वर्ष २०२६ की समस्त एकादशी तिथियां
सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)
साल की प्रथम एकादशी। पाँच हजार वर्ष तक तपस्या करने का पुण्य फल मात्र इस एक व्रत से प्राप्त होता है। समस्त कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
पौष पुत्रदा एकादशी (Pausha Putrada)
संतान प्राप्ति, संतान के आरोग्य, सुयश व वंश वृद्धि हेतु यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi)
तिल के ६ रूपों (स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन व दान) में उपयोग का विधान। समस्त पापों का शमन होता है।
जया एकादशी (Jaya Ekadashi)
पिशाच व भूत योनि से मुक्ति दिलाने वाली पावन एकादशी। साधक को ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्ति मिलती है।
विजया एकादशी (Vijaya Ekadashi)
लंका पर विजय प्राप्ति हेतु मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने समुद्र तट पर यह व्रत किया था। कठिन समय में विजय प्रदाता।
आमलकी एकादशी (Amalaki Ekadashi)
आंवले के पवित्र वृक्ष का पूजन। आंवले में भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी का साक्षात् वास माना जाता है। समस्त तीर्थों के दर्शन का फल।
पापमोचिनी एकादशी (Papmochani)
जाने-अनजाने में हुए समस्त संचित पापों के प्रायश्चित और निवारण हेतु चैत्र मास की परम कल्याणकारी एकादशी।
कामदा एकादशी (Kamada Ekadashi)
साधक की समस्त सात्विक मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली एकादशी। शाप मुक्ति एवं संकटों से रक्षा होती है।
वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi)
अखंड सौभाग्य, ऐश्वर्य व परलोक में मोक्ष प्रदाता। दस हजार वर्ष तक तपस्या करने व कन्यादान के समान फल मिलता है।
मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi)
समुद्र मंथन के पश्चात अमृत वितरण हेतु भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया था। सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्ति।
अपरा एकादशी (Apara Ekadashi)
अपार धन-धान्य, यश और कीर्ति प्रदाता। ब्रह्महत्या, परनिंदा और असत्य भाषण जैसे दोषों से मुक्ति दिलाती है।
निर्जला एकादशी (Nirjala / Bhimseni)
वर्ष की सबसे कठिन व श्रेष्ठ एकादशी। बिना जल ग्रहण किए यह व्रत रखने से वर्ष की संपूर्ण २४ एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है।
योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi)
शारीरिक व्याधियों, कुष्ठ रोग तथा असाध्य कष्टों के निवारण हेतु आषाढ़ मास की प्रमुख एकादशी।
देवशयनी एकादशी (Devshayani)
भगवान विष्णु क्षीरसागर में ४ मास के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। चातुर्मास का शुभारंभ होता है। समस्त मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
कामिका एकादशी (Kamika Ekadashi)
श्रावण मास में भगवान श्रीहरि की तुलसी पत्र से पूजा करने पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। पितरों को तृप्ति मिलती है।
श्रावण पुत्रदा एकादशी (Pavitropana)
संतान की दीर्घायु, यश और सद्गुणों की प्राप्ति हेतु यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
अजा एकादशी (Aja Ekadashi)
राजा हरिश्चंद्र ने इस व्रत के प्रभाव से अपना खोया हुआ राज्य, पुत्र और मान-सम्मान पुनः प्राप्त किया था।
परिवर्तिनी / पद्मा एकादशी (Parivartini)
योगनिद्रा में भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, अतः इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। वामन अवतार की पूजा का विशेष विधान।
इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi)
पितृ पक्ष में आने वाली एकादशी। इस व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित करने से उन्हें यमलोक की यातना से मुक्ति मिलकर वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
पापांकुशा एकादशी (Papankusha)
मनुष्य के समस्त मानसिक, वाचिक और शारीरिक पापों पर अंकुश लगाने वाली एकादशी। सूर्यलोक व वैकुंठ लोक की प्राप्ति।
रमा एकादशी (Rama Ekadashi)
दीपावली से पूर्व आने वाली एकादशी। माँ लक्ष्मी के 'रमा' स्वरूप की कृपा से दरिद्रता का नाश और अखंड सुख-समृद्धि की प्राप्ति।
देवउठनी / प्रबोधिनी एकादशी (Devutthana)
भगवान विष्णु ४ मास की योगनिद्रा के उपरांत जागते हैं। चातुर्मास समापन, तुलसी विवाह और विवाह आदि मांगलिक कार्यों का शुभारंभ।
उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi)
भगवान विष्णु के शरीर से एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था जिन्होंने मुर नामक राक्षस का वध किया था। एकादशी व्रत का आरंभ इसी दिन से किया जाता है।
मोक्षदा एकादशी (Mokshada / Gita Jayanti)
इसी पावन दिन भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को 'श्रीमद्भगवद्गीता' का अमर उपदेश दिया था। गीता जयंती व मोक्ष प्रदाता।