सनातन दर्शन में 'संस्कार' का विज्ञान व न्यूरोप्लास्टिसिटी
महर्षि पतंजलि के **योगसूत्र (Yoga Sutras)** में संस्कार को चित्त की आंतरिक गहराइयों में संचित होने वाले कर्म-बीज के रूप में समझाया गया है। आधुनिक न्यूरो-साइंस जिसे Neuroplasticity कहता है—अर्थात बार-बार दोहराए जाने वाले विचार मस्तिष्क में नए न्यूरल पाथवे (Neural Pathways) का निर्माण करते हैं—उसे हमारे ऋषियों ने सहस्रों वर्ष पूर्व 'संस्कार निर्माण' कहा था।
१. २१/९० दिवस मण्डल नियम (21/90 Mandala Cycle)
शास्त्रों में किसी भी अनुष्ठान को सिद्ध करने हेतु ४० दिन (एक मण्डल) का विधान है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार:
- २१ दिन: पुराने अवचेतन प्रतिरोध को तोड़कर नई सात्त्विक आदत स्थापित करने हेतु आवश्यक समय।
- ९० दिन: नई आदत को स्थायी जीवनशैली (Lifestyle) और चरित्र में रूपांतरित करने का चक्र।
२. तमोगुण (आलस्य) पर विजय प्राप्त करने के ३ यौगिक सूत्र
रात्रि में १० बजे से पूर्व शयन करने पर ही प्रातः ४:३० बजे ब्रह्ममुहूर्त में बिना आलस्य के उठा जा सकता है। प्रातः जागरण की तैयारी पूर्व रात्रि से होती है।
शय्या त्यागते ही ३ मिनट गहरी भस्त्रिका अथवा कपालभाति प्राणायाम करें। इससे मस्तिष्क में तुरंत ऑक्सीजन युक्त प्राण प्रवाहित होता है और तमोगुण नष्ट हो जाता है।
हथेलियों के दर्शन (कराग्रे वसते लक्ष्मी...) और पृथ्वी माता को प्रणाम करने से मन में कृतज्ञता का संचार होता है।