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योगेश्वर श्री कृष्ण वाणी

श्रीमद्भगवद्गीता खोजकर्ता

कुरुक्षेत्र के भीषण धर्मयुद्ध के शंखनाद के बीच, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण ने मोहग्रस्त अर्जुन को जो अमर उपदेश दिया—वह शाश्वत सत्य, ज्ञान और व्यावहारिक कर्मयोग का दिव्य सागर है। यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता के सभी १८ अध्यायों के श्लोक और सार्थ अनुवाद खोजें।

कुल अध्याय: १८ कुल श्लोक: 701 ज्ञान श्रेणी: त्रि-योग मार्ग

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दैनिक गीता ज्ञान सूत्र
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं सज्जनों के कल्याण और धर्म की स्थापना के लिए स्वयं को प्रकट करता हूँ।

अध्याय ४, श्लोक ७

महाभारत: कुरुक्षेत्र धर्मयुद्ध पृष्ठभूमि

हस्तिनापुर के राजसिंहासन के उत्तराधिकार को लेकर कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अनिवार्य हो चुका था। कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भारतवर्ष की अक्षौहिणी सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। युद्ध की घोषणा से पूर्व जब रथ दोनों सेनाओं के मध्य खड़ा हुआ, तब अर्जुन ने शत्रु पक्ष में अपने ही दादा भीष्म, गुरु द्रोण और भाइयों को खड़ा देखा।

शंखनाद (कुरुक्षेत्र की रणभेरी) दोनों ओर के शूरवीरों ने शंख बजाकर युद्ध की चुनौती दी। भगवान कृष्ण ने पांचजन्य शंख और अर्जुन ने देवदत्त शंख बजाया।
अर्जुन का विषाद (शोक व संन्यास की इच्छा) मोहवश अर्जुन के हाथ से गांडीव धनुष गिर पड़ा और वे विलाप करते हुए बोले कि स्वजनों की हत्या करके प्राप्त राज्य उन्हें नहीं चाहिए।
गीता उपदेश (परम सत्य का उद्घाटन) अर्जुन के सारथी बने योगेश्वर श्री कृष्ण ने मुस्कराते हुए उन्हें आत्मा की अमरता और स्वधर्म पालन का सनातन उपदेश देना प्रारंभ किया।

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अर्जुन विषाद योग (Arjuna Vishada Yoga)

प्रथम अध्याय में कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि का वर्णन है और अर्जुन के गहरे विषाद का चित्रण है, जो आगे के उपदेशों की भूमिका तैयार करता है।...

कर्मयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 2 ५ मिनट पढ़ें

सांख्य योग (Sankhya Yoga)

दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन के मोह का निवारण करते हुए सांख्य योग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग का उपदेश देते हैं। यह अध्याय गीता का सार माना ज...

कर्मयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 3 ५ मिनट पढ़ें

कर्म योग (Karma Yoga)

तीसरा अध्याय कर्म योग के सिद्धान्त की व्याख्या करता है – निष्काम कर्म, स्वधर्म का पालन, और ज्ञानी व कर्मयोगी की तुलना। Chapter 3 explains th...

कर्मयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 4 ५ मिनट पढ़ें

ज्ञान कर्म संन्यास योग (Gyan Karma Sanyas Yoga)

चौथा अध्याय: ज्ञान-कर्म-संन्यास योग। इस अध्याय में भगवान कृष्ण ज्ञानयोग और कर्मयोग के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। वे अपने दिव्य जन्म और कर्...

कर्मयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 5 ५ मिनट पढ़ें

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)

पाँचवाँ अध्याय कर्मयोग और संन्यास के वास्तविक स्वरूप को स्पष्ट करता है। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा संन्यासी वह है जो फल की आसक्ति छोड़कर क...

कर्मयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 6 ५ मिनट पढ़ें

ध्यान योग (Dhyan Yoga)

छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान योग का वर्णन करते हैं। वह आत्म-संयम, मन को वश में करने और ध्यान की विधि बताते हैं। यह अध्याय योगी के जी...

कर्मयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 7 ५ मिनट पढ़ें

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)

सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) का वर्णन करते हैं। वह अपनी योगमाया, अपने दो प्रकार के स्वरूप (परा और अपरा प...

भक्तियोग श्लोक अर्थ
अध्याय 8 ५ मिनट पढ़ें

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga)

आठवें अध्याय में अर्जुन के प्रश्नों के उत्तर में श्रीकृष्ण ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ की परिभाषा देते हैं। साथ ही, मृ...

भक्तियोग श्लोक अर्थ
अध्याय 9 ५ मिनट पढ़ें

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)

नौवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण सबसे गोपनीय और श्रेष्ठ ज्ञान (राजविद्या) का उपदेश देते हैं। वह बताते हैं कि कैसे वह सब व्याप्त हैं, फिर भी ...

भक्तियोग श्लोक अर्थ
अध्याय 10 ५ मिनट पढ़ें

विभूति योग (Vibhuti Yoga)

दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (ऐश्वर्य) का वर्णन करते हैं। अर्जुन के अनुरोध पर वह संसार की प्रमुख वस्तुओं में अपने व...

