सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 54

श्लोक ५४ में अर्जुन कृष्ण से स्थितप्रज्ञ के लक्षण पूछते हैं।

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच | स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव | स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ||५४||

arjuna uvāca | sthita-prajñasya kā bhāṣā samādhi-sthasya keśava | sthita-dhīḥ kiṃ prabhāṣeta kim āsīta vrajeta kim ||54||

पदच्छेद / शब्दार्थ

अर्जुन: अर्जुन; उवाच: बोले; स्थितप्रज्ञस्य: स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि) की; का: क्या; भाषा: भाषा (परिभाषा); समाधिस्थस्य: समाधि में स्थित की; केशव: हे केशव; स्थितधीः: स्थिर बुद्धि वाला; किम्: क्या; प्रभाषेत: बोलता है; किम्: कैसे; आसीत: बैठता है; व्रजेत: चलता है; किम्: कैसे।

हिंदी अनुवाद

अर्जुन बोले: हे केशव! समाधि में स्थित स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि) पुरुष की क्या पहचान है? वह स्थिरबुद्धि कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है?

English Translation

Arjuna said: O Keshava, what is the description of one who has steady wisdom and is established in samadhi? How does one of steady mind speak, how does he sit, how does he walk?

टीका / Commentary

अर्जुन अब स्थितप्रज्ञ के लक्षण जानना चाहते हैं – ऐसा व्यक्ति कैसा व्यवहार करता है? यह प्रश्न गीता के प्रसिद्ध वर्णन का आधार बनता है।