आज का पंचांग | सूर्योदय: ०५:४५ AM | सूर्यास्त: ०६:५० PM
काल गणना

क्या आज मेरा व्रत है?

सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक दिन की तिथि, नक्षत्र और वार का विशेष धार्मिक प्रभाव होता है। आज की तिथि में एकादशी, प्रदोष, संकष्टी या अमावस्या जैसे प्रमुख शास्त्रोक्त व्रत हैं या नहीं, यह जानने के लिए नीचे अपनी तारीख चुनें और तुरंत पंचांग-सत्यापित रिपोर्ट प्राप्त करें।

विषय: व्रत अन्वेषण धुन: मन्दिर शंख प्रामाणिकता: पंचांग परिषद्

पावन हिंदू व्रत चेकर (Select Date)

एकादशी

जी हाँ! आज एकादशी व्रत है

आज श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी है। भगवान विष्णु की पूजा करें।

उपवास फलाहार नियम:

व्रत निर्धारण व काल गणना की वैज्ञानिक विधि

हिंदू धर्म में व्रत केवल सप्ताह के दिनों (सोमवार, मंगलवार) पर आधारित नहीं होते। वास्तविक उपवास तिथियों का निर्धारण सूर्य और चंद्रमा के बीच की कोणीय दूरी (Angular Distance) के आधार पर होता है, जिसे **'तिथि'** कहा जाता है।

उदाहरण के लिए, जब सूर्य और चंद्रमा के बीच १२ डिग्री का अंतर आता है तो एक तिथि पूर्ण होती है। एकादशी तिथि (११वीं तिथि) चंद्रमा की ११वीं कला होती है। इस समय पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और चंद्रमा के खिंचाव का सीधा प्रभाव हमारे शरीर के जल तत्वों और मस्तिष्क की तरंगों पर पड़ता है, इसलिए इस दिन उपवास रखने से मानसिक अशांति शांत होती है।

उपवास के संकल्प की सरल शास्त्रीय विधि

बिना संकल्प के किया गया कोई भी व्रत फलदायी नहीं माना जाता। प्रातःकाल उठकर व्रत के आरंभ में निम्नलिखित विधि अपनाएं:

स्नान व आचमन: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र (पीले या लाल) धारण करें और तीन बार जल से आचमन कर स्वस्तिवाचन करें।
कुश व संकल्प जल: दाहिने हाथ में थोड़ा गंगाजल, अक्षत (साबुत चावल या तिल) और पुष्प लेकर अपने इष्टदेव के सम्मुख हाथ जोड़कर मंत्र जप और उपवास का संकल्प लें।
मानसिक प्रतिज्ञा: "हे प्रभु! आज मैं आपकी प्रसन्नता और चित्त शुद्धि के लिए निराहार/फलाहार रहकर इस पावन व्रत का पालन करूंगा। मेरी पूजा स्वीकार करें।" बोलकर संकल्प जल भूमि पर छोड़ दें।

व्रत निर्धारण सम्बन्धी प्रमुख प्रश्न (FAQs)

हाँ, तिथि के घटने-बढ़ने और सूर्योदय स्पर्श काल के कारण एकादशी कई बार दो दिनों तक खिंच जाती है। पहले दिन गृहस्थ एकादशी व्रत रखते हैं और दूसरे दिन वैष्णव संप्रदाय के लोग (सन्यासी/साधु) व्रत रखते हैं।

प्रदोष व्रत प्रत्येक चंद्र मास के शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की त्रयोदशी (१३वीं तिथि) को रखा जाता है। जबकि मासिक शिवरात्रि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (१४वीं तिथि) को रखी जाती है। दोनों ही व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम हैं।

यदि किसी बीमारी, यात्रा अथवा सूतक के कारण व्रत टूट जाता है, तो अगले पक्ष में उसी व्रत का दुगना दान-पुण्य करना चाहिए अथवा अपने इष्टदेव का नाम जप कर क्षमा याचना करनी चाहिए।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

ज्योतिषीय गणना एवं संकलन

भक्तिलोक पंचांग परिषद् (Bhaktilok Panchang Council)

धार्मिक व्रत-त्यौहार की तिथि गणना एवं शास्त्र निर्देशों का प्रामाणिक मिलान करने वाली संस्था।

तथ्य-जांच व धार्मिक समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व धार्मिक अनुष्ठान के विशेषज्ञ विद्वान। पीएचडी (वैदिक अध्ययन)।

प्रामाणिकता सत्यापित
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें