अध्याय सूचकांक 13 कुल

1. अध्याय 1: ब्रह्म पुराण का मंगलाचरण, नैमिषारण्य का वर्णन और सूत-ऋषि संवाद 2. अध्याय 2: स्वायम्भुव मनु की वंश-परंपरा और शतरूपा की तपस्या 3. अध्याय 3: देवदानवोत्पत्ति-वर्णनम् - देवता, दानव और अन्य प्राणियों की उत्पत्ति 4. अध्याय 4: पृथु से लेकर सभी देव-दानवों के राज्याभिषेक का वर्णन 5. अध्याय 5: मन्वन्तरवर्णन - सभी मनुओं और उनके युगों का विस्तृत विवरण 6. अध्याय 6: सूर्य की उत्पत्ति का वर्णन (आदित्योत्पत्ति-कथनम्) 7. अध्याय 7: सूर्यवंश वर्णन - इला की कथा और मनु के पुत्रों की कहानी 8. अध्याय 8: सूरयेवश वर्णन - सत्यव्रत की तपस्या और वशिष्ठ का आशीर्वाद 9. अध्याय 9: चंद्रवंश-वर्णन और सोम की उत्पत्ति का विवरण 10. अध्याय 10: पुरूरवा की कथा और चन्द्रवंश का वर्णन 11. अध्याय 11: देवासुर-संग्राम, रजि की वरदान-विजय और ब्रह्मा का शस्त्र-उपदेश 12. अध्याय 12: ययाति का चरित्र-वर्णन और सोमवंश की महिमा 13. अध्याय 13: पुरु वंश का विस्तृत वर्णन और राजकुल का इतिहास
Brahma Purana • अध्याय 5

अध्याय 5: मन्वन्तरवर्णन - सभी मनुओं और उनके युगों का विस्तृत विवरण

अध्याय 5 : पञ्चमोऽध्यायः

ब्रह्मपुराणम्‌ ३१

तथा दरः शुचिभिस्तिवर्णपरिचारिभिः। पृथुरेव नमस्कार्यः भ्रमः परमिहेप्सुभिः ॥ १२१॥

एते वत्सविशेषाइच दोग्धारः क्षीरमेव च। पात्राणि च मयोदतानि किं भूयो षणंपामि वः॥१२२॥

इति श्रीरामे महापुराण पृणोरजन्ममाहास्स्यकयनं नाम चतुर्थोऽध्याय। १३४१

पञ्चमोऽध्यायः

मन्वन्तरवणेनम्‌

धि ऋषय ऊचुः

मन्दन्तराणि सर्यि विस्तरेण महामते । तेषां प्रव्वंदिसृष्टिं शच रोमहर्षण कोत्तंय॥ १॥

यावन्तो मनवदसैव यावन्तं कालमेव च। मन्वन्तराणि भो सृत्त श्रोतुमिच्छम तह्त्वतत: ॥ २॥

लोमहुपण उवाच

न क्यों विस्तरो विप्रा वक्तुं वपंशतैरपि। मन्वम्तराणए सर्वेषा सकषेपाच्रुत्त दविजाः ॥३॥

स्वायम्मूवे मनुः पृव्वें भनुः स्वारोचिषस्तया। उसमस्तामसइचेद रेवतशचाक्षुपरतथा ॥४॥

तीनो बर्णों की सेवा करने वाले पवित्र शूदर मी परम कल्याण के लिए पृथु को ही नमस्कार करे॥१२१॥

ये विशेष चछडे, दुहने वाले, दूध और पावर मैंने बतेला दिये। अब आर क्या वर्णन करूँ, कहिये ॥१२२॥

श्री ब्रह्ममहापूराण में पृथु का जन्म माहृत्म्य-कयन नामक चौथा अध्याय समाप्त ।॥४॥

मन्वन्तरो का वर्णन

सुनियों में क्ा--महाप्रा् लोमहर्पण , सभी मन्वन्तरो और उनकी पूर्व सुष्टि का वर्णन विस्तार से कीजिय

महामाय सूत ! जितने मनु, जितने काल ओर जितने मन्वन्तर हुए है, उनको तत्त्वत हम सुनना चाहते है ॥२॥

