सांख्य योग (Sankhya Yoga) – श्लोक 38

श्लोक ३८ में कर्मयोग का उपदेश है – सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान मानकर युद्ध करो, इससे पाप नहीं होगा।

संस्कृत श्लोक

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ | ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ||३८||

sukha-duḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau | tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpam avāpsyasi ||38||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सुखदुःखे: सुख और दुःख; समे: समान; कृत्वा: करके; लाभालाभौ: लाभ-हानि; जयाजयौ: जय-पराजय; ततः: तब; युद्धाय: युद्ध के लिए; युज्यस्व: तैयार हो; न: नहीं; एवम्: इस प्रकार; पापम्: पाप; अवाप्स्यसि: प्राप्त होगा।

हिंदी अनुवाद

सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर तू युद्ध के लिए तैयार हो। इस प्रकार (युद्ध करने से) तू पाप को प्राप्त नहीं होगा।

English Translation

Treating pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat alike, engage in battle for the sake of battle. Thus you will not incur sin.

टीका / Commentary

यह श्लोक कर्मयोग का सार है – फल की चिन्ता न करके, समभाव से कर्तव्य करो। इससे पाप नहीं लगता।