श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 8

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 24 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् । पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
न
नहीं
एव
ही
किञ्चित्
कुछ
करोमि
करता हूँ
इति
ऐसा
युक्तः
कर्मयोगी
मन्येत
माने
तत्त्ववित्
तत्त्व को जानने वाला
पश्यन्
देखता हुआ
शृण्वन्
सुनता हुआ
स्पृशन्
स्पर्श करता हुआ
जिघ्रन्
सूंघता हुआ
अश्नन्
खाता हुआ
गच्छन्
जाता हुआ
स्वपन्
सोता हुआ
श्वसन्
साँस लेता हुआ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। (वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, जाता हुआ, सोता हुआ, साँस लेता हुआ...)

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का पंचम अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय का अष्टम श्लोक—"नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्"—मानव चेतना के उस उच्चतम शिखर को परिभाषित करता है, जहाँ साधक स्वयं को कर्ता मानने के अहंकार से मुक्त हो जाता है। वैदिक दर्शन में 'अहंकार' ही समस्त दुखों का मूल कारण है। जब तक मनुष्य यह मानता है कि "मैं कर रहा हूँ", तब तक वह कर्मों के फल (पाप-पुण्य) के बंधन में जकड़ा रहता है।

यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सूत्र नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक क्रांति है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि प्रकृति (माया) के तीन गुण—सत्त्व, रज और तम—ही संसार की समस्त हलचलें संचालित कर रहे हैं। जो व्यक्ति 'तत्त्ववित्' है, अर्थात जो सत्य को जान चुका है, वह देखता है कि शरीर, इंद्रियाँ और मन प्रकृति के अधीन कार्य कर रहे हैं। वह स्वयं को इन क्रियाओं का साक्षी (Witness) मात्र मानता है। यह अवस्था 'स्थितप्रज्ञ' होने की पहली सीढ़ी है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक भारतीय दर्शन की उस महान परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जो 'निष्काम कर्म' को मोक्ष का मार्ग मानती है। जब हम अपनी दैनिक क्रियाओं—देखना, सुनना, स्पर्श करना, खाना, चलना, सोना और श्वास लेना—को भी ईश्वर की इच्छा और प्रकृति का खेल मान लेते हैं, तब हम जीवन के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कार्य करना बुरा नहीं है, बल्कि कार्य के प्रति 'अहंकार' का भाव रखना बंधनकारी है। इस ज्ञान का आत्मसात करना ही जीवन की सार्थकता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् ॥ ८॥


अन्वय: तत्त्ववित् युक्त: 'नैव किञ्चित् करोमि' इति मन्येत, पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् (अपि)।

इस श्लोक के पाठ की विधि अत्यंत सरल किंतु गहन है। इसे केवल मुख से बोलना पर्याप्त नहीं है, अपितु इसे अपने अंतर्मन में उतारना आवश्यक है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात, शांत चित्त होकर भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप का ध्यान करें। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक क्रिया (जैसे पलक झपकना या श्वास लेना) पर ध्यान दें और यह अनुभव करें कि ये क्रियाएं आपके द्वारा नहीं, बल्कि आपके भीतर स्थित परमात्मा की शक्ति से संचालित हो रही हैं। इसे 'साक्षी भाव' का अभ्यास कहते हैं। नियमित रूप से इस श्लोक का मनन करने से चित्त की चंचलता शांत होती है और व्यक्ति धीरे-धीरे 'अकर्ता' भाव में प्रतिष्ठित होने लगता है। यह श्लोक कर्मयोग का सार है, अतः इसे अपने दैनिक जीवन के कार्यों के बीच में भी स्मरण करते रहना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तत्त्ववित्सत्य को जानने वालावह ज्ञानी जो आत्मा और प्रकृति के भेद को स्पष्ट समझता है।
युक्त:योगयुक्त/समाधिस्थजो निरंतर परमात्मा के साथ जुड़ा हुआ है।
नैव किञ्चित्कुछ भी नहींअहंकार का पूर्ण अभाव, जहाँ 'मैं' का लोप हो जाता है।
करोमीतिमैं करता हूँयह अज्ञानता का भाव है जिसे ज्ञानी त्याग देता है।
पश्यन्देखते हुएइंद्रियों के विषयों का ग्रहण मात्र, बिना आसक्ति के।
शृण्वन्सुनते हुएशब्दों को केवल ध्वनि के रूप में लेना, राग-द्वेष रहित।
स्पृशन्स्पर्श करते हुएबाह्य जगत के साथ संपर्क, किंतु मन का अलिप्त रहना।
जिघ्रन्सूंघते हुएगंध का अनुभव, किंतु उसमें उलझना नहीं।
अश्नन्भोजन करते हुएशरीर पोषण की क्रिया, जिसे यज्ञ के समान मानना।
स्वपन्सोते हुएचेतना का विश्राम, जहाँ अहंकार पूर्णतः शांत हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में उस समय उच्चारित हुआ जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहे थे। महाभारत के भीष्म पर्व में वर्णित यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के बीच का शाश्वत संवाद है। महर्षि वेदव्यास ने इसे लिपिबद्ध किया है, जो स्वयं ज्ञान के सागर हैं।

