१. देवाधिदेव त्र्यम्बक एवं महामृत्युंजय महामंत्र का दिव्य स्वरूप
सनातन वैदिक परंपरा में देवाधिदेव भगवान शिव के 'महामृत्युंजय महामंत्र' को अकाल मृत्यु का नाशक, संजीवनी विद्या का मूल आधार और समस्त दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों से मुक्ति दिलाने वाला साक्षात् 'अमृत महामंत्र' स्वीकार किया गया है। वेद कहते हैं: 'त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्य push...'। यह पावन मन्त्र न केवल इस संसार के भीषण रोगों, व्याधियों और अकाल मृत्यु से रक्षा करता है, अपितु जीवात्मा को जन्म-मरण के अनंत चक्र से मुक्त कर साक्षात् अमरत्व (मोक्ष) प्रदान करने में भी परम समर्थ है।
पौराणिक इतिहास के अनुसार इस महामंत्र के साक्षात् द्रष्टा ऋषि मार्कण्डेय हैं। जब अल्पायु बालक मार्कण्डेय की आयु मात्र सोलह वर्ष की थी और यमराज स्वयं अपने विकराल दूतों के साथ उनके प्राण हरने आए, तब बालक मार्कण्डेय ने शिवलिंग को अपनी दोनों भुजाओं में कसकर पकड़ लिया और इसी महामृत्युंजय मंत्र का आर्त स्वर में संकीर्तन किया। तब साक्षात् भगवान महादेव ज्योतिर्लिंग से त्रिशूलधारी रुद्र रूप में प्रकट हुए, उन्होंने यमराज को पीछे ढकेल दिया और मार्कण्डेय को 'चिरंजीवी' (अमरता) का वरदान दिया। तभी से भगवान शिव 'काल-काल' और 'महामृत्युंजय' के नाम से संपूर्ण ब्रह्मांड में पूजित हुए।
दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य ने इसी मंत्र के कठोर अनुष्ठान से साक्षात् महादेव से 'मृतसंजीवनी विद्या' प्राप्त की थी, जिससे वे मृत देहों में भी पुनः प्राणों का संचार कर देते थे। आयुर्वेद, योग और आधुनिक ध्वनि-विज्ञान के अनुसार महामृत्युंजय मंत्र की ध्वनियां मानव शरीर की कोशिकाओं में सूक्ष्म कंपन उत्पन्न कर रोग-प्रतिरोधक क्षमता को उच्चतम स्तर पर पहुँचा देती हैं।
२. मूल संस्कृत श्लोक, उच्चारण एवं ध्यान विधि
॥ मूल ऋग्वैदिक महामृत्युंजय महामंत्र ॥
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मRunमृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
॥ मृत-संजीवनी महामृत्युंजय ध्यान श्लोक ॥
हस्ताम्भोजयुगस्थरत्नकलशादुद्धृत्य तोयं शिरः,
सिञ्चन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वाङ्के सुपूर्णौ घटौ।
अक्षस्रङ्मृगहस्तमम्बुजयुगं मूर्ध्ना वहन्तं विभुं,
शुभ्राभं शशिशेखरं त्रिनयनं वन्दे महेशं परम्॥
भावार्थ: जो अपने दो करकमलों में स्थित रत्नकलशों से अमृतजल निकालकर अपने मस्तक पर सींच रहे हैं, दो अन्य हाथों में अपनी गोद में अमृत से भरे हुए दो पूर्ण घट धारण किए हुए हैं, अपने अन्य हाथों में रुद्राक्ष माला, मृगमुद्रा और दो सुंदर कमल पुष्प लिए हुए हैं, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, जिनकी कांति कर्पूर के समान धवल-शुभ्र है, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है और जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं, उन अमृत-दाता परमेश्वर महेश्वर की मैं वंदना करता हूँ।
॥ शिव पुराण कोटिरुद्र संहिता स्तुति ॥
मृत्युञ्जयाय रुद्राय नीलकण्ठाय शम्भवे।
अमृतेशाय शर्वाय महादेवाय ते नमः॥
भावार्थ: मृत्यु को जीतने वाले, रुद्र स्वरूप, हलाहल विष को कंठ में धारण करने वाले नीलकंठ, सुख के सागर शम्भु, अमृत के स्वामी अमृतेश, सर्व संहारक शर्व और देवाधिदेव महादेव को मेरा कोटि-कोटि नमन है।
