श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 9

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 37 मिनट का पठन 147 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
प्रलपन्
बोलता हुआ
विसृजन्
त्यागता हुआ
गृह्णन्
ग्रहण करता हुआ
उन्मिषन्
खोलता हुआ
निमिषन्
बन्द करता हुआ
अपि
भी
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
वर्तन्ते
बरतती हैं
इति
ऐसा
धारयन्
धारण करता हुआ (मानता हुआ)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

...बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता और बन्द करता हुआ – वह यही धारण करता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय (कर्मसंन्यासयोग) का यह नवम श्लोक भारतीय दर्शन, अध्यात्म और कर्मयोग की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ मनुष्य अपने अस्तित्व के वास्तविक स्वरूप को पहचानता है। यह श्लोक पिछले श्लोक (श्लोक 8) की निरंतरता में है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'तत्त्ववित्त' यानी परम सत्य को जानने वाले महापुरुष के लक्षणों और उसकी आंतरिक चेतना का वर्णन कर रहे हैं। इस श्लोक का सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें कर्तापन के अहंकार से मुक्त कराकर 'साक्षी भाव' (Witness Consciousness) में स्थापित करता है।

संसार में दुःख का मूल कारण यह भ्रांति है कि "मैं कर रहा हूँ।" जब जीव स्वयं को शरीर, मन और इन्द्रियों के साथ एकाकार कर लेता है, तो वह उनके द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म के फल से बंध जाता है। श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को समझाते हैं कि एक आत्मज्ञानी पुरुष उठते-बैठते, बोलते-त्यागते, यहाँ तक कि पलकें झपकाते हुए भी यह भली-भांति जानता है कि समस्त क्रियाएँ केवल प्रकृति के गुणों और इन्द्रियों के स्तर पर हो रही हैं। आत्मा इन सभी भौतिक प्रपंचों से परे, निर्लिप्त और परम शांत है। यह समझ ही मनुष्य को कर्मों के बंधन से मुक्त कर 'अकर्म' की स्थिति में ले जाती है, जो कि आध्यात्मिक मुक्ति का मुख्य द्वार है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ मूल श्लोक ॥

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥

|| Transliteration (IAST) ||

pralapan visṛjan gṛhṇan unmiṣan nimiṣann api |
indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan || 9 ||


पठन एवं साधना विधि:

इस श्लोक का पाठ केवल कंठस्थ करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए एक ध्यान पद्धति (Meditation Technique) के रूप में किया जाना चाहिए।

