क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 17

श्लोक १७ में परमात्मा की अखण्डता और विभिन्नता का रहस्य बताया गया है।

संस्कृत श्लोक

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || १७ ||

avibhaktaṃ ca bhūteṣu vibhaktamiva ca sthitam | bhūtabhartṛ ca tajjñeyaṃ grasiṣṇu prabhaviṣṇu ca || 17 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अविभक्तम्: विभाग रहित; च: और; भूतेषु: भूतों में; विभक्तम्: विभक्त; इव: मानो; च: और; स्थितम्: स्थित; भूतभर्तृ: भूतों का पालन करने वाला; च: और; तत्: वह; ज्ञेयम्: ज्ञेय; ग्रसिष्णु: सबको ग्रास करने वाला; प्रभविष्णु: सबको उत्पन्न करने वाला; च: और

हिंदी अनुवाद

वह अविभक्त (अखण्ड) होते हुए भी भूतों में विभक्त (खण्डित) सा स्थित है; वह ज्ञेय (परमात्मा) भूतों का धारण-पोषण करने वाला, सबको ग्रास करने वाला और सबको उत्पन्न करने वाला है।

English Translation

He is undivided, yet He seems to be divided among beings; He is to be known as the supporter of beings; He devours and He generates.

टीका / Commentary

परमात्मा एक होते हुए भी अनेक रूपों में दिखता है। वही सृष्टि का पालन, संहार और सृजन करता है। The Supreme is one yet appears as many. He is the sustainer, devourer, and creator of all.