सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 53

श्लोक ५३ में कहा गया है कि शास्त्रों के अनेक मतों से भ्रमित बुद्धि जब समाधि में स्थिर होती है, तब योग प्राप्त होता है।

संस्कृत श्लोक

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||५३||

śruti-vipratipannā te yadā sthāsyati niścalā | samādhāv acalā buddhis tadā yogam avāpsyasi ||53||

पदच्छेद / शब्दार्थ

श्रुतिविप्रतिपन्ना: श्रुति (वेद) के विभिन्न प्रवचनों से भ्रमित; ते: तेरी; यदा: जब; स्थास्यति: स्थित होगी; निश्चला: निश्चल; समाधौ: समाधि में; अचला: अचल; बुद्धिः: बुद्धि; तदा: तब; योगम्: योग (समाधि); अवाप्स्यसि: प्राप्त करेगा।

हिंदी अनुवाद

जब वेदों के विभिन्न प्रवचनों से भ्रमित तेरी बुद्धि समाधि में अचल होकर स्थित हो जाएगी, तब तू योग को प्राप्त कर लेगा।

English Translation

When your mind, confused by hearing various scriptures, becomes steady and fixed in samadhi, then you will attain yoga.

टीका / Commentary

शास्त्रों के अनेक मतों से भ्रमित बुद्धि जब समाधि में स्थिर हो जाती है, तभी सच्चा योग (आत्मसाक्षात्कार) प्राप्त होता है।