श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 13

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 25 मिनट का पठन 182 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी । नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
सर्वकर्माणि
सब कर्मों को
मनसा
मन से
संन्यस्य
त्यागकर
आस्ते
स्थित रहता है
सुखम्
सुखपूर्वक
वशी
वशीभूत (आत्मसंयमी)
नवद्वारे
नौ द्वारों वाले
पुरे
नगर (शरीर) में
देही
जीवात्मा
न
नहीं
एव
ही
कुर्वन्
करता हुआ
न
नहीं
कारयन्
करवाता हुआ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वशीभूत (आत्मसंयमी) जीवात्मा मन से सम्पूर्ण कर्मों का संन्यास करके उस नौ-द्वारों वाले शरीर-रूपी नगर में सुखपूर्वक स्थित रहता है। वह न तो स्वयं कुछ करता है और न ही करवाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

भगवद्गीता का पंचम अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' के नाम से विख्यात है, जो साधक को कर्म और अकर्म के सूक्ष्म भेदों से परिचित कराता है। प्रस्तुत श्लोक—"सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी, नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्"—मानव जीवन के सबसे कठिन किंतु अनिवार्य सत्य को उद्घाटित करता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि मुक्ति का वह राजमार्ग है जिस पर चलकर मनुष्य संसार के कोलाहल में रहते हुए भी परम शांति का अनुभव कर सकता है।

वैदिक दर्शन में 'नवद्वारे पुरे' का अर्थ इस नश्वर शरीर से है, जिसमें नौ द्वार (दो आँखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, और दो उत्सर्जन अंग) हैं। इस शरीर रूपी नगर में आत्मा 'देही' के रूप में निवास करती है। जब साधक यह समझ लेता है कि वह कर्ता नहीं, बल्कि केवल एक दृष्टा है, तो उसके समस्त कर्म स्वतः ही 'अकर्म' में परिवर्तित हो जाते हैं। यह स्थिति अहंकार के विसर्जन की पराकाष्ठा है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि धर्म का अर्थ कर्मों का त्याग नहीं, बल्कि कर्मों के प्रति आसक्ति का त्याग है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें उस 'अकर्ता' परमात्मा के स्वरूप से जोड़ता है, जो स्वयं कुछ न करते हुए भी संपूर्ण सृष्टि का संचालन कर रहा है। जब हम अपनी चेतना को उस परमात्मा के साथ एकाकार कर लेते हैं, तो हम 'वशी' (अपने मन को वश में करने वाले) बन जाते हैं और जीवन के हर क्षण में सुख और आनंद का अनुभव करते हैं। यह श्लोक उन सभी के लिए एक प्रकाश स्तंभ है जो सांसारिक कर्तव्यों के बोझ तले दबे हुए हैं और मोक्ष की कामना करते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ॥ १३॥

उच्चारण विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए। 'सर्वकर्माणि' का उच्चारण करते समय मन में यह भाव लाएं कि आप अपने सभी उत्तरदायित्वों को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रहे हैं। 'नवद्वारे पुरे देही' का चिंतन करते समय अपने शरीर के प्रति मोह को कम करने का प्रयास करें। यह श्लोक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्मसात करने के लिए है। प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में इसका तीन बार पाठ करने से मन में स्थिरता आती है और दिन भर के कार्यों में कर्तापन का अहंकार नहीं आता। यह श्लोक गीता के पंचम अध्याय के 13वें श्लोक के रूप में प्रतिष्ठित है, जो साधक को 'स्थितप्रज्ञ' बनने की दिशा में प्रेरित करता है। इसका नियमित जप करने से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं और व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप—आत्मा—को पहचानने में सक्षम होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सर्वकर्माणिसभी कर्मों कोसांसारिक और शास्त्रीय समस्त क्रियाएं।
मनसामन के द्वारासंकल्प और विकल्प का केंद्र, जहाँ से आसक्ति उपजती है।
संन्यस्यत्याग करकेकर्तृत्व के अभिमान का पूर्ण समर्पण।
आस्तेस्थित रहता हैविचलित न होकर अपनी आत्मा में स्थिर होना।
सुखंसुखपूर्वकपरमानंद, जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है।
वशीवश में करने वालाइंद्रियों और मन को नियंत्रित रखने वाला योगी।
नवद्वारे पुरेनौ द्वारों वाले नगर (शरीर) मेंआत्मा का निवास स्थान, जो नौ छिद्रों से युक्त है।
देहीआत्मा (शरीरधारी)वह चेतन तत्व जो शरीर में रहते हुए भी उससे भिन्न है।
नैव कुर्वन्न तो स्वयं करता हैसाक्षी भाव, जहाँ कर्म का फल आत्मा को नहीं छूता।
न कारयन्न दूसरों से करवाता हैअहंकार का अभाव, जहाँ कोई भी कार्य 'मेरे द्वारा' नहीं होता।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने स्वजनों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं और कर्म से विमुख होकर संन्यास लेने की बात करते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें 'कर्मयोग' का मार्ग दिखाते हैं। यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच का शाश्वत संवाद है।

