सनातन शक्तिपीठ ज्ञानकोश व तीर्थ मार्गदर्शिका

५१ शक्तिपीठ सम्पूर्ण दर्शन व साधना मार्गदर्शिका

दक्ष यज्ञ की अग्नि से लेकर सुदर्शन चक्र द्वारा ५१ अंगों के पावन विच्छेदन, ४ आदि शक्तिपीठों, शक्ति-भैरव युगल सारणी, तांत्रिक साधना रहस्य एवं अखंड भारत के दिव्य तीर्थों का प्रामाणिक संदर्भ।

कुल शक्तिपीठ
५१ प्रमुख तीर्थ
आदि शक्तिपीठ
४ परम पीठ
उद्भव शास्त्र
कालिका व देवी भागवत
भौगोलिक विस्तार
६ देश (अखंड भारत)
संरक्षक स्वरूप
५१ भैरव स्वरूप
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१. शक्तिपीठों का उद्भव – दक्ष यज्ञ, सती आत्मदाह व शिव तांडव

सनातन हिंदू धर्म और शाक्त परंपरा में शक्तिपीठ (Shakti Peethas) वे परम पावन और ऊर्जावान तीर्थ हैं, जहां जगज्जननी आद्याशक्ति देवी सती के पावन पार्थिव शरीर के विभिन्न अंग, आभूषण और वस्त्र गिरे थे। इन पीठों का आध्यात्मिक महत्व न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह कुण्डलिनी योग, तंत्र साधना और वैश्विक चेतना के जाग्रत ऊर्जा केंद्रों (Energy Vortexes) के रूप में प्रतिष्ठित है।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

शास्त्रीय भावार्थ: हे समस्त मंगलों को भी मंगल प्रदान करने वाली, परम कल्याणमयी, समस्त पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, त्रिनेत्रा गौरी नारायणी! आपको बारंबार नमन है।

दक्ष प्रजापति का वृहस्पति-सव यज्ञ व देवी सती का अपमान

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण, कालिका पुराण तथा शिव महापुराण के रुद्र संहिता खंड के अनुसार, ब्रह्माजी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष ने कनखल (वर्तमान हरिद्वार) में एक विशाल वृहस्पति-सव यज्ञ का आयोजन किया। दक्ष ने अपने पूर्व अहंकार व द्वेष के कारण देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और अपनी ही पुत्री देवी सती को इस महायज्ञ में आमंत्रित नहीं किया।

भगवान शिव द्वारा मना किए जाने पर भी देवी सती अपने पिता के यज्ञ में गईं। वहां प्रजापति दक्ष ने भगवान शिव के प्रति घोर अपमानजनक, तिरस्कारपूर्ण और निंदनीय शब्दों का प्रयोग किया। पति के घोर अपमान को सहन न कर पाने के कारण सती ने यज्ञ सभा में ही योगबल द्वारा अपने अंतःकरण में योगाग्नि प्रज्वलित की और स्वयं को उस दिव्य योगाग्नि में भस्म (आत्मदाह) कर दिया।

वीरभद्र प्राकट्य, यज्ञ विध्वंस व शिव का रौद्र तांडव

जब भगवान शिव को सती के आत्मदाह का समाचार मिला, तो वे अत्यंत क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपनी जटा से एक बाल उखाड़कर पर्वत पर पटका, जिससे महाकाल के समान भयंकर वीरभद्र और महाकाली का प्राकट्य हुआ। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया और प्रजापति दक्ष का मस्तक धड़ से अलग कर दिया (बाद में प्रार्थना पर बकरे का सिर लगाया गया)।

इसके उपरांत शोकमग्न और विरही भगवान शिव ने सती के पावन पार्थिव शरीर को अपने कंधे पर उठा लिया और संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रलयंकारी रौद्र तांडव करने लगे। शिव के इस विलाप और तांडव से सृष्टि की धुरी डोलने लगी, प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा और समस्त देवगण भयभीत हो उठे।

