श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 7

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 23 मिनट का पठन 216 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः । सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
योगयुक्तः
कर्मयोग में स्थित
विशुद्धात्मा
शुद्ध अन्तःकरण वाला
विजितात्मा
वशीभूत अन्तःकरण वाला
जितेन्द्रियः
जीते हुए इन्द्रियों वाला
सर्वभूतात्मभूतात्मा
सब प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला (सबमें समभाव)
कुर्वन्
करता हुआ
अपि
भी
न
नहीं
लिप्यते
लिप्त होता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो कर्मयोग में स्थित है, जिसकी आत्मा (अन्तःकरण) शुद्ध है, जो मन को वश में किए हुए है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, तथा जो सम्पूर्ण प्राणियों के आत्मा में स्थित आत्मा वाला है (अर्थात् सबमें समभाव रखता है), वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

योगयुक्तो विशुद्धात्मा: कर्मयोग का दिव्य दर्शन | Bhaktilok.in

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय का यह सातवां श्लोक—"योगयुक्तो विशुद्धात्मा..."—मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य 'निष्काम कर्मयोग' को परिभाषित करने वाला एक महामंत्र है। यह श्लोक केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु एक ऐसी जीवन-शैली का ब्लूप्रिंट है, जो मनुष्य को संसार के सागर में रहते हुए भी कमल के पत्ते की भांति निर्लिप्त रहने की कला सिखाता है। सनातन संस्कृति में कर्म को बंधन माना गया है, किंतु जब वही कर्म 'योग' से जुड़ जाता है, तो वह मुक्ति का मार्ग बन जाता है।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक उस अवस्था का वर्णन करता है जहाँ आत्मा अपनी शुद्धता को पुनः प्राप्त कर लेती है। जब साधक अपने अंतःकरण को विकारों से मुक्त कर लेता है, तो वह 'विशुद्धात्मा' बन जाता है। यहाँ 'विजितात्मा' का अर्थ केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि मन और बुद्धि पर पूर्ण नियंत्रण है। जब व्यक्ति यह अनुभव करने लगता है कि 'सर्वभूतात्मभूतात्मा'—अर्थात समस्त प्राणियों में वही एक परमात्मा विराजमान है—तब उसके भीतर से द्वेष, ईर्ष्या और स्वार्थ का लोप हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए संसार को त्यागने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि संसार के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने की आवश्यकता है। यह श्लोक कर्मयोग की वह पराकाष्ठा है जहाँ कर्ता और कर्म का भेद मिट जाता है और केवल 'ईश्वरार्पण' शेष रह जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ७॥


पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें, तत्पश्चात पवित्र मन से इस श्लोक का तीन बार उच्चारण करें। पाठ के उपरांत अपने दैनिक कर्मों को भगवान को समर्पित करने का संकल्प लें। यह श्लोक कर्मयोग का आधार है, अतः इसे कंठस्थ करना साधक के लिए मानसिक शांति का द्वार खोलता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
योगयुक्तःयोग से युक्तजो निरंतर परमात्मा के साथ अपना संबंध बनाए रखता है।
विशुद्धात्माशुद्ध अंतःकरण वालाजिसके मन में राग-द्वेष और मलिनता का अभाव हो चुका है।
विजितात्माजीता हुआ मनजिसने अपने मन को वश में कर लिया है, जो मन का दास नहीं स्वामी है।
जितेन्द्रियःजीती हुई इंद्रियाँजिसकी इंद्रियाँ विषयों के पीछे नहीं, बल्कि आत्मा के नियंत्रण में हैं।
सर्वभूतात्मभूतात्मासब प्राणियों में स्थित आत्माजो स्वयं को और समस्त जगत को एक ही परमात्मा का अंश मानता है।
कुर्वन्कर्म करते हुए भीसांसारिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते हुए।
अपिभीविरोधाभास को दर्शाने वाला अव्यय।
न लिप्यतेलिप्त नहीं होतापाप या पुण्य के फलों से अछूता रहना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। अर्जुन, जो अपने स्वजनों को देखकर मोहग्रस्त हो गए थे और युद्ध से विमुख होकर संन्यास लेना चाहते थे, उन्हें श्रीकृष्ण ने 'कर्मयोग' का मार्ग दिखाया। पौराणिक संदर्भों में, यह श्लोक 'निष्काम कर्म' के सिद्धांत को स्थापित करता है, जो वेदों के 'यज्ञ' भाव का ही विस्तार है।

