्मा के मानस पुत्रों की उत्पत्ति
पिछले अध्यायों में तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन हुआ। अब सूत जी ब्रह्मा जी की मानसी सृष्टि का विस्तार से वर्णन करते हैं।
सृष्टि-विस्तार का आदेश
जब ब्रह्मा जी ने अपने तप के बल से वेदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया, तब उन्होंने सृष्टि-विस्तार का संकल्प किया। उनके हृदय में विचार आया – “मैं ऐसे पुत्रों की रचना करूँ जो मेरी ही भाँति तेजस्वी और ब्रह्मवेत्ता हों तथा प्रजा-वृद्धि करें।”
चार मानस पुत्र – सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार
अपने संकल्प मात्र से ब्रह्मा जी ने चार दिव्य बालकों को उत्पन्न किया। ये जन्म से ही पञ्चभौतिक शरीर के बन्धन से मुक्त, ब्रह्मज्ञान में निमग्न और परम तेजस्वी थे। इनके नाम हैं – सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार। ये चारों सदा पाँच वर्ष के बालक के रूप में रहते हैं।
सनकं च सनन्दं च सनातनमथात्मभूः ।
सनत्कुमारं च विभुः प्रजासर्गार्थमादिशत् ॥
सांसारिकता से विरक्ति
ब्रह्मा जी ने चारों पुत्रों से कहा – “हे पुत्रो! तुम प्रजा उत्पन्न करो और सृष्टि का विस्तार करो।” परन्तु ये चारों बालक जन्म से ही निर्विकार, ब्रह्मनिष्ठ और वैराग्य-सम्पन्न थे। उन्होंने पिता की आज्ञा को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और कहा – “हम परब्रह्म की आराधना में लीन रहना चाहते हैं। सांसारिक बन्धन हमारे मार्ग का अवरोध है।”
ब्रह्मा जी का क्रोध और शान्ति
पुत्रों के इस व्यवहार से ब्रह्मा जी के मन में तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ। उनका वह क्रोध महादेव के रूप में प्रकट हुआ (जिसका वर्णन अगले अध्याय में है)। तथापि, सनकादि ने अपने तप और ज्ञान के प्रभाव से पिता के क्रोध को शान्त किया। ब्रह्मा जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम सदा युवावस्था-रहित बालक रूप में विचरण करोगे और समस्त लोकों में तुम्हारी पूजा होगी।
यूयं बालस्वरूपेण सर्वलोकेषु पूजिताः ।
विचरिष्यथ लोकेषु मम वाक्यादसंशयम् ॥
सनकादि का महत्त्व
सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार ये चारों सनत्कुमार सम्प्रदाय के आदि आचार्य माने जाते हैं। ये नित्य सिद्ध, परमहंस और अवधूत हैं। इन्होंने नारद जी, शिव जी और अनेक ऋषियों को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया। ये साक्षात् भगवान विष्णु के पार्षद माने जाते हैं।
शेष मानस पुत्र
इसके बाद ब्रह्मा जी ने अपने मन से ही अन्य पुत्र उत्पन्न किए – मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ और नारद। ये नौ प्रजापति आगे चलकर सम्पूर्ण सृष्टि के जनक बने। इन सबको सनकादि के समान ही ब्रह्मा जी का मानस पुत्र कहा गया।
फलश्रुति
सूत जी बोले – “जो मनुष्य सनकादि मुनियों की इस विरक्ति-कथा का श्रवण करता है, वह सांसारिक मोह से मुक्त होकर ज्ञान-वैराग्य की प्राप्ति करता है। उसकी भक्ति भगवान श्रीहरि में दृढ़ होती है।”
॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