सुदर्शन चक्र द्वारा ५१ अंगों का विच्छेदन

ब्रह्मांड को प्रलय से बचाने और भगवान शिव का मोह-शोक भंग करने हेतु भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने अमोघ सुदर्शन चक्र को प्रेरित किया। सुदर्शन चक्र ने सती के पार्थिव शरीर को क्रमशः ५१ पावन भागों में विभक्त कर दिया।

जहाँ-जहाँ सती के अंग, आभूषण अथवा वस्त्र गिरे, वे स्थान पृथ्वी पर परम पूज्य 'शक्तिपीठ' बन गए। प्रत्येक स्थान पर पराशक्ति की असीम ऊर्जा को संतुलित करने हेतु भगवान शिव ने स्वयं को एक-एक 'भैरव' के रूप में स्थापित किया। अतः बिना भैरव दर्शन के किसी भी शक्तिपीठ की साधना या यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती।

२. सनातन के ४ प्रमुख 'आदि शक्तिपीठ' (The 4 Adi Shakti Peethas)

कालिका पुराण और तंत्र चूड़ामणि के अनुसार ५१ शक्तिपीठों में से ४ आदि शक्तिपीठ सर्वोपरि माने गए हैं, जो सृष्टि के चार प्रमुख अंगों (पाद, स्तन, योनि और मुख/अंगुष्ठ) का प्रतिनिधित्व करते हैं:

१. पाद पीठ (Foot)

माँ विमला देवी शक्तिपीठ

श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर, पुरी (ओडिशा)

यहाँ देवी सती के दोनों चरण (पाद) गिरे थे। यहाँ देवी 'विमला' और भैरव 'जगन्नाथ' हैं। जगन्नाथ जी को अर्पित महाप्रसाद पहले विमला देवी को भोग लगाया जाता है, तभी वह महाप्रसाद बनता है।

२. स्तन पीठ (Breasts)

माँ तारा तारिणी शक्तिपीठ

ऋषिकुल्या नदी तट, गंजम (ओडिशा)

यहाँ देवी सती के स्तन (वक्षस्थल) गिरे थे। यहाँ शक्ति 'तारा तारिणी' और भैरव 'करुणामय' हैं। यह पीठ नाविकों और साधकों को अभय व आत्मिक पोषण प्रदान करने वाली मातृशक्ति है।

३. योनि पीठ (Genitals)

माँ कामाख्या शक्तिपीठ

नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी (असम)

सृष्टि का मूल उत्पत्ति केंद्र। यहाँ सती की योनि का पतन हुआ था। यहाँ शक्ति 'कामाख्या' और भैरव 'उमानंद' हैं। यहाँ कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक प्राकृतिक जलकुण्ड की योनि शिला के रूप में पूजा होती है।

४. मुख / अंगुष्ठ पीठ

माँ कालीघाट शक्तिपीठ

कोलकाता, हुगली तट (पश्चिम बंगाल)

यहाँ देवी सती के दाहिने पैर की चार उंगलियाँ व अंगूठा गिरा था। यहाँ शक्ति 'कालिका' और भैरव 'नकुलीश' हैं। यह तंत्र साधना और संहारक-तारक काली उपासना का परम जाग्रत केंद्र है।

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३. सम्पूर्ण ५१ शक्तिपीठों की प्रामाणिक सारणी (अंग, शक्ति, भैरव व स्थान)

नीचे तंत्र चूड़ामणि और शिवचरित्र के अनुसार भारत, नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और तिब्बत में स्थित ५१ शक्तिपीठों की प्रामाणिक एवं विस्तृत सूची दी गई है:

