ब्रह्म मुहूर्त का जीव विज्ञान: प्राणवायु, सर्केडियन रिदम एवं अल्फा तरंगे
महर्षि वाग्भट ने अष्टांग हृदयम् में लिखा है: "ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः" (अर्थात व्यक्ति को अपनी आयु की रक्षा और स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु ब्रह्म मुहूर्त में ही जागना चाहिए)। आधुनिक क्रोनोबायोलॉजी (Chronobiology) भी पुष्टि करती है कि ब्रह्म मुहूर्त में जागने से शरीर की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) सूर्य की गति के साथ पूरी तरह संरेखित हो जाती है।
१. नवजात ऑक्सीजन (Nascent O2) एवं मेलाटोनिन संतुलन
सूर्योदय से पूर्व के वातावरण में प्रदूषण का स्तर न्यूनतम होता है और वायुमंडल में ओजोन तथा नवजात प्राणवायु (Nascent Oxygen) का प्राकृतिक मिश्रण होता है। यह शुद्ध प्राणवायु फेफड़ों के माध्यम से रक्त में घुलकर शरीर की प्रत्येक कोशिका को पुनर्जीवित करती है तथा कॉर्टिसोल (तनाव हार्मोन) को नियंत्रित करती है।
२. प्रातः जागरण के ३ अनिवार्य वैदिक नियम (Sanatan Morning Routine)
जागते ही दोनों हथेलियों को जोड़कर दर्शन करते हुए यह मंत्र पढ़ें:
"कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥"
बिस्तर से पैर नीचे रखने से पूर्व धरती का स्पर्श कर आशीर्वाद लें:
"समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे॥"
रात्रि में तांबे के लोटे में रखा गया शीतल जल बिना कुल्ला किए घूंट-घूंट करके पिएं। यह जठराग्नि को जाग्रत करता है और पाचन तंत्र को शुद्ध करता है।