लोमहर्पण रोले विभवुनद ! समी मन्वन्तरो का विस्तार पूनम वर्णन मैं सौ वर्षों मे भौ नहीं कर सकता। इसलिये सक्षेपत श्रवण कीजिए।

स्ंप्रथम स्वायभुद मनु हुआ । उसके वाद क्रमश स्वारोचिप, उत्तम, तामस, रैवत मौर चाकुष--ये मनु हुए॥४॥

३२ पब्चमो5ध्याय:

वैवस्वतदव भो विग्ना साम्प्रत मनुरुच्यते। सार्वाणद्व मनुस्तद््वेग्यो रोौच्यस्तयैव प ॥५॥

तथैव रेस्तावर्ण्यदथत्वारो मनव स्मृता ! अतीता वरत्तमानाइ्च तथैवानागता द्विजा ॥६॥

कोतिता मनवस्तुम्य मयेवेते ययाूता । कऋषॉस्त्वेपा प्रवदेयामि पुनानुदेवगणास्तया ॥७॥

मरोविरमिर्मगवानद्धिरा पुष् क्रतु । पुलस्त्ययच वशिष्ठइ्स सप्तैते ग्रह्मण सुता ॥८॥

उत्तरस्या दिशि तया द्विजा सप्तैव तस्तया। आग्निघश्चाग्निबाहुश्च मेध्यो मेधातिथिरवसु ॥९॥

ज्योतिष्मान्नदयुतिमान् ऋहव्य सवर पुष्पक। मनो स्वायम्भुवरयेतरे दश पुत्रा महौजसः ॥१०॥

एतद्वै प्रथमं पित्रा मन्वन्तरमुदाहृतम्। योगवै वसिष्ठपुत्रश्च स्तम्ब दयापि एन च॥ १०॥

प्राणो वृहस्पतिश्चैयं दल्तोऽत्रिदच्यवनस्तया। एते महर्षयो विप्रा वायुप्रोक्ता सहर्षता ॥१२॥

देवांश्च तुपिता जाना स्मृता स्वारोचिषे अन्तरे। हविष्य सुष्टतिर्ज्योतिरापोमूर्तिरपि स्मृता ॥१३॥

प्रतीतदव नभस्यश्च गभ ऊर्जस्तथैव च। स्वारोचिषस्य पुनस्ते मनोर्विप्रा महात्मन् ॥१४॥

फत्ता पृथिवोवाला महावीर्यपराक्रमा। द्वितीयमेतत्फलितं विप्रा मन्वन्तर भूमा ॥१५॥

इदं तृतीयं वदेयानि तदृ रुषध्व द्विजोत्तमा। वसिष्ठपुत्रा सप्तासन् वासिष्ठा इति विभूता ॥१६॥

हिरण्यगर्भस्य सुता ऊर्जा जाता सुतेजसः। झपयोध्वत्र मया प्रोक्ता पौरषमानात्निवोधत॥ १७॥

आत्तमेमामुनिषेष्ठा दन्न पुत्रान्मनोरिमान्। इय ऊर्जस्तनूर्जस्तु मधुर्माधव एव च ॥१८॥

शुचि शष राहृष्चैय नमस्यो नभ एव च। भानवस्तम देवांश्च मभ्बन्तरसदाहुतम् ॥१९॥

द्विजचूड़! इस गम्य दैवस्वत मनु हैं। सावयि रैम्य रच्य और गस्मव्वण्य--य चारा भा मनु बदलत ॥

द्विजवृन्द जताते वतमान नर मपिष्य मे हान वाल सतुआ को म जनुथुति दे अनुसार आप टाया म बतला दिया,

अय इनमें पि पुर जार दवताओ पा वणन करगा॥२०॥ मरि अत्रि भगवान् अगिरा पुरह कनु पुस्त्व

मौर विष्ट--य सता ब्रा बे" पूत कदय ॥२१॥ ब्राह्मणवृन्द उत्तर दिशा मे य शाता रप्तपि कहत हैं।

अग्नीध्र यस्विवाट मध्य मेधारियि वनु ज्यातिष्मान् चूनिमान् हव्य रव- आर पृथ-पे महापरात्रमों दश्य पुत्र स्वायम्भुव मनु क हुए।।९ १०५ प्र हणम यह पटड मरतर का वणन मन त्रिया है। वसिष्ठ वा पुत्र मौव, स्तम्ब भरम प्राण दुलस्पति दत्त अत्रि अर च्यवन--य वायु स कट् गए गहाप्रती मद्पि और सुपित नामक

