श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 18

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 36 मिनट का पठन 131 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते | ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || १८ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ज्योतिषाम्
ज्योतियों में
अपि
भी
तत्
वह
ज्योति
प्रकाश
तमस
अज्ञान से
परम्
परे
उच्यते
कहा जाता है
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञेयम्
ज्ञेय
ज्ञानगम्यम्
ज्ञान से प्राप्त होने योग्य
हृदि
हृदय में
सर्वस्य
सबके
विष्ठितम्
स्थित

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है तथा अज्ञान से परे कहा गया है; वह ज्ञान है, ज्ञेय है और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और आब्रह्माण्ड चेतना

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः' एक ऐसा महावाक्य है जो केवल एक श्लोक नहीं, अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की ऊर्जा, चेतना और आत्मानुभूति का सार है। श्रीमद्भगवद्गीता के १३वें अध्याय के १८वें श्लोक के रूप में वर्णित यह दिव्य मंत्र हमें उस परम सत्ता से परिचित कराता है जो जड़ और चेतन, दोनों से परे होते हुए भी संपूर्ण चराचर जगत में एकरस होकर व्याप्त है। जिस प्रकार सूर्य, चंद्रमा, अग्नि और विद्युत अपने प्रकाश से इस संसार को आलोकित करते हैं, उसी प्रकार वह परमात्मा समस्त ज्योतियों का भी प्रकाशक (ज्योतिषां ज्योतिः) है। यदि वह परमात्मा न हो, तो न तो सूर्य चमक सकता है, न अग्नि जला सकती है और न ही मनुष्य की बुद्धि विचार कर सकती है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक अज्ञान के अंधकार (तमस) को चीरकर ज्ञान के अनंत आकाश में विचरने की प्रेरणा देता है। भगवद्गीता के इस क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ प्रकरण में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि शरीर एक 'क्षेत्र' (नश्वर क्षेत्र) है और इस शरीर को जानने वाला, इसके भीतर विराजमान चैतन्य आत्मा 'क्षेत्रज्ञ' (परमात्मा का अंश) है। जब मनुष्य अपने अंतःकरण में उतरकर इस आंतरिक प्रकाश की खोज करता है, तब उसे बाह्य जगत की नश्वरता और आंतरिक आत्मा की अमरता का भेद स्पष्ट रूप से समझ में आने लगता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी गूढ़ आध्यात्मिक सत्य का पद-दर-पद विश्लेषण, शास्त्रीय पृष्ठभूमि और इसके दैनिक जीवन में प्रयोगात्मक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) के इस पवित्र श्लोक का सस्वर पाठ करने से मन में सात्विक ऊर्जा और मानसिक शांति का संचार होता है। यहाँ श्लोक का प्रामाणिक पाठ प्रस्तुत है:

अथ त्रयोदशोऽध्यायः (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) — श्लोक १८

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।

ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥ १८॥


पदच्छेद: ज्योतिसाम् अपि तत् ज्योतिः तमसः परम् उच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यम् हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥

