श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 17

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 40 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || १७ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अविभक्तम्
विभाग रहित
च
और
भूतेषु
भूतों में
विभक्तम्
विभक्त
इव
मानो
च
और
स्थितम्
स्थित
भूतभर्तृ
भूतों का पालन करने वाला
च
और
तत्
वह
ज्ञेयम्
ज्ञेय
ग्रसिष्णु
सबको ग्रास करने वाला
प्रभविष्णु
सबको उत्पन्न करने वाला
च
और

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह अविभक्त (अखण्ड) होते हुए भी भूतों में विभक्त (खण्डित) सा स्थित है; वह ज्ञेय (परमात्मा) भूतों का धारण-पोषण करने वाला, सबको ग्रास करने वाला और सबको उत्पन्न करने वाला है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ब्रह्मांडीय चेतना और परम सत्य का स्वरूप

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र माना गया है। इसमें वर्णित प्रत्येक श्लोक मानव जीवन के सबसे गहरे रहस्यों, ब्रह्मांड की संरचना और जीवात्मा तथा परमात्मा के संबंधों को अत्यंत सूक्ष्मता से उजागर करता है। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को दिया गया यह ज्ञान अज्ञान के अंधकार को चीरकर मोक्ष और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त करता है। इसी शृंखला में तेरहवें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) का सत्रहवां श्लोक (अविभक्तं च भूतेषु...) अद्वैत वेदांत और सनातन आध्यात्मिकता का एक ऐसा स्तंभ है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त एक ही परम चेतना के विभिन्न रूपों और उसके शाश्वत स्वभाव का प्रामाणिक दिग्दर्शन कराता है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि हमें यह भौतिक संसार अनेकता से भरा हुआ प्रतीत होता है—जहाँ हर जीव, हर वस्तु और हर प्राणी एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देता है—परंतु इस विविधता के मूल में एक ही अविभाज्य, अखंड और सर्वव्यापक परमात्मा विद्यमान है। जल की विभिन्न तरंगों में भले ही आकार और रूप अलग-अलग हों, किंतु उनका मूल उपादान जल ही है, ठीक उसी प्रकार इस चराचर जगत के समस्त भूतों में वह परम ब्रह्म एकरस रूप से स्थित है। यह श्लोक न केवल दार्शनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि साधक के दैनिक जीवन में समता, करुणा और बंधुत्व की भावना को जागृत करने वाला एक महान मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सूत्र भी है। इसे समझकर मनुष्य राग-द्वेष से ऊपर उठकर समस्त प्राणियों में उसी एक ईश्वर के दर्शन करने की क्षमता प्राप्त करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १७ ॥


(Avibhaktam cha bhuteshu vibhaktam iva cha sthitam |
Bhootabhartru cha tajjneyam grasishnu prabhavishnu cha || 17 ||)

पाठ विधि एवं ध्यान:

इस पावन श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को पवित्र आसन पर बैठकर शांत चित्त से भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करना चाहिए। प्रातः काल स्नान के उपरांत पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) जप करने से मानसिक एकाग्रता, आत्मबल और दिव्य चेतना की अनुभूति होती है। जप के समय मन में यह भाव रखना चाहिए कि समस्त चराचर जगत में वही एक परमात्मा विभिन्न रूपों में राम, कृष्ण, शिव और शक्ति के रूप में विराजमान है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में गंभीर दार्शनिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपा हुआ है। नीचे दी गई सारणी में प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका विस्तृत दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अविभक्तम् (Avibhaktam) अविभाज्य, अखंड, बिना टुकड़ों के परमात्मा मूल रूप से एक अखंड चेतना है, जिसके कभी टुकड़े नहीं किए जा सकते। वह सभी में पूर्ण रूप से व्याप्त है।
च (Cha) और यह योजक शब्द पूर्व और उत्तर दोनों भावों को आपस में जोड़कर अद्वैत सिद्धांत को पुष्ट करता है।
भूतेषु (Bhuteshu) समस्त प्राणियों में, भूतों में सृष्टि के सभी जीव-जंतुओं, मनुष्यों, वृक्षों और कीट-पतंगों में समान रूप से वही ईश्वर निवास करता है।
विभक्तम् इव (Vibhaktam iva) मानो बंटा हुआ या अलग-अलग स्थित अज्ञानवश हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हर व्यक्ति अलग है, परंतु यह केवल माया या प्रतीति मात्र है।
च स्थितम् (Cha Sthitam) और स्थित है वह परमात्मा इस प्रकार विभाजित प्रतीत होते हुए भी वास्तविक रूप में स्थिर और एकरस रहता है।
भूतभर्तृ (Bhootabhartru) समस्त भूतों का पालन-पोषण करने वाला जिस प्रकार माता-पिता संतान का पालन करते हैं, उसी प्रकार वह परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का भरण-पोषण करता है।
च तत् (Cha Tat) और वह (परमात्मा) उसी ज्ञेय (जानने योग्य) ब्रह्म की ओर संकेत किया गया है जो समस्त वेदों और उपनिषदों का सार है।
ज्ञेयम् (Jneyam) जानने योग्य, परम तत्त्व मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य उसी परमात्मा को जानना और उसका साक्षात्कार करना है।
ग्रसिष्णु (Grasishnu) संहार करने वाला, ग्रसने वाला महाप्रलय के समय संपूर्ण चराचर जगत को अपने में समेट लेने (लीन करने) की शक्ति उसी के पास है (रुद्र रूप)।
प्रभविष्णु (Prabhavishnu) उत्पन्न करने वाला, सृजनकर्ता नई सृष्टि का विस्तार करने और हर कल्प के आरंभ में ब्रह्मांड को प्रकट करने वाली शक्ति (ब्रह्मा/विष्णु रूप)।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय का यह प्रसंग महाभारत के ऐतिहासिक युद्ध से ठीक पूर्व घटित हुआ था, जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो गए थे और उन्होंने युद्ध करने से इनकार कर दिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन, मरण, आत्मा, परमात्मा, क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा/परमात्मा) का भेद समझाने के लिए इस अतीव रहस्यमय ज्ञान का उपदेश दिया। महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली यह गीता वास्तव में उपनिषदों का सार है।

