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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 8

अध्याय 5 · श्लोक 8

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८॥

naiva kiñcit karomīti yukto manyeta tattvavit | paśyañ śṛṇvan spṛśañ jighrann aśnan gacchan svapañ śvasan ||8||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; एव: ही; किञ्चित्: कुछ; करोमि: करता हूँ; इति: ऐसा; युक्तः: कर्मयोगी; मन्येत: माने; तत्त्ववित्: तत्त्व को जानने वाला; पश्यन्: देखता हुआ; शृण्वन्: सुनता हुआ; स्पृशन्: स्पर्श करता हुआ; जिघ्रन्: सूंघता हुआ; अश्नन्: खाता हुआ; गच्छन्: जाता हुआ; स्वपन्: सोता हुआ; श्वसन्: साँस लेता हुआ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। (वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, जाता हुआ, सोता हुआ, साँस लेता हुआ...)

English Translation

I do nothing at all – thus the truth-knower, united with yoga, should think. Seeing, hearing, touching, smelling, eating, moving, sleeping, breathing...

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर एक वाक्य है। यहाँ कर्मयोगी की दृष्टि बताई गई है कि वह सभी क्रियाओं को प्रकृति के गुणों पर छोड़कर स्वयं को अकर्ता मानता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।