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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 10

अध्याय 5 · श्लोक 10

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥

brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ | lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā ||10||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ब्रह्मणि: ब्रह्म (परमात्मा) में; आधाय: समर्पित करके; कर्माणि: कर्मों को; सङ्गम्: आसक्ति; त्यक्त्वा: छोड़कर; करोति: करता है; यः: जो; लिप्यते: लिप्त होता है; न: नहीं; स: वह; पापेन: पाप से; पद्मपत्रम्: कमल-पत्ता; इव: जैसे; अम्भसा: जल से।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो पुरुष आसक्ति का त्याग करके कर्मों को ब्रह्म (परमात्मा) में अर्पित कर देता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्ता जल से नहीं भीगता।

English Translation

He who does actions, offering them to Brahman (the Supreme) and abandoning attachment, is not tainted by sin, just as a lotus leaf is not tainted by water.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक कर्मयोग का सार है। कर्मों को ईश्वरार्पण करने और फल की आसक्ति छोड़ने से व्यक्ति कर्म के बन्धन से मुक्त रहता है। जैसे कमल-पत्ता पानी में रहते हुए भी नहीं भीगता, वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी पाप से अलिप्त रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।