क्र.सं. शक्तिपीठ का नाम पतित अंग / आभूषण शक्ति (देवी का नाम) भैरव स्वरूप वर्तमान भौगोलिक स्थान
१ हिंगलाज (Hinglaj) ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) कोट्टरी / हिंगुला भीमलोचन बलूचिस्तान, पाकिस्तान (हिंगोल नदी तट)
२ शर्कररे (Karavira / Sharkara) त्रिनेत्र (आंखें) महिषमर्दिनी क्रोधीश सुक्कुर / कराची के समीप, पाकिस्तान
३ सुगंधा (Sugandha) नासिका (नाक) सुनंदा / सुगंधा त्र्यंबक शिकारपुर, बरिसाल, बांग्लादेश
४ अमरनाथ (Amarnath) कंठ (गला) महामाया त्रिसंध्येश्वर पहलगाम, जम्मू-कश्मीर
५ ज्वालामुखी (Jwalamukhi) जिह्वा (जीभ) सिद्धिदा / अंबिका उन्मत्त कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
६ जालंधर (Jalandhar) बायां स्तन त्रिपुरमालिनी भीषण जालंधर (देवी तालाब), पंजाब
७ वैद्यनाथ (Vaidyanath) हृदय (Heart) जयदुर्गा वैद्यनाथ देवघर, झारखंड
८ गुह्येश्वरी (Guhyeshwari) दोनों घुटने महामाया कपाली काठमांडू, नेपाल (पशुपतिनाथ निकट)
९ मानस (Manasa) दाहिनी हथेली दाक्षायणी अमर मानसरोवर झील तट, तिब्बत (चीन)
१० विरजा / पुरी (Biraja / Puri) नाभि (Navel) विमला / विरजा जगन्नाथ जाजपुर / पुरी, ओडिशा
११ गंडकी (Gandaki) मस्तक / ललाट गंडकी चंडी चक्रपाणि मुक्तिनाथ, गंडकी नदी तट, नेपाल
१२ बाहुला (Bahula) बायां हाथ बाहुला भीरुक केतुग्राम, पूर्व बर्धमान, पश्चिम बंगाल
१३ उज्जयिनी (Ujjayini / Mangal Chandika) कुहनी (Elbow) मंगल चंडिका कपिलांबर उजानी, बर्धमान, पश्चिम बंगाल
१४ चट्टल (Chattala / Chandranath) दाहिनी भुजा भवानी चंद्रशेखर सीताकुंड, चटगांव, बांग्लादेश
१५ त्रिपुर सुंदरी (Tripura Sundari) दायां पैर त्रिपुर सुंदरी त्रिपुरेश माताबारी, उदयपुर, त्रिपुरा
१६ त्रिस्रोता (Trisrota / Bhramari) बायां पैर भ्रामरी ईश्वर / अंबर जलपाईगुड़ी, तीस्ता नदी, पश्चिम बंगाल
१७ कामाख्या (Kamakhya) योनि (Yoni) कामाख्या उमानंद नीलाचल पर्वत, गुवाहाटी, असम
१८ युगाद्या (Yugadya) दाहिने पैर का अंगूठा भूतधात्री क्षीरखंडक खीरग्राम, बर्धमान, पश्चिम बंगाल
१९ कालीघाट (Kalighat) दाहिने पैर की उंगलियां कालिका नकुलीश कोलकाता, पश्चिम बंगाल
२० प्रयाग (Alopi Devi / Prayagraj) हाथ की उंगलियां ललिता / अलोपी भव प्रयागराज संगम, उत्तर प्रदेश
२१ जयंती (Jayanti) बायीं जंघा (Left Thigh) जयंती क्रमदीश्वर नातियांग, जयंतिया हिल्स, मेघालय
२२ किरीट (Kireeteshwari) मुकुट (Crown) विमला / किरीटेश्वरी संवर्त मुर्शिदाबाद, पश्चिम बंगाल
२३ विशालाक्षी (Varanasi) मणिकर्णिका / कुंडल विशालाक्षी कालभैरव मीरघाट, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
२४ कन्याश्रम (Kanyashram) पीठ (Back) शर्वाणी निमिष कन्याकुमारी, तमिलनाडु
२५ कुरुक्षेत्र (Bhadrakali) दायां टखना (Right Ankle) सावित्री / भद्रकाली स्थाणु थानेसर, कुरुक्षेत्र, हरियाणा
