कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 11

श्लोक ११ में बताया गया है कि योगी आसक्ति त्यागकर केवल अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

संस्कृत श्लोक

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि । योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥ ११॥

kāyena manasā buddhyā kevalair indriyair api | yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṃ tyaktvātma-śuddhaye ||11||

पदच्छेद / शब्दार्थ

कायेन: शरीर से; मनसा: मन से; बुद्ध्या: बुद्धि से; केवलैः: केवल; इन्द्रियैः: इन्द्रियों से; अपि: भी; योगिनः: योगी; कर्म: कर्म; कुर्वन्ति: करते हैं; सङ्गम्: आसक्ति; त्यक्त्वा: छोड़कर; आत्मशुद्धये: अन्तःकरण की शुद्धि के लिए।

हिंदी अनुवाद

योगीजन आसक्ति का त्याग करके केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा भी (अर्थात् कर्तापन के अभिमान बिना) अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

English Translation

Yogis, abandoning attachment, perform actions only with the body, mind, intellect, and even the senses, for the purification of the self.

टीका / Commentary

योगी लोग कर्तापन के अभिमान से रहित होकर, केवल शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को क्रियाशील रखते हुए कर्म करते हैं। उनका उद्देश्य फल नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि है।