कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 9
श्लोक ९ में कर्मयोगी की दृष्टि का वर्णन जारी है – वह इन्द्रियों की क्रियाओं में स्वयं को अकर्ता देखता है।
संस्कृत श्लोक
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥
pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣann nimiṣann api | indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||9||
पदच्छेद / शब्दार्थ
प्रलपन्: बोलता हुआ; विसृजन्: त्यागता हुआ; गृह्णन्: ग्रहण करता हुआ; उन्मिषन्: खोलता हुआ; निमिषन्: बन्द करता हुआ; अपि: भी; इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; इन्द्रियार्थेषु: इन्द्रियों के विषयों में; वर्तन्ते: बरतती हैं; इति: ऐसा; धारयन्: धारण करता हुआ (मानता हुआ)।
हिंदी अनुवाद
...बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता और बन्द करता हुआ – वह यही धारण करता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।
English Translation
...speaking, releasing, grasping, opening and closing the eyes – he holds that the senses move among sense-objects.
टीका / Commentary
यह श्लोक पिछले श्लोक की निरंतरता है। कर्मयोगी की बुद्धि में यह स्थिति रहती है कि सभी क्रियाएँ इन्द्रियों द्वारा हो रही हैं, आत्मा न तो कर्ता है और न भोक्ता।