देवता रवाराचिथ मस्वलर स हुए ॥११ १२१५ हरपिप्त मुः ज्याति नाप मूति प्रसीत नमन्य नम और ऊज--

य मदामां स्वाराच्यि गा बे पुव वर पराजमा राजा हुए ॥२३॥ यह दूगर मन्वन्तर का दशन मैन पा ॥ १५॥

विध्रवबद। अप तर मदन्तर वा दशा यै कस्मा सुनिय। विष्ट षृ माता पुत्र बारिष्ठ मम मंरप्रन्दि

एए ॥२४॥ लिर्ष्दया क पकृत्य पत्र ऊय साम से स्यान दूए भुनियय। पिया व वार मे मैं. वत्य टिया ॥ जा

अब आनमिक दथ उुता बे नाम सुनिय-रप उज तनज सपु सायव नुवि शुक्र एद नमस्य आर नम। उस {मन्य

न्तर) भ मान्। दवता टूए। पट् मन्य तर धै" वर् दिया (१८ १९०) जव चम मन्दन्तर् ब विधय से मैं आपस बहूंगा।

दग परस्पर ०१ रस गे मया। देता सविसिमू। गवाना ल्य रज्या सतुउवस्तदंव चे। से ०)

अतिनामा सहिष्णुश्च सप्तेषु च महर्षिभ्रः। चालुषस्पा तरे विभ्रा मनोद्वारित्वमें स्मृता ॥१५।३०॥

आवातप्रयितास्ते वै पृथर्त्वेन दिवौकसः। लेखाइच नामतो घित्रा पञ्च देवगणा स्मृता ॥३१॥

कृषेरद्धिरिस पुना महातमा महौरसः। नाडवतेथा मुनिश्नेष्ठा दश पुन्नास्तु विधुता ॥३२॥

र्सपरभृतेयो विप्राह्ाक्षुप्यान्तरे मनो पष्ठ मन्वन्तर प्रोवते सप्तम तु निबोधत ३३

बाहाणथप्ठो कव्य प्रयु अग्नि जहतु धा कपीवानेम-र अद्पादाद-ये खातों ऋषि चतथ मन्वन्तर मे हृषु। णामस

मजतरमभ मन के पुत्र पौत्र तथा देवसमूट्‌ का भी वणन पुराण में क्या गया है २० २१॥ दति तपस्य सुतपस तपो

मनं सनातन तप मतिकल्माप तवो घन्वौ आर परतप--ये दगा पुत्र तामस मनु के कहलपि--एसा वायु का कहना है। यह च था ममर मैंठ वला दिया ॥२२ २२१

पाचव मन्वन्तर म देववाहु य्दुप्न मनि वदशिरा हिरण्य शोमा प्य सोम से उत्पतत कप्नवाहु अर अभि-पुत सयनत्--ये सातो ऋषि हुए ॥र४ २५॥

रनोदिह न प्रहतियाँ देवता हुड दारिपव आररम्य भी मन्‌ के अन्तर कहलाते हैं॥२६॥

अब मनु के पुत्री क नाम सुनिये। घतिमान अन्य युवन तत्वदा्ी निशत्सु आरण्य प्रका निर्मोह स यवाक म॒ र कृती--ये रवत मन क पुत्र हुए। यह पाँचवा मन्वन्तर न वणनं क्रिया ॥२७ २८॥

ज्ाहणस्ष्ठों। अव छठ के वारे मे कुण सुनिये। भग नम विवस्वान्‌ सुषाम निरा अतिनामा आर सहिप्यु--ये साता महयि चासयः मन्वन्तर म हुए २९ ३०॥

लेखा नाम से प्रसिद्ध प्र देवता हुए जिनक नाम पुथकरूप से नाव तक मी जानते हैं॥३१॥

मुनिवर! अगिरा मुनि के महा पराक्रमौ दए प्रमत्त दश पुन नाटकस्य नाम से प्रसिद्ध हुए॥३२॥