इस विशेष श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने वेदों और उपनिषदों के उस मूलभूत सिद्धांत को दोहराया है, जिसे 'एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति' (ब्रह्म एक है, दूसरा कोई नहीं है) कहा गया है। भारतीय पुराणों में—विशेषकर श्रीमद्भागवत महापुराण, शिव महापुराण और विष्णु पुराण—में इस बात की अनेकों कथाएँ मिलती हैं कि कैसे भगवान विभिन्न रूपों में अपनी लीलाओं का विस्तार करते हैं। उदाहरणस्वरूप, समुद्र मंथन की कथा में भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया, भगवान शिव ने हलाहल विषपान किया, और ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की; किंतु इन सभी शक्तियों के पीछे एक ही अखंड ऊर्जा कार्य कर रही थी।

महर्षि वेदव्यास ने क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के इस प्रकरण में स्पष्ट किया है कि मनुष्य का यह शरीर 'क्षेत्र' (खेत) है और इसके भीतर देखने वाली चैतन्य शक्ति 'क्षेत्रज्ञ' (परमात्मा का अंश) है। जब तक मनुष्य अज्ञान में रहता है, वह अपने और पराए का भेद करता है, परंतु जब वह इस श्लोक में वर्णित अविभक्तं च भूतेषु के मर्म को समझ लेता है, तब उसके सभी संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। प्राचीन काल में सनत्कुमार, नारद, और महर्षि व्यास जैसे महान ऋषियों ने इसी चेतना का अनुभव कर समाधि की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त किया था। यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि भौतिक जगत की विविधता केवल नाम और रूप की भिन्नता है, जबकि आंतरिक तत्व परम सत्य यानी परमात्मा का ही विस्तार है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस महान श्लोक का नियमित पाठ, मनन और स्मरण करने से साधक को अलौकिक आध्यात्मिक और मानसिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इसके प्रमुख सिद्ध लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

अनेक प्रकार की चिंताओं और मानसिक उद्वेलनों से घिरे व्यक्ति के लिए इस श्लोक का पाठ मानसिक शांति प्रदान करता है। यह मन की चंचलता को शांत कर स्थिरता लाता है।

2. सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का संचार

श्लोक के जप से उत्पन्न होने वाली ध्वनि तरंगें आसपास के वातावरण को शुद्ध करती हैं और साधक के चारों ओर एक सकारात्मक तथा उच्च कंपन वाली आध्यात्मिक और सुरक्षात्मक ऊर्जा का आवरण (Aura) बनाती हैं।

3. कर्म शुद्धि और अज्ञान का नाश

यह ज्ञान मनुष्य के भीतर छिपे अज्ञान, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष को समाप्त करता है, जिससे उसके पुराने संचित कर्मों का प्रभाव क्षीण होने लगता है और कर्मों में पवित्रता आती है।

4. समता भाव और करुणा का विकास

जब साधक यह जान लेता है कि सभी जीवों में एक ही परमात्मा स्थित है, तब उसके हृदय में समस्त प्राणियों के प्रति करुणा, प्रेम और समानता (समता योग) की भावना स्वतः जागृत होती है।

5. भय और मृत्यु के प्रति आशंका का शमन

परमात्मा को 'ग्रसिष्णु' (संहारकर्ता) और 'भूतभर्तृ' (पालक) रूप में जानने से साधक के मन से मृत्यु का भय हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है, क्योंकि वह समझ जाता है कि जन्म और मरण केवल वस्त्र बदलने के समान है।

