मंत्र साधना का आध्यात्मिक, भौतिक एवं न्यूरोसाइंस विज्ञान
सनातन ध्यान पद्धति में 'मंत्र' शब्द की व्युत्पत्ति दो मूल शब्दों से हुई है: 'मननात् त्रायते इति मन्त्रः'—अर्थात जिसके मनन और जप से मन का त्राण (समस्त संतापों, वासनाओं और चंचलता से रक्षा) हो, वही मंत्र है। मंत्र केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि ध्वनि तरंगों (Acoustic Frequencies) का गणितीय संकलन है।
१. मंत्र जप के ४ शास्त्रीय स्तर (Vaikhari to Para)
योगशास्त्र में मंत्र जप को सूक्ष्मता के आधार पर ४ श्रेणियों में बांटा गया है:
- १. वैखरी (Vaikhari): मुख से स्पष्ट बोलकर उच्चारण करना, जिसे दूसरे भी सुन सकें। यह शुरुआती साधकों के मन को भटकाव से रोकने हेतु उपयुक्त है।
- २. मध्यमा (Madhyama): केवल होंठ और जीभ हिलते हैं, किंतु कोई ध्वनि बाहर नहीं निकलती। यह वैखरी से १० गुना अधिक प्रभावशाली है।
- ३. पश्यन्ती (Pashyanti): बिना होंठ हिलाए, मन के भीतर मंत्र का निरंतर प्रवाह चलना (मानसिक जप)। यह १०० गुना अधिक फलदायी है।
- ४. परा (Para): जप का उच्चतम स्तर जहाँ साधक को जप करना नहीं पड़ता, बल्कि हृदय में अनाहत नाद की तरह 'अजपा-जप' स्वतः गूंजता रहता है।
२. जप माला में १०८ मनकों का खगोलीय व गणितीय रहस्य
शास्त्रों में किसी भी मंत्र की न्यूनतम एक माला यानी १०८ बार जप का विधान है। इसके पीछे गहरा खगोलीय संतुलन निहित है:
वैदिक ज्योतिष में संपूर्ण आकाश २७ नक्षत्रों में बंटा है। प्रत्येक नक्षत्र के ४ चरण होते हैं। इस प्रकार २७ × ४ = १०८ होता है। १०८ बार जप करने से संपूर्ण ब्रह्मांडीय नक्षत्रों का शुभ प्रभाव प्राप्त होता है।
आधुनिक खगोल विज्ञान भी सिद्ध करता है कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सूर्य के व्यास का लगभग १०८ गुना है। चंद्रमा और पृथ्वी की दूरी भी चंद्रमा के व्यास की १०८ गुनी है।
योग विज्ञान के अनुसार मानव हृदय चक्र (Anahata Chakra) पर १०८ सूक्ष्म ऊर्जा नाड़ियों का संगम होता है। १०८ जप से ये समस्त ऊर्जा केंद्र सक्रिय हो जाते हैं।