  • समय: ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4:00 से 6:00 बजे) या संध्याकाल में शांत चित्त होकर बैठें।
  • आसन: सिद्धासन, सुखासन या पद्मासन में रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर बैठें।
  • प्राणायाम: श्लोक के उच्चारण से पूर्व 5 बार गहरी श्वास लें और छोड़ें (अनुलोम-विलोम करें)।
  • मानसिक संकल्प: उच्चारण करते समय अपनी श्वास, पलकों के झपकने और शरीर की हलचल को एक तटस्थ दर्शक की तरह देखें। यह अनुभव करें कि आप शरीर नहीं, बल्कि इन सभी क्रियाओं को देखने वाले साक्षी चैतन्य हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदान्त दर्शन का निचोड़ छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का व्याकरणिक, सरल और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है ताकि साधक इसके मर्म को गहराई से समझ सकें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
प्रलपन् (Pralapan) बोलते हुए / वार्तालाप करते हुए वाणी का व्यवहार केवल इन्द्रिय (वाक्) का धर्म है। आत्मा मौन है; वह न तो बोलती है और न ही उपदेश देती है। बोलने की क्रिया केवल भौतिक जगत के संवाद के लिए है।
विसृजन् (Visṛjan) त्यागते हुए / विसर्जन करते हुए शरीर से मलमूत्र आदि का त्याग करना या किसी वस्तु को छोड़ना। यह शारीरिक शुद्धि और विसर्जन की प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें आत्मा की कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं होती।
गृह्णन् (Gṛhṇan) ग्रहण करते हुए / स्वीकार करते हुए हाथों से किसी वस्तु को पकड़ना या ज्ञानेन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण करना। यह क्रिया केवल शरीर की रक्षा और जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक भौतिक क्रिया है।
उन्मिषन् (Unmiṣan) आँखों को खोलते हुए नेत्रों का खुलना बाह्य जगत के दृश्यों को देखने की शारीरिक प्रक्रिया है। यह चक्षु इन्द्रिय का स्वाभाविक धर्म है।
निमिषन् (Nimiṣan) आँखों को बंद करते हुए पलकों का झपकना या बंद होना। यह एक अनैच्छिक शारीरिक क्रिया (Involuntary Action) है, जो सिद्ध करती है कि शरीर हमारे बिना प्रयास के भी अपने नियम से चलता है।
अपि (Api) भी / इसके अतिरिक्त भी यह शब्द दर्शाता है कि जीवन की अन्य सभी सूक्ष्म से सूक्ष्म शारीरिक और मानसिक क्रियाएँ भी इसी श्रेणी में आती हैं।
इन्द्रियाणि (Indriyāṇi) समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) और पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, वाणी, उपस्थ, पायु)। ये सभी प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से निर्मित हैं।
इन्द्रियार्थेषु (Indriyārtheṣu) अपने-अपने विषयों में इन्द्रियों के विषय जैसे रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श। इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से अपने अनुकूल विषयों की ओर आकर्षित होती हैं।
वर्तन्ते (Vartante) कार्य कर रही हैं / प्रवृत्त हो रही हैं यह समझना कि इन्द्रियाँ और उनके विषय आपस में क्रिया-प्रतिक्रिया कर रहे हैं। आत्मा इस संपूर्ण चक्र से सर्वथा अछूती और परे है।
इति (Iti) इस प्रकार / ऐसा इस सत्य को आत्मसात करते हुए, जो कि अज्ञानता के अंधकार को नष्ट करने वाला है।
धारयन् (Dhārayan) निश्चयपूर्वक धारण करते हुए बुद्धि में इस सत्य को दृढ़ता से स्थापित करना। यह केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास से उपजी गहरी आत्मानुभूति है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि को समझने के लिए हमें महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के उस ऐतिहासिक क्षण में जाना होगा, जहाँ अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने धनुष को रख देते हैं। अर्जुन का भ्रम यह था कि वे स्वयं को उन सभी हत्याओं का 'कर्ता' मान रहे थे जो युद्ध में होने वाली थीं। वे सोच रहे थे, "मैं अपने गुरुओं और भाइयों को मारूँगा, जिससे मुझे पाप लगेगा।" श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इसी 'कर्तापन के अहंकार' (Sense of Doership) को नष्ट करने के लिए सांख्य योग और कर्मयोग का उपदेश दिया।

वैदिक साहित्य और उपनिषदों में, विशेष रूप से कठोपनिषद् में, शरीर की तुलना एक रथ से की गई है। इस रथ में इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथी है और जीवात्मा इस रथ का स्वामी या यात्री है। जब तक यात्री (जीवात्मा) स्वयं को सारथी या घोड़ों की क्रियाओं से अलग नहीं समझता, तब तक वह भयभीत और अशांत रहता है। श्रीकृष्ण इसी उपनिषदिक सत्य को अत्यंत सरल शब्दों में यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

पौराणिक संदर्भों में, महर्षि वशिष्ठ ने योग वासिष्ठ में श्रीरामचंद्र जी को भी इसी प्रकार का उपदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि जैसे सूर्य संसार के सभी शुभ-अशुभ कार्यों को प्रकाशित करता है, परंतु स्वयं उन कार्यों के पुण्य या पाप से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार हमारे भीतर बैठी आत्मा केवल चैतन्य प्रकाश प्रदान करती है। समस्त क्रियाएँ प्रकृति के गुणों द्वारा ही संचालित होती हैं। जब राजा जनक को अष्टावक्र मुनि ने यही ज्ञान दिया, तो वे क्षण भर में जीवनमुक्त हो गए। राजा जनक राजपाट के सभी कार्य करते हुए भी भीतर से पूर्णतः संन्यासी थे, क्योंकि वे इस श्लोक में वर्णित 'इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त' के सिद्धांत को जी रहे थे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक के अर्थ का निरंतर चिंतन और मनन करने से साधक के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:

1. मानसिक तनाव और चिंता से मुक्ति

जब हम यह मान लेते हैं कि हम हर परिस्थिति के कर्ता नहीं हैं, तो भविष्य की चिंता और असफलताओं का बोझ हमारे कंधों से उतर जाता है, जिससे परम शांति मिलती है।

2. अहंकार (Ego) का समूल नाश

"मैंने यह किया" का भाव ही अहंकार को जन्म देता है। इस श्लोक का चिंतन करने से साधक समझ जाता है कि सब कुछ प्रकृति द्वारा कराया जा रहा है, जिससे नम्रता आती है।

3. साक्षी भाव (Mindfulness) का उदय

आधुनिक मनोविज्ञान जिसे 'माइंडफुलनेस' कहता है, वह इस श्लोक का व्यावहारिक रूप है। अपनी ही शारीरिक क्रियाओं को तटस्थ होकर देखना सजगता को बढ़ाता है।

