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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 11

अध्याय 5 · श्लोक 11

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११॥

kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api | yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātma-śuddhaye ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कायेन: शरीर से; मनसा: मन से; बुद्ध्या: बुद्धि से; केवलैः: केवल; इन्द्रियैः: इन्द्रियों से; अपि: भी; योगिनः: योगी; कर्म: कर्म; कुर्वन्ति: करते हैं; सङ्गम्: आसक्ति; त्यक्त्वा: छोड़कर; आत्मशुद्धये: अन्तःकरण की शुद्धि के लिए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

योगीजन आसक्ति का त्याग करके केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा भी (अर्थात् कर्तापन के अभिमान बिना) अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

English Translation

Yogis, abandoning attachment, perform actions only with the body, mind, intellect, and even the senses, for the purification of the self.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

योगी लोग कर्तापन के अभिमान से रहित होकर, केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को क्रियाशील रखते हुए कर्म करते हैं। उनका उद्देश्य फल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।