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सनातन धर्म में स्वाध्याय का महत्व
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के 'नियम' अंग में **स्वाध्याय (Self-Study/Scriptural Study)** को अनिवार्य माना है। स्वाध्याय से मनुष्य की बुद्धि परिष्कृत होती है और वह सही मार्ग का चयन कर पाता है:
जैसे प्रतिदिन स्नान करने से शरीर शुद्ध होता है, वैसे ही प्रतिदिन शास्त्रों का पाठ करने और धार्मिक जिज्ञासा सुलझाने से मन और बुद्धि के कुत्सित विचार समाप्त होते हैं।
जब युवा और बच्चे रामायण और गीता के इतिहास से जुड़े क्विज़ या चर्चाओं में भाग लेते हैं, तो उनके भीतर मर्यादा, त्याग और निष्काम कर्म योग के संस्कार स्वतः ही अंकुरित होने लगते हैं।
धर्म विज्ञान शंका समाधान (FAQs)
संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी
क्विज़ प्रश्न निर्माण
भक्तिलोक स्वाध्याय परिषद (Bhaktilok Swadhyaya Council)
विभिन्न मूल संस्कृत ग्रंथों, पुराणों और प्राचीन महाकाव्यों के प्रामाणिक अनुवादों के आधार पर तथ्यपरक प्रश्न तैयार करने वाली परिषद।
संस्कृत व इतिहास समीक्षा
आचार्य श्रीधर त्रिपाठी (Acharya Shridhar Tripathi)
संस्कृत व्याकरण विभाग, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय। २८+ वर्षों का शास्त्र अध्यापन अनुभव।
प्रश्नोत्तरी प्रामाणिकता सत्यापित