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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 12

अध्याय 5 · श्लोक 12

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् । अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥ १२॥

yuktaḥ karma-phalaṃ tyaktvā śāntim āpnoti naiṣṭhikīm | ayuktaḥ kāma-kāreṇa phale sakto nibadhyate ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

युक्तः: कर्मयोगी; कर्मफलम्: कर्म के फल को; त्यक्त्वा: त्यागकर; शान्तिम्: शांति; आप्नोति: प्राप्त करता है; नैष्ठिकीम्: परम (नैष्ठिक); अयुक्तः: अयोगी (आसक्त); कामकारेण: कामना से प्रेरित; फले: फल में; सक्तः: आसक्त; निबध्यते: बंधता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

कर्मयोगी कर्मफल का त्याग करके परम शांति को प्राप्त होता है, जबकि अयोगी (आसक्त पुरुष) कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त रहने के कारण बंधन में पड़ जाता है।

English Translation

The united one (karma yogi), having abandoned the fruit of action, attains eternal peace. The ununited one (attached one), impelled by desire and attached to the fruit, is bound.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

फल की आसक्ति ही बंधन का कारण है। कर्मयोगी फल की इच्छा न रखते हुए शांति पाता है, जबकि आसक्त व्यक्ति कर्मों के फल से बंध जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।