कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 10

श्लोक १० में कर्मों को ईश्वर को अर्पित करने का महत्व बताया गया है, जिससे व्यक्ति पाप से अलिप्त रहता है।

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ १०॥

brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ | lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā ||10||

पदच्छेद / शब्दार्थ

ब्रह्मणि: ब्रह्म (परमात्मा) में; आधाय: समर्पित करके; कर्माणि: कर्मों को; सङ्गम्: आसक्ति; त्यक्त्वा: छोड़कर; करोति: करता है; यः: जो; लिप्यते: लिप्त होता है; न: नहीं; स: वह; पापेन: पाप से; पद्मपत्रम्: कमल-पत्ता; इव: जैसे; अम्भसा: जल से।

हिंदी अनुवाद

जो पुरुष आसक्ति का त्याग करके कर्मों को ब्रह्म (परमात्मा) में अर्पित कर देता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल-पत्ता जल से नहीं भीगता।

English Translation

He who does actions, offering them to Brahman (the Supreme) and abandoning attachment, is not tainted by sin, just as a lotus leaf is not tainted by water.

टीका / Commentary

यह श्लोक कर्मयोग का सार है। कर्मों को ईश्वरार्पण करने और फल की आसक्ति छोड़ने से व्यक्ति कर्म के बन्धन से मुक्त रहता है। जैसे कमल-पत्ता पानी में रहते हुए भी नहीं भीगता, वैसे ही योगी संसार में रहते हुए भी पाप से अलिप्त रहता है।