कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 13

श्लोक १३ में बताया गया है कि आत्मसंयमी पुरुष मन से कर्मों का त्याग करके शरीर में सुखपूर्वक रहता है।

संस्कृत श्लोक

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥

sarva-karmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṃ vaśī | nava-dvāre pure dehī naiva kurvan na kārayan ||13||

पदच्छेद / शब्दार्थ

सर्वकर्माणि: सब कर्मों को; मनसा: मन से; संन्यस्य: त्यागकर; आस्ते: स्थित रहता है; सुखम्: सुखपूर्वक; वशी: वशीभूत (आत्मसंयमी); नवद्वारे: नौ द्वारों वाले; पुरे: नगर (शरीर) में; देही: जीवात्मा; न: नहीं; एव: ही; कुर्वन्: करता हुआ; न: नहीं; कारयन्: करवाता हुआ।

हिंदी अनुवाद

वशीभूत (आत्मसंयमी) जीवात्मा मन से सम्पूर्ण कर्मों का संन्यास करके उस नौ-द्वारों वाले शरीर-रूपी नगर में सुखपूर्वक स्थित रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न ही करवाता है।

English Translation

The embodied soul who is self-controlled, having mentally renounced all actions, dwells at ease in the nine-gated city (the body), neither acting nor causing action.

टीका / Commentary

जब व्यक्ति मन से ही सभी कर्मों का त्याग कर देता है – अर्थात् कर्तापन के अभिमान को त्याग देता है – तो वह शरीर में रहते हुए भी कर्मों से अलिप्त रहता है। वह देह के साथ तादात्म्य नहीं करता, इसलिए सुखी रहता है।