पौराणिक संदर्भ में, यह श्लोक 'सांख्य योग' और 'कर्मयोग' के मिलन बिंदु पर स्थित है। जब हम वेदों की ओर देखते हैं, तो उपनिषदों में भी इसी प्रकार के 'साक्षी भाव' का वर्णन मिलता है। श्वेताश्वतर उपनिषद में कहा गया है कि आत्मा अकर्ता है, वह केवल दृष्टा है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि कुरुक्षेत्र का युद्ध केवल एक बाह्य संग्राम नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक मनुष्य के भीतर चलने वाला धर्म और अधर्म का द्वंद्व है। जब अर्जुन यह सोचते हैं कि "मैं अपने गुरुओं और संबंधियों को मार रहा हूँ", तो वे 'कर्ता' बन जाते हैं और दुखी होते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें 'तत्त्ववित्' बनने का उपदेश देते हैं, ताकि वे यह समझ सकें कि जो कुछ हो रहा है, वह काल के चक्र और प्रकृति के गुणों के अधीन है। यह श्लोक हमें रामायण के उस प्रसंग की याद दिलाता है जहाँ भगवान श्रीराम ने भी वनवास के दौरान समस्त परिस्थितियों को 'दैवीय विधान' मानकर स्वीकार किया था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में आने वाले सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय केवल प्रकृति के खेल हैं। जो इस सत्य को जान लेता है, वह जीवन के महासागर को सहज ही पार कर लेता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का द्वार है, जो हमें कर्म के बंधन से मुक्त कर शाश्वत शांति प्रदान करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का शमन: नियमित चिंतन से 'मैं' का भाव कम होता है, जिससे मानसिक तनाव में कमी आती है।
  • साक्षी भाव की जागृति: व्यक्ति अपने सुख-दुख को तटस्थ होकर देखने में सक्षम हो जाता है।
  • कर्म बंधन से मुक्ति: निष्काम भाव से कार्य करने की क्षमता विकसित होती है, जिससे कर्मों का फल नहीं भोगना पड़ता।
  • एकाग्रता में वृद्धि: मन की चंचलता शांत होती है, जिससे ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।
  • सकारात्मक दृष्टिकोण: जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति विचलित नहीं होता।
  • आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार: यह श्लोक साधक के भीतर दिव्य चेतना को जागृत करता है।
  • भय से मुक्ति: मृत्यु और हानि का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि व्यक्ति स्वयं को अविनाशी आत्मा के रूप में अनुभव करने लगता है।
  • ईश्वरीय कृपा: जो स्वयं को अकर्ता मानकर कार्य करता है, उस पर परमात्मा की विशेष कृपा बनी रहती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, आदि शंकराचार्य के भाष्य और स्वामी विवेकानंद के कर्मयोग दर्शन के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों से परिचित कराना है। सभी संदर्भ प्रामाणिक शास्त्रों से लिए गए हैं, ताकि साधक को एक शुद्ध और स्पष्ट मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। हम यह सुनिश्चित करते हैं कि आध्यात्मिक व्याख्याओं में शास्त्रों की मूल मर्यादा बनी रहे और किसी भी प्रकार के भ्रामक दावों से बचा जाए।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

बिल्कुल नहीं। यह श्लोक 'कर्म संन्यास' नहीं, बल्कि 'कर्म योग' सिखाता है। इसका अर्थ है कार्य करते हुए भी उसके फल और कर्तापन के अहंकार का त्याग करना।

अपने दैनिक कार्यों को करते समय बीच-बीच में रुकें और स्वयं से पूछें—"कौन देख रहा है?" या "कौन श्वास ले रहा है?" धीरे-धीरे आपको अनुभव होगा कि आप केवल एक दृष्टा हैं।

आलस्य तमोगुण का लक्षण है, जबकि अकर्ता भाव सत्वगुण का। जब आप अकर्ता भाव में होते हैं, तो आप अधिक कुशलता और शांति से कार्य करते हैं क्योंकि आप तनावमुक्त होते हैं।

तत्त्ववित् वह है जो यह जान चुका है कि शरीर और आत्मा अलग-अलग हैं। वह प्रकृति के गुणों के खेल को समझकर उनसे ऊपर उठ चुका होता है।

आज के तनावपूर्ण युग में, जहाँ हर कोई सफलता के पीछे भाग रहा है, यह श्लोक मानसिक शांति और कार्य-क्षमता बढ़ाने का सबसे प्रभावी साधन है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो तत्त्व को जानने वाला कर्मयोगी है, वह सभी इन्द्रिय क्रियाओं में संलग्न रहते हुए भी यह मानता है कि मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ। वह जानता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में प्रकृति के गुणों द्वारा प्रवृत्त हो रही हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/29 28% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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