सनातन हिंदू उपवास का खगोलीय, शारीरिक व यौगिक विज्ञान
हिंदू धर्म में 'उपवास' शब्द दो मूल शब्दों से मिलकर बना है: 'उप' अर्थात समीप और 'वास' अर्थात निवास करना—अर्थात अपने अंतर्मन में स्थित परमात्मा के समीप निवास करना ही सच्चा उपवास है। व्रत केवल भोजन त्यागने का नाम नहीं, बल्कि इंद्रियों पर संयम, मानसिक शुद्धि और जैविक ऊर्जा के संतुलन की वैज्ञानिक साधना है।
१. चंद्र कलाएं (Tithi) और मानव शरीर का गुरुत्वाकर्षण संबंध
जिस प्रकार पूर्णिमा और अमावस्या पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से समुद्र में ज्वार-भाटा (Tides) उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मानव शरीर (जिसमें ७०% से अधिक जल तत्व है) पर भी चंद्रमा की कलाओं का गहरा प्रभाव पड़ता है।
एकादशी (११वीं तिथि), त्रयोदशी (प्रदोष) और पूर्णिमा/अमावस्या के दिन उपवास करने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, शरीर में ऑटोफैगी (Autophagy) की प्रक्रिया सक्रिय होती है जिससे मृत व विषाक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं और मस्तिष्क में एकाग्रता बढ़ती है।
२. उपवास के शास्त्रीय संकल्प की सरल विधि
शास्त्रों के अनुसार बिना संकल्प के किया गया कोई भी व्रत पूर्ण फलदायी नहीं होता। प्रातःकाल उठकर निम्नलिखित तीन चरणों में संकल्प लें:
सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और तीन बार आचमन कर स्वस्तिवाचन करें।
दाहिने हाथ में थोड़ा गंगाजल, अक्षत, तिल और पुष्प लेकर अपने इष्टदेव के सम्मुख हाथ जोड़ें।
"हे प्रभु! आज मैं आपकी प्रसन्नता और चित्त शुद्धि हेतु इस पावन व्रत का निष्ठापूर्वक पालन करूंगा।" बोलकर संकल्प जल भूमि पर छोड़ दें।