कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 8
श्लोक ८ में कर्मयोगी की अकर्ता-बुद्धि का वर्णन है।
संस्कृत श्लोक
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८॥
naiva kiñcit karomīti yukto manyeta tattvavit | paśyañ śṛṇvan spṛśañ jighrann aśnan gacchan svapañ śvasan ||8||
पदच्छेद / शब्दार्थ
न: नहीं; एव: ही; किञ्चित्: कुछ; करोमि: करता हूँ; इति: ऐसा; युक्तः: कर्मयोगी; मन्येत: माने; तत्त्ववित्: तत्त्व को जानने वाला; पश्यन्: देखता हुआ; शृण्वन्: सुनता हुआ; स्पृशन्: स्पर्श करता हुआ; जिघ्रन्: सूंघता हुआ; अश्नन्: खाता हुआ; गच्छन्: जाता हुआ; स्वपन्: सोता हुआ; श्वसन्: साँस लेता हुआ।
हिंदी अनुवाद
तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। (वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, जाता हुआ, सोता हुआ, साँस लेता हुआ...)
English Translation
I do nothing at all – thus the truth-knower, united with yoga, should think. Seeing, hearing, touching, smelling, eating, moving, sleeping, breathing...
टीका / Commentary
यह श्लोक अगले श्लोक के साथ मिलकर एक वाक्य है। यहाँ कर्मयोगी की दृष्टि बताई गई है कि वह सभी क्रियाओं को प्रकृति के गुणों पर छोड़कर स्वयं को अकर्ता मानता है।