भक्तियोग श्लोक अर्थ
अध्याय 11 ५ मिनट पढ़ें

विश्वरूप दर्शन योग (Visvarupa Darsana Yoga)

ग्यारहवाँ अध्याय अर्जुन द्वारा भगवान का विश्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त करने से प्रारंभ होता है। कृष्ण अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं ...

भक्तियोग श्लोक अर्थ
अध्याय 12 ५ मिनट पढ़ें

भक्ति योग (Bhakti Yoga)

बारहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि सगुण साकार भक्त और निर्गुण ब्रह्म के उपासकों में श्रेष्ठ कौन है। कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सगुण भक्ति ...

भक्तियोग श्लोक अर्थ
अध्याय 13 ५ मिनट पढ़ें

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)

तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के ज्ञान का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि आत्मा अविनाशी, निर्लिप्त और सा...

ज्ञानयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 14 ५ मिनट पढ़ें

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)

चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन गुणों – सत्‍व, रजस् और तमस् – का विस्तार से वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि ये गुण जीव को कैसे बाँधते...

ज्ञानयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 15 ५ मिनट पढ़ें

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)

पंद्रहवें अध्याय में श्रीकृष्ण संसार की तुलना एक अश्वत्थ वृक्ष से करते हैं, जो उल्टा लटका हुआ है। वह क्षर पुरुष (नश्वर), अक्षर पुरुष (अविनाश...

ज्ञानयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 16 ५ मिनट पढ़ें

दैवासुर संपद्विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने ...

ज्ञानयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 17 ५ मिनट पढ़ें

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)

सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की...

ज्ञानयोग श्लोक अर्थ
अध्याय 18 ५ मिनट पढ़ें

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)

अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को...

ज्ञानयोग श्लोक अर्थ

श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन का सर्वश्रेष्ठ व्यावहारिक मार्गदर्शक है। महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अपने स्वजनों पर शस्त्र उठाने से संकोच कर रहे थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कर्म, धर्म और आत्मा के सत्य का जो उपदेश दिया, वही भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आज के आधुनिक जीवन में भी गीता उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पाँच हजार वर्ष पूर्व थी। जीवन में तनाव, अनिश्चितता, और अनिर्णय की स्थिति में गीता के श्लोक मनुष्य को धैर्य और सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करते हैं। यह निष्काम कर्मयोग का संदेश देती है—अर्थात फल की चिंता किए बिना ईमानदारी से अपना कर्म करना।

व्यावहारिक जीवन में गीता के प्रमुख स्तंभ

  • तनाव से मुक्ति (Stress Management): फल की अत्यधिक चिंता ही तनाव का मुख्य कारण है। गीता मनुष्य को केवल वर्तमान कर्म पर ध्यान केंद्रित करना सिखाती है।
  • समत्व भाव (Equanimity): सुख-दुख, लाभ-हानि, और जय-पराजय में मन को स्थिर रखना ही जीवन की वास्तविक शांति है।
  • स्वधर्म का पालन (Self-duty): दूसरों के मार्ग की नकल करने के बजाय अपने स्वयं के स्वभाव और क्षमता के अनुसार कर्म करना श्रेष्ठ है।

भगवद्गीता सम्बन्धी आम प्रश्न (FAQs)

श्रीमद्भगवद्गीता की मूल रचना महर्षि वेदव्यास द्वारा महाभारत ग्रंथ के भीष्म पर्व के अंतर्गत की गई थी। इसमें भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए संवाद का वर्णन है।

भगवद्गीता में कुल १८ अध्याय हैं और इसमें कुल ७०० श्लोक हैं, जो भगवान कृष्ण, अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र के संवादों में विभाजित हैं।

निष्काम कर्म का अर्थ है कि मनुष्य अपना कर्तव्य पूरे समर्पण और निष्ठा के साथ करे, परंतु परिणाम या फल के प्रति मन में आसक्ति न रखे। फल की चिंता न करने से कर्म में उत्कृष्टता आती है।

गीता का नियमित पठन मानसिक अशांति दूर करता है, तनाव और अवसाद को कम करता है, निर्णय लेने की क्षमता में सुधार लाता है और जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

संपादकीय विश्वसनीयता एवं समीक्षा जानकारी

लेखन एवं संकलन

भक्तिलोक शोध मंडल (Bhaktilok Research Council)

धार्मिक ग्रंथों के प्राचीन ज्ञान का सरल और प्रामाणिक अनुवाद करने वाली समर्पित संस्था।

तथ्य-जांच व धार्मिक समीक्षा

डॉ. विकास शास्त्री (Dr. Vikas Shastri)

वैदिक संस्कृति व संस्कृत साहित्य के विद्वान। पीएचडी (वैदिक अध्ययन)।

प्रामाणिकता सत्यापित
अंतिम संशोधन: ०८ अगस्त २०२६ अध्ययन काल: ५ मिनट पढ़ें

एआई आध्यात्मिक मार्गदर्शक (AI Guru)

वत्स! मैं भक्तिलोक का डिजिटल आध्यात्मिक सहायक हूँ। सनातन धर्म, ध्यान साधना, या प्रमुख मंदिर यात्राओं के संबंध में कोई भी जिज्ञासा व्यक्त करें। अभी
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