२६ मणिवेदिक (Manivedika / Pushkar) कलाई (Wrists) गायत्री सर्वानंद पुष्कर, अजमेर, राजस्थान
२७ श्रीशैल (Bhramaramba) ग्रीवा (गर्दन की हड्डी) भ्रमराम्बा / महालक्ष्मी शंबरानंद श्रीशैलम, आंध्र प्रदेश
२८ कांची (Kanchi Kamakshi) कंकाल / अस्थि देवगर्भा रुरु कांचीपुरम, तमिलनाडु
२९ कालमाधव (Kalmadhav) बायां नितंब काली असितांग शोण नदी तट, अमरकंटक, मध्य प्रदेश
३० शोणदेश (Shondesh / Narmada) दायां नितंब नर्मदा भद्रसेन अमरकंटक, मध्य प्रदेश
३१ रामगिरि (Ramgiri / Chitrakoot) दायां स्तन शिवानी चंड चित्रकूट, उत्तर प्रदेश / सतना
३२ वृंदावन (Katyayani) केश गुच्छ (Hair Ringlet) उमा / कात्यायनी भूतेश वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश
३३ शुचि (Suchindram) ऊपरी दांत नारायणी संहार शुचिंद्रम, कन्याकुमारी, तमिलनाडु
३४ पंचसागर (Panchasagar) निचले दांत वाराही महारुद्र हरिद्वार / उत्तर भारत
३५ करतोया तट (Karatoya / Aparna) बायां तल्प / वस्त्र अपर्णा वामन भवानीपुर, बोगरा, बांग्लादेश
३६ श्रीपर्वत (Sriparvata) दायां पाद तल श्रीसुंदरी सुंदरानंद लद्दाख / कश्मीर सीमा
३७ विभाष (Vibhash / Tamluk) बायां टखना कपालिनी / भीमरूपा सर्वानंद तामलुक, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
३८ प्रभास (Prabhas / Somnath) उदर (Stomach) चंद्रभागा वक्रतुंड प्रभास पाटन, सोमनाथ, गुजरात
३९ भैरवपर्वत (Bhairavparvat / Ujjain) ऊपरी ओंठ अवंती / गढ़कालिका लंबकर्ण भैरव पर्वत, उज्जैन, मध्य प्रदेश
४० जनस्थान (Janasthan / Nashik) ठोड़ी (Chin) भ्रामरी विकृताक्ष पंचवटी, नासिक, महाराष्ट्र
४१ गोदावरी तीर (Godavari Teer) दोनों गाल (Cheeks) विश्वमेश्वरी / रुक्मिणी दंडपाणि कोटिलिंगेश्वर, राजमुंदरी, आंध्र प्रदेश
४२ रत्नावली (Ratnavali) दाहिना स्कंध (Shoulder) कुमारी शिव हुगली, पश्चिम बंगाल
४३ मिथिला (Mithila / Janakpur) बायां स्कंध उमा / महोदरी महोदर जनकपुर (नेपाल सीमा) / मधुबनी, बिहार
४४ नलहाटी (Nalhati) कंठ नली (Vocal Cord) कालिका / नलतेश्वरी योगेश नलहाटी, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
४५ कर्णाट (Karnat) दोनों कान जयदुर्गा अभिरु कांगड़ा / कर्नाटक क्षेत्र
४६ वक्रेश्वर (Vakreshwar) मन / भ्रूमध्य (Eyebrows) महिषमर्दिनी वक्रनाथ वक्रेश्वर (उष्ण कुंड), बीरभूम, पश्चिम बंगाल
४७ यशोर (Jessoreshwari) हाथ और पैर यशोरेश्वरी चंड ईश्वरपुर, खुलना, बांग्लादेश
४८ अट्टहास (Attahasa) ओंठ (Lips / Smile) फुल्लरा विश्वेश लाभापुर, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
४९ नंदीपुर (Nandipur) गले का हार (Necklace) नंदिनी नंदिकेश्वर सैंथिया, बीरभूम, पश्चिम बंगाल
५० लंका (Lanka / Indrakshi) नूपुर / पाजेब (Anklets) इंद्राक्षी / शांकरी राक्षसेश्वर त्रिंकोमाली / जाफना, श्रीलंका
५१ विराट (Virat / Bairat) बाएं पैर की उंगलियां अंबिका अमृत बैराट, जयपुर के समीप, राजस्थान