शुद्ध उच्चारण निर्देश: 'ॐ त्र्यम्बकं' में 'त्र्यम्-ब-कं' का उच्चारण संयुक्त रूप से स्पष्ट हो (त्र्यम्बकम्)। 'यजामहे' में 'हे' पर कोमल विश्राम हो। 'सुगन्धिं' में अनुस्वार की नासिका ध्वनि शुद्ध हो। 'पुष्टि-वर्धनम्' में 'ष्ठि' मूर्धन्य हो। 'उर्वारुकमिव' में 'उर्-वा-रु-क-मि-व' का प्रवाह अखण्ड रहे। 'बन्धनात्' के 'त्' के साथ 'मृत्योज्ञ' या 'मृत्योर्मुक्षीय' का संयुक्त उच्चारण हो (मृत्-योर्-मुक्-षी-य)। अंत में 'माऽमृतात्' में अवग्रह (ऽ) के कारण 'मा अमृतात्' का भाव स्पष्ट हो।
३. पद-च्छेद एवं विस्तृत शब्दार्थ
महामृत्युंजय महामंत्र के प्रत्येक पद का गहरा व्याकरणिक, वानस्पतिक और आध्यात्मिक विश्लेषण निम्नलिखित है:
- १. ॐ (प्रणव नाद): समस्त सृजन और चेतना का आदि नादब्रह्म।
- २. त्र्यम्बकम् (त्रिनेत्रधारी भगवान शिव को):
- 'त्रीणि अम्बकानि (नेत्राणि) यस्य सः त्र्यम्बकः'—जिनके तीन नेत्र हैं (सूर्य, चंद्र और अग्नि)। जो भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालों के द्रष्टा हैं।
- 'अम्बा' का अर्थ माता भी है; जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूपी तीन शक्तियों (माताओं) के भी परम पिता और अधिष्ठाता हैं।
- ३. यजामहे (हम आराधना करते हैं): हम भक्ति, श्रद्धा, समर्पण और प्रेमपूर्वक आपकी स्तुति एवं यजन करते हैं।
- ४. सुगन्धिम् (दिव्य सुगंध से परिपूर्ण):
- जैसे कस्तूरी या चंदन की सुगंध समस्त दिशाओं को महका देती है, वैसे ही जिनकी कीर्ति, करुणा, चेतना और सात्विक सुगंध संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड में व्याप्त है।
- साधक के अंतःकरण के समस्त दुर्गुणों और दुर्गंध को मिटाकर उसे दिव्य गुणों की सुगंध से भर देने वाले।
- ५. पुष्टि-वर्धनम् (पोषण और समृद्धि को बढ़ाने वाले):
- जो केवल शारीरिक पुष्टि (आरोग्य, बल) ही नहीं बढ़ाते, बल्कि साधक की मानसिक पुष्टि (शांति, धैर्य), बौद्धिक पुष्टि (प्रज्ञा) और आत्मिक पुष्टि (भक्ति व मोक्ष) का निरंतर संवर्धन करते हैं।
- ६. उर्वारुकम् (ककड़ी / खरबूजा):
- 'उर्वारु' का अर्थ संस्कृत में ककड़ी या खरबूजे की बेल से उत्पन्न फल है। यह सनातन दर्शन का सबसे सुंदर वानस्पतिक दृष्टांत है।
- ७. इव (की भांति / के समान): जिस प्रकार...
- ८. बन्धनात् (डंठल के बंधन से):
- जब ककड़ी पक जाती है, तो उसे बेल की डाली से अलग करने के लिए किसी चाकू या बल की आवश्यकता नहीं होती; वह पकते ही बिना किसी कष्ट या खिंचाव के स्वतः अपनी बेल से सहज ही विलग हो जाती है।
- साधक प्रार्थना करता है: "हे प्रभु! जैसे पकी हुई ककड़ी बेल के बंधन से सहज छूट जाती है, वैसे ही मैं भी जीवन की पूर्णता प्राप्त कर संसार के मोह-बंधन से सहज ही मुक्त हो जाऊं।"
- ९. मृत्योः (मृत्यु के मुख से / जन्म-मरण के कष्ट से): अकाल मृत्यु, भय, बीमारी और संसार के बंधनों से।
- १०. मुक्षीय (हमें मुक्त कर दीजिए): हमें छुड़ा लीजिए, मुक्ति प्रदान कीजिए।
- ११. मा (नहीं): कभी मत...
- १२. अमृतात् (अमरत्व से / मोक्ष के अमृत से):
- 'मा अमृतात'—अर्थात मुझे अमरत्व से अलग मत कीजिए। मुझे केवल शारीरिक मृत्यु से बचाइए, परंतु उस परम अमृत (शिव-साक्षात्कार और मोक्ष) से मुझे कभी वंचित न कीजिए!
