सनातन देव स्वरूप का दार्शनिक व वैज्ञानिक रहस्य
ऋग्वेद का अमर उद्घोष है – "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (अर्थात् सत्य या परमेश्वर एक ही है, जिसे ज्ञानी व ऋषिगण विभिन्न नामों और रूपों में पुकारते हैं)। सनातन धर्म में ३३ करोड़ नहीं, अपितु ३३ कोटि (३३ प्रकार/श्रेणियां) देव शक्तियों का वर्णन है, जिनमें १२ आदित्य, ११ रुद्र, ८ वसु और २ अश्विनी कुमार सम्मिलित हैं। ये समस्त दिव्य शक्तियां परब्रह्म के ही विभिन्न ब्रह्मांडीय कार्यों (सृजन, पालन, संहार, ज्ञान, ऐश्वर्य व प्राण) का संचालन करती हैं।
१. देव वाहनों (Vahanas) का गहरा मनोवैज्ञानिक अर्थ
प्रत्येक देवी-देवता का वाहन किसी न किसी मूल मानवीय वृत्ति, अहंकार या प्राकृतिक शक्ति के संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है:
भगवान शिव और नंदी (Nandi)
नंदी वृषभ (बैल) केवल वाहन नहीं, अपितु धर्म, अटूट निष्ठा व निरंतर समाधिमग्न प्रतीक्षा का प्रतीक हैं। वे सिखाते हैं कि ईश्वर के सम्मुख शांत चित्त से बैठना ही परम साधना है।
श्री गणेश और मूषक (Mooshak)
चूहा अंधेरे में कुतरने और चंचल रहने वाला जीव है, जो मानव के चंचल मन व संशय का प्रतीक है। गणेश जी मूषक पर सवार होकर मन की चंचलता पर विवेक के नियंत्रण का संदेश देते हैं।
माँ दुर्गा और सिंह (Lion)
सिंह उग्रता, क्रोध और अदम्य शारीरिक शक्ति का सूचक है। माता दुर्गा सिंह पर आसीन होकर यह दर्शाती हैं कि आध्यात्मिक चेतना द्वारा क्रोध व पशु-बल को वश में किया जा सकता है।
माँ सरस्वती और हंस (Hansha)
हंस में नीर-क्षीर विवेक (दूध और पानी को अलग करने की अद्भुत क्षमता) होती है। यह विशुद्ध विवेक, सत्य-असत्य के भेद तथा आत्मज्ञान का प्रतीक है।
२. घर के मंदिर में देव विग्रह स्थापित करने के ५ अनिवार्य नियम
- विग्रहों की ऊंचाई: गृहस्थों के घर के मंदिर में मूर्तियों की ऊंचाई अंगूठे के पोर से लेकर अधिकतम ९ इंच (लगभग बालिश्त भर) तक ही होनी चाहिए। इससे बड़ी मूर्तियों के लिए नित्य षोडशोपचार पूजा व कठोर प्राण प्रतिष्ठा नियम लागू होते हैं।
- विग्रहों का सम्मुख न होना: मंदिर में कभी भी दो देव मूर्तियां एक-दूसरे के आमने-सामने नहीं होनी चाहिए। सभी विग्रहों का मुख पूर्व या पश्चिम दिशा की ओर होना शुभ माना गया है।
- गणेश व शंख संख्या नियम: एक ही घर में ३ गणेश जी की मूर्तियां, २ शिवलिंग, अथवा २ शंख एक साथ पूजा स्थल पर स्थापित करना शास्त्रसम्मत नहीं माना जाता।
- शिवलिंग का आकार: घर में अंगूठे के पहले पोर से बड़ा शिवलिंग नहीं रखना चाहिए। नर्मदेश्वर शिवलिंग को सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इसे प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती।
- खंडित मूर्तियों का विसर्जन: किसी भी खंडित या चटकी हुई मूर्ति की पूजा वर्जित है। ऐसी मूर्तियों को ससम्मान किसी पवित्र नदी, सरोवर अथवा पीपल के वृक्ष की जड़ में विसर्जित कर देना चाहिए।