मंत्र जप योग: चेतना रूपांतरण, स्नायु तंत्र व नाद ब्रह्म का विज्ञान
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं: "यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि" (१०.२५)—अर्थात समस्त यज्ञों में मैं 'जप यज्ञ' हूँ। मंत्र जप सनातन योग का वह परम विज्ञान है जिसमें ध्वनि तरंगों (Sound Frequencies) और मानसिक एकाग्रता के माध्यम से मानव मस्तिष्क की प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत किया जाता है।
१. जप साधना के चार शास्त्रीय स्तर (Four Levels of Japa)
शास्त्रों में जप साधना की गहराई के आधार पर चार प्रमुख अवस्थाएं बताई गई हैं:
मंत्र का स्पष्ट एवं ऊंचे स्वर में उच्चारण। यह चंचल मन को एकाग्र करने और बाह्य विक्षेपों को दूर करने का प्रारंभिक साधन है।
केवल होंठ और जिह्वा हिलते हैं, परंतु ध्वनि इतनी सूक्ष्म होती है कि केवल स्वयं साधक ही सुन सके। यह वैखरी से सौ गुना अधिक फलदायी माना गया है।
बिना होंठ या जिह्वा हिलाए पूर्णतः मन के भीतर विचार रूप में मंत्र का प्रवाह। यह उपांशु से हजार गुना अधिक शक्तिशाली है।
साधना की वह पराकाष्ठा जहाँ प्रयास समाप्त हो जाता है और प्रत्येक श्वास-प्रश्वास के साथ 'सोऽहम्' मंत्र का स्वतः अखंड प्रवाह होने लगता है।
२. जप माला में १०८ मनकों का खगोलीय व यौगिक रहस्य
माला में ठीक १०८ मनके होने का वैज्ञानिक कारण है: वैदिक ज्योतिष के अनुसार आकाश मंडल में २७ नक्षत्र होते हैं और प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण (पाद) होते हैं (२७ × ४ = १०८)। इसके अतिरिक्त सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग १०८ गुना है तथा सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास की लगभग १०८ गुनी है। अतः १०८ मनकों का एक चक्र संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा की परिक्रमा का प्रतीक है।