यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४॥
yayā tu dharma-kāmārthān dhṛtyā dhārayate 'rjuna | prasaṅgena phalākāṅkṣī dhṛtiḥ sā pārtha rājasī ||34||
भावार्थ: हे अर्जुन! किन्तु जिस धृति से मनुष्य आसक्तिपूर्वक फल की इच्छा रखते हुए धर्म, काम और अर्थ का आश्रय लेता है – वह धृति राजसी है।
श्लोक का अर्थ एवं व्याख्या (Commentary)
राजस धृति में फल की आसक्ति और इच्छा होती है। व्यक्ति धर्म, अर्थ, काम को पाने के लिए दृढ़ तो रहता है, पर उसमें आसक्ति और फलेच्छा होने के कारण वह राजस कहलाती है।
प्रतिदिन गीता स्वाध्याय के चमत्कारी लाभ
श्रीमद्भगवद्गीता के नित्य पठन से मनुष्य के जीवन में कई चमत्कारी परिवर्तन आते हैं। व्यस्त दिनचर्या में से मात्र 1 मिनट निकालकर श्लोक पढ़ना भी मन को एक नई दिशा प्रदान करता है:
- मानसिक स्थिरता व एकाग्रता: नित्य गीता पाठ से मन की चंचलता समाप्त होती है और निर्णय लेने की क्षमता (Decision Making) में सुधार होता है।
- तनाव और चिंता से मुक्ति: जब हम निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत समझते हैं, तो परिणामों का भय मिट जाता है और अवसाद (Depression) जैसी समस्याओं से मुक्ति मिलती है।
- आत्मबल और आत्मविश्वास की जागृति: विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित न होकर कर्तव्य पथ पर डटे रहने का साहस मिलता है।
गीता स्वाध्याय के सरल नियम (Gita Sadhana Rules)
गीता का पठन करते समय निम्नलिखित नियमों का पालन करने से मानसिक शांति और पूर्ण लाभ प्राप्त होता है:
गीता स्वाध्याय सम्बन्धी आम प्रश्न (FAQs)
संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी
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तथ्य-जांच व धार्मिक समीक्षा
डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)
वैदिक संस्कृति व संस्कृत साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक अध्ययन)।
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