सनातन परंपरा में समय को रैखिक (Linear) न मानकर चक्रीय (Cyclical) माना गया है। एक महायुग (चतुर्युगी) में ४ युग होते हैं, जिनकी काल अवधि ब्रह्मांडीय खगोल विज्ञान के नियमों से अद्भुत रूप से सामंजस्य रखती है:
१. सत्य युग (Satya Yuga) - १७,२८,००० वर्ष:
धर्म का स्वर्ण काल, जहाँ सत्य, तप, पवित्रता और दान चारों चरण विद्यमान थे। इसमें नारायण का ध्यान ही मोक्ष का प्रमुख साधन था।
२. त्रेता युग (Treta Yuga) - १२,९६,००० वर्ष:
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का अवतार काल। इसमें धर्म के तीन चरण शेष रहे और यज्ञ-हवन ही प्रमुख धार्मिक कर्मकांड थे।
३. द्वापर युग (Dvapara Yuga) - ८,६४,००० वर्ष:
योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण का अवतार काल। इस युग में धर्म के दो चरण रहे और देव प्रतिमाओं की विधिवत पूजा-अर्चना मुख्य साधना बनी।
४. कलि युग (Kali Yuga) - ४,३२,००० वर्ष:
वर्तमान युग, जिसमें धर्म केवल सत्य के एक चरण पर स्थित है। इस युग में केवल 'हरि नाम संकीर्तन' और सत्य भाषण से ही परम गति सुलभ बताई गई है।