४. विस्तृत दार्शनिक भावार्थ एवं अमृत-चेतना रहस्य
महामृत्युंजय महामंत्र साधक को मृत्यु के भय से निकालकर अमरत्व की चेतना में प्रतिष्ठित करता है। संसार में सबसे बड़ा भय 'मृत्यु का भय' (अभिनिवेश क्लेश) है। योग दर्शन में पतंजलि कहते हैं: 'स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः' (साधन पाद ९)। मृत्यु का भय बड़े-बड़े विद्वानों को भी कंपित कर देता है।
परंतु जब साधक 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे' का जप करता है, तो वह भगवान शिव के तीन नेत्रों—सूर्य (क्रिया शक्ति/पिंगला नाड़ी), चंद्र (इच्छा शक्ति/इड़ा नाड़ी), और अग्नि (ज्ञान शक्ति/सुषुम्ना नाड़ी) से जुड़ जाता है। भगवान शिव त्रिनेत्र से साधक के आज्ञा चक्र को जाग्रत करते हैं। जब आज्ञा चक्र से ऊपर सहस्रार चक्र में स्थित 'सोम मंडल' सक्रिय होता है, तो वहाँ से साक्षात् 'अमृत' का स्राव होने लगता है। इस अमृत रस के पान से साधक देह-बुद्धि से ऊपर उठकर आत्म-बुद्धि में स्थित हो जाता है और मृत्यु उसके लिए केवल एक पुराने वस्त्र को बदलकर नया वस्त्र पहनने के समान अत्यंत सहज हो जाती है।
५. वैदिक एवं पौराणिक उद्भव, शास्त्र प्रमाण
महामृत्युंजय महामंत्र का मूल उद्भव ऋग्वेद के सप्तम मण्डल के उनसठवें सूक्त के बारहवें मन्त्र में हुआ है:
"त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मRunमृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥"
- ऋग्वेद मण्डल ७, सूक्त ५९, मन्त्र १२ (ऋषि वसिष्ठ)
यही मन्त्र शुक्ल यजुर्वेद (अध्याय ३, मन्त्र ६०), कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता (१.८.६) और अथर्ववेद (१४.१.१७) में भी समान रूप से समाहित है। चारों वेदों में एक समान रूप से प्रतिष्ठित होना इस मंत्र के अद्वितीय महत्व का अकाट्य प्रमाण है।
शिव पुराण (सती खंड एवं कोटिरुद्र संहिता) में वर्णन है कि जब महर्षि दधीचि और राजा क्षुव के बीच विवाद हुआ, तब भगवान शिव ने दधीचि को महामृत्युंजय मंत्र प्रदान किया था। जब चंद्रदेव को दक्ष प्रजापति के शाप से क्षय रोग (टीबी) हो गया था और वे मृत्यु के कगार पर थे, तब चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र (वर्तमान सोमनाथ ज्योतिर्लिंग) में इसी मंत्र के छह माह तक कठोर अनुष्ठान से शिव कृपा पाकर अमरत्व प्राप्त किया था।
६. संपूर्ण अनुष्ठान विधि, रुद्राभिषेक, संपुट विद्या व संकल्प
महामृत्युंजय मंत्र की शास्त्रीय, प्रामाणिक एवं सात्विक साधना विधि निम्नलिखित है:
शुभ वार, तिथि एवं मुहूर्त
सोमवार, प्रदोष व्रत, मासिक शिवरात्रि, महाशिवरात्रि, श्रावण मास अथवा किसी भी शुभ अमृत सिद्धि योग में यह साधना प्रारंभ करना सर्वोत्तम है। समय के लिए प्रातः ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) अथवा प्रदोष काल सर्वश्रेष्ठ है। गंभीर रोगी के लिए किसी भी समय इसका जप प्रारंभ किया जा सकता है।
दिशा, आसन एवं वस्त्र
जप के समय साधक का मुख पूर्व अथवा उत्तर (कैलाश) दिशा की ओर होना चाहिए। आसन शुद्ध श्वेत ऊन अथवा कुश का होना चाहिए। साधक को श्वेत अथवा हल्के पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। ललाट पर गोमय भस्म का त्रिपुण्ड्र अवश्य लगाएं।
जप माला का चयन
महामृत्युंजय साधना में पंचमुखी रुद्राक्ष की माला ही अनिवार्य और अचूक है। प्राण-प्रतिष्ठित रुद्राक्ष माला को गोमुखी में रखकर अनामिका व मध्यमा के सहयोग से अंगूठे से जपें। माला का कभी उल्लंघन न करें; १०८ दाने पूरे होने पर माला को घुमाकर पुनः प्रारंभ करें।