४. प्रमुख शक्तिपीठों का विशद दर्शन व आध्यात्मिक रहस्य

१. माँ कामाख्या (असम)

नीलाचल पर्वत पर स्थित कामाख्या तंत्र की राजधानी कही जाती है। यहाँ प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में अम्बुबाची पर्व मनाया जाता है जब ब्रह्मपुत्र नदी का जल रक्तवर्ण हो जाता है। यह समस्त सिद्धियों और प्रजनन ऊर्जा का स्रोत है।

२. ज्वाला जी (हिमाचल प्रदेश)

कांगड़ा घाटी में स्थित ज्वालामुखी शक्तिपीठ में देवी की जिह्वा गिरी थी। यहाँ बिना किसी ईंधन, तेल या बाती के नौ प्राकृतिक दिव्य ज्योतियां अनादि काल से निरंतर प्रज्वलित हैं, जिसे विज्ञान भी नहीं समझ सका।

३. हिंगलाज माता (बलूचिस्तान)

पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंगोल नदी किनारे स्थित गुफा शक्तिपीठ। यहाँ सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था। इसे मुस्लिम समुदाय 'नानी का हज' और हिंदू 'हिंगलाज तीर्थ' के रूप में अगाध श्रद्धा से पूजते हैं।

४. अलोपी देवी (प्रयागराज)

संगम तट पर स्थित अलोपी शक्तिपीठ में देवी का पंजा गिरकर 'अलोप' (अदृश्य) हो गया था। गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक काष्ठ पालना (झूला) है, जो निराकार पराशक्ति का प्रतीक है।

५. विशालाक्षी मंदिर (काशी)

वाराणसी में मीरघाट पर स्थित विशालाक्षी शक्तिपीठ में सती के कान के कुंडल व मणिकर्णिका गिरे थे। यहाँ कालभैरव के साथ माँ विशालाक्षी के दर्शन से जन्म-जन्मांतर के कर्म बंधन कट जाते हैं।

६. तारापीठ व वक्रेश्वर (बंगाल)

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ और वक्रेश्वर अघोर व वामाचार तंत्र साधना के शीर्ष केंद्र हैं। यहाँ महर्षि वशिष्ठ और साधक बामाखेपा ने प्रत्यक्ष सिद्धि प्राप्त की थी।

५. शक्तिपीठ साधना विधि, गुप्त नवरात्र व आध्यात्मिक नियम

शक्तिपीठ केवल दर्शन के तीर्थ नहीं हैं, बल्कि ये उच्च आध्यात्मिक साधना और आत्मसाक्षात्कार के प्राण केंद्र हैं। शास्त्रों में शक्तिपीठ दर्शन एवं साधना हेतु विशिष्ट नियम बताए गए हैं:

शक्ति-भैरव युगल पूजन विधान

किसी भी शक्तिपीठ पर केवल देवी के दर्शन से साधना अधूरी मानी जाती है। देवी के साथ वहां स्थापित 'भैरव' का अभिषेक व पूजन अनिवार्य है ताकि उग्र ऊर्जा सौम्य व फलदायी बन सके।

सर्वोत्तम साधना तिथियां

चैत्र व शारदीय नवरात्र, माघ व आषाढ़ की गुप्त नवरात्र, महाशिवरात्रि, सूर्य/चंद्र ग्रहण काल और प्रत्येक मास की शुक्लाष्टमी व पूर्णिमा शक्तिपीठ साधना के लिए अनंत फलदायी हैं।

साधक का आचरण व शुचिता

शक्तिपीठ परिसर में पूर्ण सात्विकता, ब्रह्मचर्य, मौन, लाल या पीले वस्त्र धारण तथा अहंकार रहित शरणागति भाव से प्रवेश करना चाहिए।

