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अखण्ड ज्योति

अखण्ड दीप घृत नियोजक

नवरात्रि, यज्ञादि अथवा दीपोत्सव अनुष्ठानों में **'अखण्ड ज्योति'** जलाने का विशेष महात्म्य है। दीये के अखंड प्रज्वलन को सुचारु रूप से जारी रखने के लिए आवश्यक गाय के घी अथवा तिल तेल की कुल मात्रा का पूर्व आकलन अनिवार्य है। इस वैज्ञानिक घृत नियोजक कैलकुलेटर द्वारा सटीक मात्रा का निर्धारण करें।

ईंधन: गाय का घृत / तिल तैल काल: २४ घंटे से १५ दिन वास्तु: पूर्व व उत्तरमुखी

अखण्ड दीप घृत व तैल नियोजक

१ दिन (२४ घं) १५ दिन (३६० घं)
अनुमानित कुल मात्रा

अखण्ड ज्योति के लिए ईंधन की मात्रा (Estimated Volume):

2.25 लीटर / किलोग्राम

अखण्ड ज्योति के लिए मोटी बाती (रक्षासूत्र/कलावा से बनी) का ही प्रयोग करें जो लंबे समय तक जलती रहे।

अखण्ड ज्योति स्थापना दिशा व वास्तुशास्त्र

दीये की लौ (Flame) की दिशा केवल सजावट का विषय नहीं है; सनातन वास्तुशास्त्र के अनुसार प्रत्येक दिशा में लौ प्रज्वलित करने का एक विशिष्ट प्रभाव होता है:

लौ की दिशा (Direction) आध्यात्मिक/भौतिक प्रभाव (Vastu Impact)
पूर्व दिशा (East) आरोग्य (उत्तम स्वास्थ्य) तथा दीर्घायु की प्राप्ति।
उत्तर दिशा (North) धन-धान्य, व्यवसाय में लाभ तथा श्री समृद्धि का आगमन।
दक्षिण दिशा (South) यह दिशा हानि व कष्ट का कारक मानी गई है। अतः दीये की लौ दक्षिण में न रखें।
पश्चिम दिशा (West) यह मध्यम फल देती है, लेकिन विशेष साधना संकल्पों में इसका प्रयोग वर्जित है।

गाय का घी बनाम तिल तेल – आध्यात्मिक व वैज्ञानिक महत्व

अखण्ड ज्योति में जलने वाले ईंधन का चयन साधक के साधना पथ को प्रभावित करता है:

गाय का शुद्ध घी (Desi Ghee): घी से प्रज्वलित ज्योति को सबसे पवित्र माना जाता है। इससे निकलने वाले सूक्ष्म कण वातावरण में सात्विक तरंगों (Satvik Vibrations) का विस्तार करते हैं और वातावरण को पूर्ण कीटाणुमुक्त बनाते हैं। यह देवी-देवताओं के दक्षिण भाग (Right hand) की ओर रखा जाता है।
तिल का तेल (Sesame Oil): तेल की ज्योति साधक के सुरक्षा घेरे (Protective Shield) को मजबूत करती है। तिल के तेल का दीपक देवी के बायीं ओर (Left hand) रखा जाना चाहिए। यह शनि, राहु व केतु के दोषों के शमन के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
बाती का नियम: घी के दीपक में हमेशा खड़ी रूई की लाल बत्ती (कलावा धागे की) या सफेद रूई का प्रयोग करें। तेल के दीपक में पीली या लाल मौली धागे की लंबी लेटी हुई बत्ती का प्रयोग श्रेष्ठ होता है।

अखण्ड ज्योति सम्बन्धी प्रमुख प्रश्न (FAQs)

अखण्ड ज्योति की बाती को खिसकाते या तेल भरते समय, एक छोटा 'सपोर्टर दीया' (साक्षी दीपक) उसके समीप जलाकर रखें। मुख्य दीये की बाती को ठीक करने के दौरान यदि मुख्य लौ क्षण भर के लिए बुझ भी जाए, तो साक्षी दीपक जलते रहने से अखण्ड ज्योति खण्डित नहीं मानी जाती।

नवरात्रि के पूर्ण होने पर (दशमी तिथि को) अखण्ड ज्योति को फूँक मारकर या हाथ से न बुझाएं। दीये में घी या तेल को स्वयं समाप्त होने दें (लौ को स्वतः शांत होने दें)। यह दीप विसर्जन की शास्त्रीय विधि है।

हाँ, मिट्टी के बड़े दीये का प्रयोग हो सकता है, परंतु धातु (पीतल, कांस्य या तांबे) का दीया अधिक सुरक्षित रहता है क्योंकि मिट्टी का दीया लंबे समय तक जलने से घी या तेल सोख सकता है या उसमें सूक्ष्म दरारें आ सकती हैं।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

शास्त्र समीक्षा एवं संकलन

भक्तिलोक कर्मकांड परिषद् (Bhaktilok Karmakand Council)

वैदिक हवन, यज्ञ, और पूजा विधान से जुड़ी प्रामाणिक शास्त्र सामग्रियों का विश्लेषण करने वाली विदुषी परिषद्।

तथ्य-जांच व धार्मिक समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व कर्मकांड विधि के विशेषज्ञ विद्वान। पीएचडी (वैदिक अध्ययन)।

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अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें