आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 13

अध्याय 5 · श्लोक 13

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥

sarva-karmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṃ vaśī | nava-dvāre pure dehī naiva kurvan na kārayan ||13||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सर्वकर्माणि: सब कर्मों को; मनसा: मन से; संन्यस्य: त्यागकर; आस्ते: स्थित रहता है; सुखम्: सुखपूर्वक; वशी: वशीभूत (आत्मसंयमी); नवद्वारे: नौ द्वारों वाले; पुरे: नगर (शरीर) में; देही: जीवात्मा; न: नहीं; एव: ही; कुर्वन्: करता हुआ; न: नहीं; कारयन्: करवाता हुआ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

वशीभूत (आत्मसंयमी) जीवात्मा मन से सम्पूर्ण कर्मों का संन्यास करके उस नौ-द्वारों वाले शरीर-रूपी नगर में सुखपूर्वक स्थित रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न ही करवाता है।

English Translation

The embodied soul who is self-controlled, having mentally renounced all actions, dwells at ease in the nine-gated city (the body), neither acting nor causing action.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जब व्यक्ति मन से ही सभी कर्मों का त्याग कर देता है – अर्थात् कर्तापन के अभिमान को त्याग देता है – तो वह शरीर में रहते हुए भी कर्मों से अलिप्त रहता है। वह देह के साथ तादात्म्य नहीं करता, इसलिए सुखी रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।