क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
तेरहवें अध्याय में श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के ज्ञान का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि आत्मा अविनाशी, निर्लिप्त और साक्षी है, और उसे जानना ही सच्चा ज्ञान है।
परिचय / Introduction
अब तक के अध्यायों में कर्म, भक्ति और ज्ञान पर प्रकाश डाला गया। अध्याय १३ में कृष्ण सांख्य योग के दृष्टिकोण से शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के बीच अंतर स्पष्ट करते हैं। यह ज्ञान ही जीवन-मृत्यु के बंधन से मुक्ति का आधार है।
मुख्य विषय / Key Themes
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की परिभाषा (Definition of Field and Knower of the Field): यह शरीर ही क्षेत्र है, और जो इस शरीर को जानता है, वह क्षेत्रज्ञ (आत्मा) है। कृष्ण स्वयं को भी सब क्षेत्रों का ज्ञाता बताते हैं।
ज्ञान के बीस तत्व (Twenty Elements of Knowledge): अहंकार, बुद्धि, इंद्रियाँ, इंद्रियों के विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख आदि – ये सब क्षेत्र के विकार हैं। इन्हें जानना ही ज्ञान है।
ज्ञान का वास्तविक अर्थ (The True Meaning of Knowledge): अमानित्व (मान का अभाव), अदम्भित्व (दम्भ का अभाव), अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, शौच, स्थिरता, आत्मसंयम, आदि – ये सब ज्ञान के लक्षण हैं।
आत्मा के गुण (Attributes of the Soul): आत्मा अजन्मा, अविनाशी, निर्गुण, निष्क्रिय, सर्वव्यापी, अचल, सनातन है। वह केवल साक्षी है और प्रकृति के गुणों से परे है।
प्रकृति और पुरुष (Nature and the Spirit): सृष्टि का कार्य प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष (क्षेत्रज्ञ) के संयोग से होता है। सुख-दुःख का भोक्ता पुरुष है, लेकिन वास्तव में वह गुणों से लिप्त नहीं होता।
यह अध्याय हमें शरीर और आत्मा के अंतर को समझने की कुंजी देता है। जब हम स्वयं को शरीर से अलग, अविनाशी आत्मा के रूप में देखने लगते हैं, तब हम सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाते हैं। यही ज्ञान मोक्ष का मार्ग है। This chapter provides a profound philosophical analysis of the material body and the eternal soul, teaching us to discriminate between the transient and the everlasting.
अर्जुन उवाच | प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च | एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव || १ ||
“अर्जुन बोले: हे केशव! मैं प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।”
English: Arjuna said: O Kesava, I wish to know about Prakriti (nature) and Purusha (spirit), the field and the knower of the field, knowledge and the object of knowledge.
“श्रीभगवान् बोले: हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और जो इसको जानता है, उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं – ऐसा तत्ववेत्ताओं का कथन है।”
English: The Blessed Lord said: This body, O son of Kunti, is called the field; he who knows it is called the knower of the field by those who know of them.
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम || ३ ||
“हे भारत! सम्पूर्ण क्षेत्रों में (स्थित) क्षेत्रज्ञ को भी तू मुझे ही जान। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तविक) ज्ञान मेरा मत है।”
English: Know Me also as the knower of the field in all fields, O Bharata. The knowledge of the field and its knower is considered by Me to be the (real) knowledge.
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु || ४ ||
“वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके क्या विकार हैं और किस कारण से क्या हुआ है, तथा वह (क्षेत्रज्ञ) कौन है और उसके क्या प्रभाव हैं – यह सब संक्षेप में मुझसे सुन।”
English: What that field is, of what nature, what its modifications, and from what cause, and who He is, and what His powers are—hear all this from Me in brief.
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् | ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः || ५ ||
“इस विषय को ऋषियों ने अनेक प्रकार से कहा है, तथा विविध वैदिक मंत्रों द्वारा भी और युक्तियुक्त तथा निश्चयात्मक ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी (गाया गया है)।”
English: It has been sung by the sages in many ways, in various distinctive hymns, and also in the well-reasoned and conclusive words of the Brahma-Sutras.
महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च | इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः || ६ ||
“पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और अव्यक्त (मूल प्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक (मन) तथा पाँच इन्द्रियों के विषय –”
English: The great elements, egoism, intellect, and also the unmanifested (Mula-Prakriti), the ten senses and the one (mind), and the five objects of the senses.
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् || ७ ||
“इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, सङ्घात (शरीर), चेतना और धृति – इस प्रकार यह क्षेत्र अपने विकारों सहित संक्षेप में कहा गया।”
English: Desire, hatred, pleasure, pain, the aggregate (body), intelligence, fortitude – thus the field has been briefly described with its modifications.
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
“पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति का अभाव और अत्यधिक स्नेह का न होना, तथा इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में निरन्तर समान चित्त रहना –”
English: Non-attachment, non-identification with son, wife, home and the like, and constant even-mindedness on the attainment of the desirable and the undesirable.
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् | एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा || १२ ||
“अध्यात्म-ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के उद्देश्य (परमात्मा) का साक्षात्कार – यह सब ज्ञान कहा गया है और जो इससे विपरीत है वह अज्ञान है।”
English: Constant state of knowledge of the Self, perception of the end of true knowledge – this is declared to be knowledge, and what is opposed to it is ignorance.
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते | अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || १३ ||
“जो ज्ञेय (तत्त्व) है, उसे मैं अच्छी तरह कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है। वह अनादि, परब्रह्म है, जो न सत् कहा जाता है और न असत्।”
English: I will declare that which has to be known, knowing which one attains immortality – the beginningless Supreme Brahman, called neither being nor non-being.
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || १५ ||
“वह सब इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला है, परन्तु इन्द्रियों से रहित है, आसक्ति रहित है, फिर भी सबका धारण-पोषण करने वाला है, निर्गुण है, फिर भी गुणों का भोक्ता है।”
English: Shining by the functions of all the senses, yet without the senses; unattached, yet supporting all; devoid of qualities, yet their experiencer.
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च | सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || १६ ||
“वह सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर-भीतर है, स्थिर भी है और चर भी है; सूक्ष्म होने के कारण वह अज्ञेय (इन्द्रियों से अगोचर) है, वह दूर भी है और पास भी है।”
English: Without and within all beings, the unmoving and also the moving; because of His subtlety, He is incomprehensible; He is far away, yet He is near.
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || १७ ||
“वह अविभक्त (अखण्ड) होते हुए भी भूतों में विभक्त (खण्डित) सा स्थित है; वह ज्ञेय (परमात्मा) भूतों का धारण-पोषण करने वाला, सबको ग्रास करने वाला और सबको उत्पन्न करने वाला है।”
English: He is undivided, yet He seems to be divided among beings; He is to be known as the supporter of beings; He devours and He generates.
“वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है तथा अज्ञान से परे कहा गया है; वह ज्ञान है, ज्ञेय है और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।”
English: He is the light of all lights, and is said to be beyond darkness; He is knowledge, the object of knowledge, and the goal of knowledge; He is seated in the hearts of all.