शिवलिंग अभिषेक एवं संपुट विधान
जप से पूर्व शिवलिंग पर तांबे या चांदी के पात्र से गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, दूर्वा, शहद और गन्ने का रस चढ़ाते हुए अभिषेक करें। शिवलिंग पर बिल्वपत्र और सफेद कनेर या धतूरे के फूल चढ़ाएं। गंभीर संकट निवारण हेतु मंत्र के आगे-पीछे 'ॐ ह्रौं जूं सः' बीज मंत्र का संपुट लगाकर जप किया जाता है।
संकल्प मंत्र: हाथ में जल, अक्षत, तांबे का सिक्का और बिल्वपत्र लेकर कहें: "हे देवाधिदेव त्र्यम्बक महामृत्युंजय महेश्वर! मैं (अपना नाम) गोत्र (अपना गोत्र) अपने अथवा (रोगी का नाम) के समस्त असाध्य रोगों के शमन, अकाल मृत्यु के भय के निवारण, दीर्घायु, आरोग्य, शारीरिक-मानसिक पुष्टि और आपकी अनन्य कृपा प्राप्ति हेतु आपके पावन महामृत्युंजय महामंत्र का (१, ३, ५ या ११ माला) जप करने का संकल्प लेता हूँ। मुझ पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें।" जल भूमि पर छोड़ दें।
७. शारीरिक, न्यूरोलॉजिकल, मानसिक एवं महा-आरोग्य लाभ
महामृत्युंजय महामंत्र के नियमित अनुष्ठान से साधक को निम्नलिखित अमूल्य लाभ प्राप्त होते हैं:
१. अकाल मृत्यु, दुर्घटना एवं आकस्मिक संकटों से रक्षा
यह मंत्र साधक के चारों ओर अभेद्य दिव्य शिव-कवच का निर्माण करता है। वाहन दुर्घटना, अग्नि, जल, सर्पदंश, विष, शस्त्र अथवा अज्ञात संकटों से साधक की चमत्कारी रूप से रक्षा होती है।
२. असाध्य व्याधियों, कैंसर व संक्रमण में संजीवनी प्रभाव
अस्पतालों में आईसीयू में भर्ती गंभीर रोगियों के सिरहाने बैठकर अथवा उनके निमित्त परिजनों द्वारा किया गया महामृत्युंजय जप शरीर में नई प्राण-ऊर्जा का संचार करता है। डॉक्टरों द्वारा जवाब दिए जाने पर भी कई रोगियों को नया जीवन प्राप्त हुआ है।
३. मानसिक भय, अवसाद, अनिद्रा एवं फोबिया का समूल नाश
जिन व्यक्तियों को रात में डरावने सपने आते हैं, अकेले रहने से डर लगता है या अज्ञात भविष्य की चिंता सताती है, उनके लिए यह मंत्र परम औषधि है। मन का सारा भय मिटकर चित्त निर्भय हो जाता है।
४. मारकेश ग्रह, शनि की साढ़ेसाती एवं राहु पीड़ा की शांति
जन्मकुंडली में जब मारकेश (द्वितीय व सप्तम भाव के स्वामी) की दशा चल रही हो, या अष्टमेश पीड़ित हो, तो महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख (१,२५,०००) जप कराने से मारक ग्रह दोष शांत होकर जीवन की रक्षा होती है।
८. साधना के नियम, परहेज एवं सावधानियां (Rules & Precautions)
महामृत्युंजय साधना अत्यंत शक्तिशाली और तेजस्वी साधना है, अतः इसमें मर्यादाओं का पालन अनिवार्य है:
- पूर्ण सात्विक आहार: जप काल में मांसाहार, मदिरा, नशा, अंडा, लहसुन और प्याज का पूर्ण त्याग करें। ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- शुद्ध उच्चारण की अनिवार्यता: वैदिक मंत्रों में उच्चारण की त्रुटि नहीं होनी चाहिए। अक्षरों को चबाकर या जल्दबाजी में न बोलें; प्रत्येक पद का स्पष्ट और लयबद्ध उच्चारण करें।
- आसन और स्थान की स्थिरता: साधना के दिनों में प्रतिदिन एक ही समय, एक ही स्थान और एक ही आसन पर बैठकर जप करें। स्थान बदलने से ऊर्जा खंडित होती है।
- नकारात्मक संकल्प का निषेध: किसी निर्दोष व्यक्ति का अहित करने या शत्रु के विनाश हेतु इस संजीवनी मंत्र का कभी दुरुपयोग न करें। इसका प्रयोग केवल रक्षा, आरोग्य और कल्याण हेतु ही करें।