पाठ करने की सरल विधि एवं अनुष्ठानिक नियम:
  • प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर पवित्र श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें।
  • अपने पूजा स्थल पर भगवान श्रीकृष्ण या गीता ग्रंथ के समक्ष शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का न्यूनतम 108 बार (एक माला) अथवा नित्य प्रति 11 बार सस्वर मानसिक जप करें।
  • जप के उपरांत अपने हृदय में स्थित उसी आंतरिक प्रकाश का ध्यान करते हुए आत्म-चिंतन करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में अगाध आध्यात्मिक और दार्शनिक रहस्य छिपा है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका विस्तृत आध्यात्मिक भावार्थ प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ज्योतिषाम् अपि समस्त ज्योतियों का भी सूर्य, चंद्रमा, अग्नि, नक्षत्र और विद्युत जैसी भौतिक ज्योतियों का भी।
तत् ज्योतिः वह परम प्रकाश / ज्योति वह अलौकिक चेतना जो किसी बाह्य ईधन या ऊर्जा पर निर्भर नहीं है, बल्कि स्वयंप्रकाशित है।
तमसः परम् अंधकार (माया/प्रकृति) से परे अज्ञान, तमोगुण और भौतिक माया के अंधकार से सर्वथा अतीत, जहाँ अज्ञान का प्रवेश असंभव है।
उच्यते कहा जाता है (वेदों और संतों द्वारा) उपनिषदों, वेदों और ब्रह्मवेत्ता महर्षियों द्वारा उस परम तत्व को ऐसा ही घोषित किया गया है।
ज्ञानम् ज्ञानस्वरूप (स्वयं ज्ञान) वह परमात्मा कोई जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि वह चेतना और ज्ञान का मूर्त रूप है।
ज्ञेयम् जानने योग्य परम लक्ष्य समस्त वेदों, शास्त्रों और मानव जीवन का एकमात्र अंतिम जानने योग्य उद्देश्य वही है।
ज्ञानगम्यम् केवल ज्ञान द्वारा प्राप्त होने योग्य यह भौतिक धन या बल से नहीं, बल्कि शुद्ध ज्ञान, भक्ति और विवेक से ही प्राप्त होता है।
हृदि हृदय में (बुद्धि की गुफा में) प्रत्येक प्राणी के अंतःकरण में, उसकी आत्मा के केंद्र में स्थित है।
सर्वस्य सभी जीवों के बिना किसी भेदभाव के कीट-पतंग से लेकर मनुष्य और देवताओं तक, सबके भीतर समान रूप से विराजमान है।
विष्ठितम् विशेष रूप से स्थित / व्याप्त स्थाई रूप से निवास करता है और संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी शक्ति से थामे रहता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह तेरहवां अध्याय महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आता है, जब कुरुक्षेत्र के युद्ध के मुहाने पर अर्जुन विषाद और मोहग्रस्त हो जाते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें गीता के माध्यम से जीवन के परम सत्यों का उपदेश देते हैं। तेरहवें अध्याय का मुख्य विषय 'क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ' का विवेक है। 'क्षेत्र' का अर्थ है यह नाशवान शरीर और संसार, जिसमें सुख-दुःख, राग-द्वेष और भौतिक विकार उत्पन्न होते हैं। वहीं 'क्षेत्रज्ञ' वह आंतरिक दृष्टा है जो इस शरीर रूपी क्षेत्र को देखता और जानता है।

वैदिक साहित्य में इस श्लोक के मूल स्रोत मुण्डकोपनिषद् (२.२.१०) और श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१४) में मिलते हैं, जहाँ कहा गया है— "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥" अर्थात् उस परम प्रकाशवान परमात्मा के आगे न सूर्य चमक सकता है, न चंद्रमा और तारे, न ही बिजली और अग्नि। उसी के प्रकाश से यह सारा संसार प्रकाशित होता है।

महाभारत और पुराणों के संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह स्थापित किया है कि मनुष्य व्यर्थ ही बाहर तीर्थों, जंगलों और पर्वतों में ईश्वर की खोज करता है, जबकि वह परम ज्योति प्रत्येक प्राणी के हृदय रूपी गुफा में निरंतर प्रज्वलित हो रही है। जब साधक गुरु के सान्निध्य में योग, साधना और निष्काम कर्म के द्वारा अपने अंतःकरण को शुद्ध करता है, तब उसे इसी 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्' का साक्षात्कार होता है। यह ज्ञान आदिकाल से ब्रह्मर्षियों, देवर्षि नारद, शुकदेव जी और आद्य शंकराचार्य जैसी महान विभूतियों द्वारा अनु एक्सपीरियंस किया गया है, जो आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस दिव्य श्लोक का नियमित पाठ, मनन और इसके अर्थ का स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं:

१. अगाध मानसिक शांति (Mental Peace)

बाहरी उथल-पुथल और तनाव के बीच जब व्यक्ति अपने भीतर के इस प्रकाश का स्मरण करता है, तो उसका मन शांत और स्थिर होने लगता है।

२. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Positive Aura)

स्वयंप्रकाशित परमात्मा के ध्यान से साधक के सूक्ष्म शरीर और औरा (Aura) में उच्च कोटि की सात्विक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ने लगता है।

३. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

ज्ञान और प्रकाश के इस श्लोक के जप से अज्ञानता वश किए गए मानसिक और वाचिक पापों के संस्कार क्षीण होने लगते हैं।

४. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

जो व्यक्ति भगवान को अपने हृदय में निवास करता हुआ अनुभव करता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी कृपा सदैव बनी रहती है।

५. भय और शोक का नाश (Fearlessness)

आत्मा की अमरता और परमात्मा के आंतरिक वास का ज्ञान होने पर मृत्यु, भविष्य और अनिश्चितता का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।

६. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि (Focus & Memory)

नियमित रूप से इस श्लोक का उच्चारण करने से बुद्धि की तीक्ष्णता बढ़ती है और विद्यार्थियों में स्मरण शक्ति का विकास होता है।

७. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

यह समझ आने पर कि सभी जीवों के हृदय में एक ही परमात्मा विराजमान है, मनुष्य में समता भाव और अहंकार शून्यता आती है।

८. मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होना (Liberation Path)

ज्ञानगम्य परमात्मा की आराधना साधक को भवसागर से पार उतारकर अंततः परम गति और मोक्ष की प्राप्ति कराती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह आलेख Bhaktilok.in के मुख्य devotional scholar, Sanskrit linguist और Google Helpful Content दिशानिर्देशों के विशेषज्ञों द्वारा वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य - शंकराचार्य एवं स्वामी रामसुखदास जी के संदर्भ) तथा सनातन पौराणिक ग्रंथों का गहन अध्ययन करके संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों और शास्त्रों के वास्तविक, त्रुटिहीन और जीवनोपयोगी संदेश को अत्यंत सरल और प्रामाणिक हिंदी में पहुंचाना है। किसी भी प्रकार के भ्रम से बचने के लिए मूल श्लोक के संस्कृत व्याकरण, पदच्छेद और आर्ष दृष्टिकोंण का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि साधक अपनी आध्यात्मिक यात्रा में इसका सही लाभ उठा सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के तेरहवें अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग) का १८वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर (क्षेत्र) और आत्मा/परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) के बीच के भेद को अत्यंत विस्तार से समझाया है।

"तमसः परमुच्यते" का अर्थ है कि वह परम परमात्मा प्रकृति के तमोगुण, अज्ञान और माया के अंधकार से सर्वथा परे (अतीत) है। जहाँ भौतिक अंधकार या अज्ञान का साया भी नहीं पहुँच सकता, वह शुद्ध चेतना ही परमात्मा है।

इसका अर्थ है कि वह परमात्मा केवल विशेष ज्ञान, विवेक और योग साधना द्वारा प्राप्त करने योग्य (ज्ञानगम्य) है और वह समस्त प्राणियों के हृदय रूपी गुफा में निरंतर निवास (विष्ठितम्) करता है। हमें उसे बाहर खोजने के बजाय अपने अंतःकरण में खोजना चाहिए।

इसके नियमित स्मरण से मानसिक अशांति दूर होती है, आंतरिक ऊर्जा बढ़ती है, अहंकार का शमन होता है, और साधक के भीतर सात्विक प्रकाश व आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है। यह जीवन के दुखों से पार पाने का अचूक साधन है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के सभी श्लोक मानवता के कल्याण के लिए हैं। कोई भी गृहस्थ, विद्यार्थी या साधक बिना किसी आयु या लिंग के भेद के श्रद्धापूर्वक इसका पाठ और मनन कर सकता है। इससे परिवार में सकारात्मकता और शांति बनी रहती है।

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संकलनकर्ता: मुख्य आध्यात्मिक विद्वान एवं संस्कृत भाषा विशेषज्ञ, Bhaktilok Editorial Team

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह सब प्रकाशों का प्रकाश है, अज्ञान से परे है; वह ज्ञान है, ज्ञेय है, और ज्ञान का लक्ष्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।

He is the light of all lights, beyond ignorance; He is knowledge, the object of knowledge, and attainable by knowledge; He is seated in the hearts of all.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा हमारे हृदय में है, उसे जानने के लिए अंतर्मुखी होना होगा।

The Supreme is within our hearts; to know Him, we must turn inward.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/35 51% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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