चाक्षुप मन्वन्तर नामक छठा भवन्तरं बैन वणन जप

१ तुष ना रक्‌ देशान कथिवेग्दक्यप सारे ख सत्या व ननो। पतिस्तप सुतरगस्तपीमूल स थे स।०पोमक हा० | ६ वा सस्ति ७क न्युवा ८ के न्पपा। ता०) ९ प ०्क्ताइच मो निप्रङच०।

१० सौमप। रै१ वाल्वमू्‌० १२ ख न्ता} पारि०। १३ कैयस्व। खं ग॒ अरण्यल्व। १५क निमेः। १६ व न्च मा। १७ ग र्प्ततऽतिम०। श८ल चते। १९ फ «ता \ अप्रसुनाइन कपय पयुदयाज्या तिवाक्घ २० नाइले०! २१क न्ता। गु)

अन्रिवसिष्ठों भगवान्‌ कदयपदच महानृषिः गौतमोऽथ भरद्वाजो विदवामित्रस्तयैव च ॥३५॥

स्यैव पुत्रों भगवानुचीकस्य महात्मनः। सप्तमो जमदग्निर पयः सम्प्रतं दिवि ॥३५॥

साध्या रुद्राइच विश्वे च वसवो भरुतस्तया। आदिष्याञ्चारिवनोौ चापि देवौ यैवस्यतौ स्मृतौ ॥३६॥

मनोव्ववस्वतरयैते र्त्त साम्प्रतेऽन्तरे। इ्वाकुप्रमुखादचंव ददा पुत्रा महामनः ॥३७॥

पतेथा कीतितानान्तु सहर्षीणा महौजसम्‌ तेषा पुत्राह्च पौनाइच दिषु सर्व्वासु भो दिजः ॥३८॥

मन्वन्तरेषु स्युः प्रागासन्‌ सप्त सप्तकाः लोके वम्मेच्यनस्यारथे लोकसंरक्षणाय च ॥३९॥

मन्वन्तरे व्यतिक्रान्ते चरवारः सप्तका णाः करवा कम्म दिं यान्ति ब्रह्वसमोकसनामयम्‌ ॥४०॥

ततोऽन्ये तपसा युक्ताः स्थानं ततपुरपन्त्पुत। अतीता चत्तेमानाइच कमेणेतेन भो हिजा।

और ऋचीक महात्मा का सातर्घा पूर जमदग्नि--ये सब ऋषि इस समय स्वर्ग में है ॥ २४-३५॥

साध्य, सदर, विश्वेदेव, वसु, मरुद् आदित्य भर्‌ अदिविनीकुमार--ये सब देवता वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के है ॥३६॥

इस मनु के इक्ष्वाकु आदि दश पुत्र हैं। ब्राह्मणवृंद, पहले सभी मन्वन्तरों में लोक में धर्म व्यवस्था तथा लोक-रक्षण के लिए इन कथित मदन् तेजस्वी मर्पय! वे तथा इनके पुत्र-पौत्र वे उन दिशाओं में सत सप्तक अर्थात् विभिन्न यात सात दल थे॥३८ ३९॥

मन्वन्तर बीत जाने पर चार् सप्तक् गध कार्य समाप्त करके रोगादि से रहित बरहर को चले जात थे ॥४०॥

तव दूसरे तपस्वी उस स्थान की पूति करे ये! विप्रवृंद। अतीत, वर्तमान और मनिष्यत् इस श्रम से ये सात महर्षि स्वर्ग में कहै गय हैं॥४१॥

विश्ववृंद! सावर्ण मन्वन्तर में राम, व्यास, अभिधुव, मारदराज, द्रोणाचार्य के पुत्र महातजस्वी अश्वत्थामा, गौतम, अजर, दण्डान् नामक गौतम, कौशिक, गालव, आँखे, कश्यप य साठ महामा दाग ॥४२-४४॥

मुनियेष्ठो! देवी, अध्वरीवानु, समन, पृथविमानु, वसु, अरिष्ट, अघृष्ठ, बाजी, सुमति--ये सान महर्षि सायण मनु के पृत्र हैं॥४५-४६॥