ऋषियों ने इसे 'स्थितप्रज्ञ' अवस्था की सीढ़ी माना है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि संन्यास और कर्मयोग दोनों ही कल्याणकारी हैं, किंतु कर्मयोग श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें अहंकार का त्याग सहज है। यह श्लोक उस प्राचीन वैदिक परंपरा को पुष्ट करता है जहाँ 'कर्म' को 'पूजा' माना गया है। उपनिषदों में भी 'ईशावास्यमिदं सर्वम्' के माध्यम से इसी सत्य को प्रतिपादित किया गया है कि संसार में रहते हुए भी अनासक्त भाव से जीना ही वास्तविक धर्म है। महाभारत के युद्ध के पश्चात, जब पांडवों ने राज्य किया, तो उन्होंने इसी 'योगयुक्त' भाव को अपनाकर धर्म की स्थापना की। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन के संघर्षों (कुरुक्षेत्र) में रहते हुए भी हम अपनी आत्मा की शुद्धता (विशुद्धात्मा) को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि जीवन जीने का वह शास्त्र है जो हमें मोह के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: निरंतर जप से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  • अहंकार का नाश: 'सर्वभूतात्मभूतात्मा' के भाव से अहंकार का शमन होता है और विनम्रता आती है।
  • तनाव मुक्ति: कर्मफल की चिंता छोड़ने से कार्यक्षमता बढ़ती है और मानसिक तनाव समाप्त होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: यह श्लोक साधक के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच (आभा) निर्मित करता है।
  • कर्म शुद्धि: अनजाने में हुए पापों का प्रभाव कम होता है क्योंकि कर्म 'निष्काम' हो जाते हैं।
  • इंद्रिय निग्रह: इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त करने की शक्ति मिलती है, जिससे व्यसनों से मुक्ति संभव है।
  • समत्व भाव: सुख-दुख, लाभ-हानि में समान रहने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।
  • ईश्वरीय कृपा: साधक को निरंतर परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य कृत गीता भाष्य और आधुनिक आध्यात्मिक व्याख्याओं के समन्वय से तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल और प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करना है। इस लेख में दी गई व्याख्याएं शास्त्र सम्मत हैं और किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत मत से परे, वेदान्त के सिद्धांतों पर आधारित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, यदि कर्म 'योगयुक्त' होकर किया जाए, तो वह बंधन नहीं बल्कि मुक्ति का साधन बन जाता है। जब हम फल की इच्छा त्यागकर केवल कर्तव्य भाव से कार्य करते हैं, तो कर्म का बंधन स्वतः समाप्त हो जाता है।

विजितात्मा का अर्थ है मन पर विजय प्राप्त करना, जो कि आंतरिक प्रक्रिया है। जितेन्द्रिय का अर्थ है इंद्रियों (आंख, कान, नाक, त्वचा, जिह्वा) पर विजय पाना, जो बाह्य विषयों के प्रति आकर्षण को नियंत्रित करती है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

यह भाव निरंतर अभ्यास और ध्यान से आता है। जब हम यह देखना शुरू करते हैं कि जिस परमात्मा ने मुझे बनाया है, वही प्रत्येक जीव में विद्यमान है, तो करुणा और प्रेम का उदय होता है।

यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों के लिए ही है। संन्यासी तो पहले ही संसार से दूर हैं, लेकिन गृहस्थ को संसार में रहते हुए भी 'लिप्त' न होने की कला सीखने की आवश्यकता है, जो इस श्लोक का मुख्य संदेश है।

अपने हर कार्य को 'ईश्वर की सेवा' मानकर करें। कार्य करने से पहले प्रार्थना करें और कार्य के परिणाम को ईश्वर पर छोड़ दें। यही 'योगयुक्त' होने की सरल विधि है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो व्यक्ति कर्मयोग में स्थित है, उसका अन्तःकरण शुद्ध है, उसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और वह सभी प्राणियों में समभाव रखता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म के बन्धन में नहीं बंधता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/29 24% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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