कुण्डलिनी चक्र संरेखण

प्रत्येक शक्तिपीठ मानव शरीर के षट्चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा व सहस्रार) में से किसी न किसी चक्र से सूक्ष्म रूप से जुड़ा हुआ है।

६. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

कालिका पुराण, देवी भागवत और शिव पुराण के अनुसार शक्तिपीठों की संख्या ५१ मानी गई है। प्रजापति दक्ष के यज्ञ में देवी सती के आत्मदाह के उपरांत, शोकाकुल भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। तब सृष्टि रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को ५१ भागों में विभक्त किया। ये अंग जहां-जहां गिरे, वे स्थान परम पावन 'शक्तिपीठ' कहलाए।

प्राचीन तंत्र चूड़ामणि और कालिका पुराण के अनुसार ४ प्रधान आदि शक्तिपीठ हैं: १. पुरी (ओडिशा) – विमला देवी (पाद पीठ), २. बरहामपुर (ओडिशा) – तारा तारिणी (स्तन पीठ), ३. गुवाहाटी (असम) – कामाख्या देवी (योनि पीठ), और ४. कोलकाता (पश्चिम बंगाल) – कालीघाट (मुख/अंगुष्ठ पीठ)।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार पराशक्ति की उग्र और जाग्रत ऊर्जा के संरक्षण व साधकों की रक्षा हेतु प्रत्येक शक्तिपीठ पर भगवान शिव के एक विशिष्ट 'भैरव' स्वरूप की उपस्थिति अनिवार्य होती है। शक्तिपीठ की यात्रा और साधना तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक वहां स्थित भैरव का दर्शन व पूजन न कर लिया जाए।

असम के गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत पर स्थित कामाख्या देवी शक्तिपीठ में सती का योनि भाग गिरा था। यहां गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं बल्कि एक प्राकृतिक प्रस्तर शिला रूपी योनि से अनवरत प्राकृतिक जल प्रवाहित होता है। प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में माँ कामाख्या का वार्षिक रजस्वला पर्व 'अम्बुबाची योग' मनाया जाता है जिसमें ३ दिन मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।

अखंड भारत की सांस्कृतिक सीमाओं के अनुसार शक्तिपीठ पड़ोसी देशों में भी स्थित हैं: पाकिस्तान में हिंगलाज माता (बलूचिस्तान) व शर्कररे; नेपाल में गुह्येश्वरी (काठमांडू) व गंडकी (मुक्तिनाथ); बांग्लादेश में सुगंधा, चट्टल, यशोरेश्वरी व करतोया; श्रीलंका में शांकरी/इंद्राक्षी (त्रिंकोमाली); और तिब्बत (चीन) में मानसरोवर तट पर स्थित मानस शक्तिपीठ।

शक्तिपीठों में साधना हेतु चैत्र व शारदीय नवरात्र के अलावा माघ व आषाढ़ के दोनों गुप्त नवरात्र सर्वोत्तम माने गए हैं। इसके अतिरिक्त प्रत्येक मास की अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा तथा ग्रहण काल में की गई साधना अनंत गुना फल प्रदान करती है।
संपादकीय पारदर्शिता एवं शास्त्रीय संदर्भ:

यह मार्गदर्शिका कालिका पुराण, श्रीमद्देवीभागवत, तंत्र चूड़ामणि एवं विभिन्न शक्तिपीठ न्यासों के उपलब्ध संदर्भों के आधार पर तैयार की गई है। विभिन्न संप्रदायों और ग्रंथों में कुछ शक्तिपीठों के स्थानों अथवा भैरव नामों में सूक्ष्म मतांतर संभव हैं। यात्रा से पूर्व संबंधित मंदिर न्यास के दर्शन नियमों का अवश्य अवलोकन करें।

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माँ दुर्गा नवार्ण मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे

प्रतिदिन १०८ बार इस मंत्र का जप समस्त शक्तिपीठों की कृपा व सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।