6. भगवद कृपा और आत्मसाक्षात्कार

नित्य इस श्लोक का स्वाध्याय करने वाले पर भगवान श्रीकृष्ण की असीम अनुकंपा बनी रहती है, और धीरे-धीरे उसे अपने भीतर स्थित उस दिव्य आत्मा (क्षेत्रज्ञ) का प्रत्यक्ष बोध होने लगता है।

7. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

संस्कृत के इन पवित्र श्लोकों का उच्चारण और उनके अर्थों का विचार करने से मस्तिष्क की नसें सक्रिय होती हैं, जिससे विद्यार्थियों और साधकों की स्मरण शक्ति तथा एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

8. जीवन के संकटों से पार पाने की शक्ति

जीवन की विषम परिस्थितियों में जब चारों ओर निराशा घेर ले, तब यह श्लोक साधक को आंतरिक शक्ति प्रदान करता है कि वही परमेश्वर पालनहार भी है और संकटों से उबारने वाला भी।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के हमारे समर्पित देवotional scholars, Sanskrit linguists और Google Helpful Content विशेषज्ञों के दल द्वारा इस आलेख को अत्यंत गहन अनुसंधान, पारंपरिक गुरुकुल परंपरा के अध्ययन और प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक (अविभक्तं च भूतेषु...) की व्याख्या करते समय आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और संत ज्ञानेश्वर महाराज के टीका-ग्रंथों का आधार लिया गया है ताकि पाठकों तक शुद्ध, सनातन और वेदानुमोदित ज्ञान ही पहुँचे। हमारा उद्देश्य आधुनिक डिजिटल पाठकों को वेदों, उपनिषदों और गीता के शाश्वत ज्ञान से जोड़ना है, जिससे वे अपने दैनिक जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकें। यदि आपको इस आलेख से संबंधित कोई भी जिज्ञासा या सुझाव हो, तो आप हमारी संपादकीय टीम से संपर्क कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह पावन श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग) का सत्रहवां (17वां) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) और आत्मा/परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) के भेद को अत्यंत विस्तार से समझाया है।

इन तीनों पदों के माध्यम से परमात्मा के त्रिगुणात्मक और त्रिविध कार्यों को दर्शाया गया है:
  • भूतभर्तृ: वह समस्त प्राणियों का पालन-पोषण करने वाला (विष्णु रूप) है।
  • ग्रसिष्णु: महाप्रलय के समय संपूर्ण चराचर जगत का संहार या अपने में विलय करने वाला (रुद्र रूप) है।
  • प्रभविष्णु: कल्प के आरंभ में नई सृष्टि को उत्पन्न करने वाला (ब्रह्मा रूप) है।
अर्थात संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय सब कुछ उसी एक परम शक्ति के अधीन है।

जब कोई साधक इस श्लोक का नियमित पाठ और मनन करता है, तो उसके भीतर यह बोध गहरा होता है कि सभी जीवों में एक ही ईश्वर है। इससे उसके मन से ईर्ष्या, द्वेष, लोभ और अहंकार समाप्त हो जाते हैं। जब मन विकारों से मुक्त होता है, तो वह स्वतः शांत और स्थिर हो जाता है, जिससे ध्यान और ईश्वर-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।

हाँ, बिल्कुल! श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान संपूर्ण मानवता के लिए है, न कि केवल संन्यासियों के लिए। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि कोई व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस श्लोक का स्मरण करता है, तो वह अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए भी आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो सकता है और सबके प्रति समभाव रख सकता है।

इसका सरल अर्थ यह है कि परमात्मा मूल रूप से एक अखंड (अविभाज्य) चेतना है, जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते; किंतु इस भौतिक संसार में जीवों और वस्तुओं की विविधता के कारण वह ऐसा प्रतीत होता है मानो अलग-अलग रूपों में बंटा हुआ स्थित हो। जिस प्रकार एक ही सूर्य के प्रतिबिंब अनेक जल पात्रों में अलग-अलग दिखाई देते हैं, किंतु सूर्य एक ही है, वही स्थिति परमात्मा और इस संसार की है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह अविभक्त (अखण्ड) है, फिर भी प्राणियों में विभक्त-सा स्थित है; वह ज्ञेय तत्व प्राणियों का पालन, संहार और सृजन करता है।

He is undivided, yet appears as divided among beings; He is to be known as the supporter, devourer, and creator of all beings.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

एक ही सत्य अनेक रूपों में व्यक्त हो रहा है। भेद केवल दृष्टि का है।

The one Truth manifests in many forms. The diversity is only in perception.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/35 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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