4. कर्म बंधन से मुक्ति (Karmic Freedom)

अकर्ता भाव से किए गए कर्म कभी भी संचित कर्म या प्रारब्ध नहीं बनते। साधक कर्म करते हुए भी उसके फल के बंधन से मुक्त रहता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा और आभा मंडल (Aura) का विकास

निरंतर इस भाव में रहने से मस्तिष्क में शांति के न्यूरॉन्स सक्रिय होते हैं, जिससे चेहरे पर तेज और शरीर के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।

6. इन्द्रियों पर स्वतः नियंत्रण (Self-Control)

जब हम इन्द्रियों को अपना स्वरूप न मानकर केवल एक उपकरण मानते हैं, तो उनकी गुलामी समाप्त हो जाती है और हम अपनी इन्द्रियों के स्वामी बन जाते हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत आता है, जिसे प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के पारंपरिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य के 'गीता भाष्य', स्वामी चिन्मयानंद की व्याख्याओं और गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक प्रकाशनों के गहन अध्ययन के बाद संकलित किया गया है।

इस श्लोक का मुख्य उद्देश्य साधक को शुष्क बौद्धिक ज्ञान से ऊपर उठाकर व्यावहारिक वेदान्त की ओर ले जाना है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और मानसिक अवसाद के दौर में, यह श्लोक एक मानसिक औषधि की तरह काम करता है। यह हमें सिखाता है कि हम संसार में अपनी सभी भूमिकाएँ (माता, पिता, कर्मचारी, नागरिक) पूरी निष्ठा से निभाएँ, परंतु भीतर से हमेशा यह याद रखें कि हमारा वास्तविक स्वरूप इन सभी नश्वर क्रियाओं से परे अविनाशी चैतन्य है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति 'कर्तापन' का अहंकार छोड़ देना चाहिए। व्यावहारिक जीवन में इसका अर्थ है कि जब आप कोई कार्य करें, तो यह समझें कि आपकी इन्द्रियाँ और शरीर केवल अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, जबकि आपकी वास्तविक आत्मा शांत और निर्लिप्त है। इससे कार्य का तनाव समाप्त हो जाता है।

नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह श्लोक उस उच्च आध्यात्मिक स्थिति (ज्ञानयोग) का वर्णन करता है जहाँ साधक का अहंकार पूरी तरह मिट चुका होता है। यदि कोई व्यक्ति पाप कर्म करते हुए कहे कि "मैं नहीं, मेरी इन्द्रियाँ कर रही हैं," तो यह तामसिक बुद्धि और अज्ञानता का लक्षण है। जिम्मेदारी से मुक्ति केवल तब मिलती है जब स्वार्थ और वासनाएँ पूरी तरह समाप्त हो चुकी हों।

इसका अर्थ है कि "इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।" उदाहरण के लिए, आँखों का काम देखना है, कानों का काम सुनना है, और जीभ का काम स्वाद लेना है। यह सब प्रकृति के नियमों के तहत स्वतः हो रहा है। आत्मा इन क्रियाओं से परे केवल इनका प्रकाशक है।

एक गृहस्थ व्यक्ति अपने कार्यालय या घर के काम करते समय इस श्लोक को लागू कर सकता है। काम करते समय मन में यह भाव रखें: "यह शरीर और बुद्धि समाज और परिवार की सेवा के लिए कार्य कर रहे हैं, मैं तो केवल इस नाटक का एक दर्शक हूँ।" इस भाव से काम करने पर काम का बोझ नहीं लगेगा और काम की गुणवत्ता भी बढ़ेगी।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 5 (कर्मसंन्यासयोग) का श्लोक 9 है। यह श्लोक 8 के साथ मिलकर एक पूर्ण विचार प्रस्तुत करता है, जिसमें ज्ञानयोगी की जीवनशैली और उसकी आंतरिक मानसिक स्थिति का वर्णन किया गया है।

"कर्म करते रहो, परंतु कर्तापन के अहंकार से दूर रहो। यही जीवन का परम सत्य और आनंद का मार्ग है।"

— जय श्री कृष्ण —

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

ज्ञानी पुरुष सभी क्रियाओं – बोलना, त्यागना, ग्रहण करना, आँखें खोलना-बन्द करना – को केवल इन्द्रियों की क्रिया मानता है। वह जानता है कि आत्मा इन क्रियाओं से परे है और इनमें लिप्त नहीं होता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 9 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 9/29 31% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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