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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 9

अध्याय 5 · श्लोक 9

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि । इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ ९॥

pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣann nimiṣann api | indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||9||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

प्रलपन्: बोलता हुआ; विसृजन्: त्यागता हुआ; गृह्णन्: ग्रहण करता हुआ; उन्मिषन्: खोलता हुआ; निमिषन्: बन्द करता हुआ; अपि: भी; इन्द्रियाणि: इन्द्रियाँ; इन्द्रियार्थेषु: इन्द्रियों के विषयों में; वर्तन्ते: बरतती हैं; इति: ऐसा; धारयन्: धारण करता हुआ (मानता हुआ)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

...बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता और बन्द करता हुआ – वह यही धारण करता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों में बरत रही हैं।

English Translation

...speaking, releasing, grasping, opening and closing the eyes – he holds that the senses move among sense-objects.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक पिछले श्लोक की निरंतरता है। कर्मयोगी की बुद्धि में यह स्थिति रहती है कि सभी क्रियाएँ इन्द्रियों द्वारा हो रही हैं, आत्मा न तो कर्ता है और न भोक्ता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।