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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 7

अध्याय 5 · श्लोक 7

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥

yoga-yukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ | sarva-bhūtātma-bhūtātmā kurvann api na lipyate ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

योगयुक्तः: कर्मयोग में स्थित; विशुद्धात्मा: शुद्ध अन्तःकरण वाला; विजितात्मा: वशीभूत अन्तःकरण वाला; जितेन्द्रियः: जीते हुए इन्द्रियों वाला; सर्वभूतात्मभूतात्मा: सब प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला (सबमें समभाव); कुर्वन्: करता हुआ; अपि: भी; न: नहीं; लिप्यते: लिप्त होता।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो कर्मयोग में स्थित है, जिसकी आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध है, जो मन को वश में किए हुए है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला है (अर्थात् सबमें समभाव रखता है), वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

English Translation

He who is united with yoga, whose mind is purified, whose self is controlled and senses conquered, and whose self becomes the Self of all beings – though acting, he is not tainted.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक कर्मयोगी के लक्षण बताता है। ऐसा व्यक्ति शुद्ध अन्तःकरण वाला, आत्म-संयमी, जितेन्द्रिय और समदर्शी होता है। वह कर्म करते हुए भी पाप-पुण्य से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह फलासक्ति रहित होकर कर्तव्य-बुद्धि से कर्म करता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।