क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – श्लोक 18

श्लोक १८ में परमात्मा को सब ज्योतियों की ज्योति और हृदय में स्थित बताया गया है।

संस्कृत श्लोक

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते | ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || १८ ||

jyotiṣāmapi tajjyotistamasaḥ paramucyate | jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ hṛdi sarvasya viṣṭhitam || 18 ||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ज्योतिषाम्: ज्योतियों में; अपि: भी; तत्: वह; ज्योति: प्रकाश; तमस: अज्ञान से; परम्: परे; उच्यते: कहा जाता है; ज्ञानम्: ज्ञान; ज्ञेयम्: ज्ञेय; ज्ञानगम्यम्: ज्ञान से प्राप्त होने योग्य; हृदि: हृदय में; सर्वस्य: सबके; विष्ठितम्: स्थित

हिंदी अनुवाद

वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है तथा अज्ञान से परे कहा गया है; वह ज्ञान है, ज्ञेय है और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।

English Translation

He is the light of all lights, and is said to be beyond darkness; He is knowledge, the object of knowledge, and the goal of knowledge; He is seated in the hearts of all.

टीका / Commentary

परमात्मा ही सबका आंतरिक प्रकाश है। वह ज्ञानस्वरूप है और हृदय में विराजमान है। The Supreme is the inner light of all. He is knowledge itself and resides in the hearts of all.