कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 7

श्लोक ७ में बताया गया है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए भी उसके प्रभाव से बंधता नहीं।

संस्कृत श्लोक

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥

yoga-yukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ | sarva-bhūtātma-bhūtātmā kurvann api na lipyate ||7||

पदच्छेद / शब्दार्थ

योगयुक्तः: कर्मयोग में स्थित; विशुद्धात्मा: शुद्ध अन्तःकरण वाला; विजितात्मा: वशीभूत अन्तःकरण वाला; जितेन्द्रियः: जीते हुए इन्द्रियों वाला; सर्वभूतात्मभूतात्मा: सब प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला (सबमें समभाव); कुर्वन्: करता हुआ; अपि: भी; न: नहीं; लिप्यते: लिप्त होता।

हिंदी अनुवाद

जो कर्मयोग में स्थित है, जिसकी आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध है, जो मन को वश में किए हुए है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला है (अर्थात् सबमें समभाव रखता है), वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

English Translation

He who is united with yoga, whose mind is purified, whose self is controlled and senses conquered, and whose self becomes the Self of all beings – though acting, he is not tainted.

टीका / Commentary

यह श्लोक कर्मयोगी के लक्षण बताता है। ऐसा व्यक्ति शुद्ध अन्तःकरण वाला, आत्म-संयमी, जितेन्द्रिय और समदर्शी होता है। वह कर्म करते हुए भी पाप-पुण्य से लिप्त नहीं होता, क्योंकि वह फलासक्ति रहित होकर कर्तव्य-बुद्धि से कर्म करता है।