प्रातःकाल उठकर इनके नाम लेने से मनुष्य सुख, यश और शरणं जायु प्राप्त करता है॥४७॥

विश्ववृंद! य सप्तक गण मैंने तत्त्वतः वता दिये। अब आने वाले मन्वन्तरा के प्टपियरमाच्च जद्धिरि: या०। रे स. ण्पु प्रधिना सप्त। है के. ण्व त्र.पयाऽपिचमो। ४क #ेस्यापदितो द्वि०। स णंस्यादिदा द्वि०१५द न्ताः \ भर०। चम, ७मस्पाध्टपजर्वै०। ७ व ण्व मरद्राजोश्थ गौग्। <स रप्व्य | ९१ सुमन्तो। १० स. ०वेत्सदा ३९०८

एतान्युक्तानि भो विप्राः सप्तसप्त च तत्वतः मन्वन्तराणि संदोपाच्धृणुतानायतान्यपि ।४८॥

सावर्णा मनवो विप्राः पञ्च तादच निनोघत। एको वैवस्वतस्तेषां चत्वारस्तु ब्रह्मजापतेः ।४९॥

परमेष्ठिसुता विप्रा मेरुसावर्ण्यतां गताः। दक्षस्य तु हि दीषट्ाः प्रियायास्तनया नुपाः ॥५०॥

महता तपसा युक्ता मेरुपृष्ठे महौजसः। रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रौच्यो नाम मनु स्मृतः ॥५१॥

भूयां चोत्पादितो देव्यां भौत्यो नाम रुचेः सुतरः। अनागता इच सप्तैते कल्पेऽस्मिन्मनवः स्मृताः ॥५२॥

तेरियं पृथिवी सर्व्वा सप्तद्वीपा सप्तनः धुं युगसहलन्सु परिपाल्यः सर्वतोत्तमाः ॥५३॥

प्रजापति ते श्य तपसा संहारं तेषु नित्यजः। युगानि सप्ततिस्तानि साप्राणि कथितानि च ॥५४॥

कृतत्रेतादियुक्तानि मनोरन्तरमुच्यते। चतुर्देशतें मनवः कलमिताः कौश्वर्दनाः ॥५५॥

वेदेषु सपुराणेषु स्ववेपु प्रभविष्णवः। प्रजानां पतयो विप्रा धन्यमेषां प्रकौतेनम् ॥५६॥

मन्वन्तरेषु संहाराः संहारान्तेषु सम्भवाः। न श्छाक्यतेऽन्तस्तेषां वै वतुं यंशतेरपि ॥५७॥

विसस्य भनानां वे संहारस्य च भो दिज्यः। मन्वन्तरेषु संहाराः धृयन्ते विजसत्तमाः ॥५८॥

सरोधास्तेत्र तिष्ठन्ति देवाः सप्तघिभिः सह्। तपसा ब्रह्मचस्येण शतेन च सयभ्विताः ॥५९॥

पूर्ण युगसहले तु कलो निःशेष उच्यते। तत्र मूतानि सर्वाणि कघान्धारित्यरशिमिभिः ॥६०॥

चांदहा मनु प्रजा के स्वामी माने गये हैं। ब्राह्मणवृन्द इनका वर्णन कल्याणदायक है ॥५४५६॥

मन्वन्तर का सदार हुआ करता है यर सार के बाद फिर मन्वन्तर होते हैं। इनके अन्त का वर्णन सकी वर्षों में भी नहीं किया जा सकता।

॥५७॥

विप्रवर। मन्वन्तरों में प्रजा की सृष्टि तथा संहार सुने जाते हैं।

॥५८॥

वहाँ सप्तर्षियों के साथ देवता लोग तपस्या, श्रमचर्य और वेदों के प्रभाव से व्य जाते हैं।

॥५९॥

हजार युग पूर्ण हो जाने पर निशेष नामक कल होता है, जिसमें सूर्य की किरणों से सब प्राणी दग्ध हो जाते हैं।

॥६०॥

ब्राह्मणवृन्द। तब समस्त प्राणी आदित्य-गणों के साथ ब्रह्मा को आगे करके कल्प के अन्त में पुनः पुनः प्राणियों के सृष्टिकर्ता, देव-श्रेष्ठ तथा व्यापक हरि-नारायण में प्रविष्ट हो जाते हैं।

॥६१॥

हरि भगवान् अव्यक्त और सनातन हैं। उन्हीं के अधीन यह संपूर्ण संसार है।