पौराणिक संदर्भ में, यह श्लोक उपनिषदों के 'अशरीरी' सिद्धांत पर आधारित है। कठोपनिषद में भी शरीर को 'पुर' (नगर) कहा गया है जिसके ग्यारह द्वार हैं (नौ बाह्य और दो आंतरिक)। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जो व्यक्ति अपने मन को वश में कर लेता है, वह इस शरीर रूपी नगर का राजा होकर भी इसमें 'अलिप्त' रहता है। महाभारत के अनुशासन पर्व और शांति पर्व में भी ऐसे कई प्रसंग आते हैं जहाँ भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इसी 'अकर्ता' भाव के महत्व को समझाया है। यह श्लोक सांख्य दर्शन और वेदांत का अद्भुत संगम है। सांख्य दर्शन जहाँ प्रकृति और पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है, वहीं वेदांत यह सिखाता है कि कैसे उस पुरुष (आत्मा) को जानकर हम संसार के दुखों से मुक्त हो सकते हैं। यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि संन्यास का अर्थ वनों में जाना नहीं, बल्कि मन की शुद्धि है। राजा जनक का उदाहरण यहाँ सबसे सटीक बैठता है, जो एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बावजूद 'विदेह' (देह से ऊपर) कहलाए, क्योंकि उन्होंने अपने सभी कर्मों को मन से ईश्वर को समर्पित कर दिया था।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का नाश: नियमित चिंतन से 'मैं करता हूँ' का भाव धीरे-धीरे समाप्त होता है, जिससे अहंकार जनित तनाव कम होता है।
  • मानसिक स्थिरता: मन को वश में करने की शक्ति प्राप्त होती है, जिससे विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति विचलित नहीं होता।
  • कर्मिक शुद्धि: जब कर्मों का फल ईश्वर को समर्पित कर दिया जाता है, तो वे कर्म बंधन का कारण नहीं बनते।
  • अध्यात्मिक आभा (Aura): इस श्लोक के अर्थ को जीवन में उतारने से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • भय से मुक्ति: देह के साथ तादात्म्य कम होने से मृत्यु और हानि का भय समाप्त हो जाता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: मन के बिखराव को रोकने से ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।
  • परमानंद की प्राप्ति: बाहरी सुख-दुख से परे होकर आत्मा के आनंद का अनुभव होने लगता है।
  • कर्तव्य पालन में कुशलता: जब व्यक्ति कर्तापन के बोझ से मुक्त होता है, तो वह अपने कार्यों को अधिक कुशलता और निष्पक्षता से कर पाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय (कर्मसंन्यासयोग) के मूल संस्कृत श्लोकों और भाष्यकारों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी) के दृष्टिकोणों के आधार पर संकलित किया गया है। इसका उद्देश्य पाठकों को शास्त्रीय ज्ञान की प्रामाणिक व्याख्या प्रदान करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और मानसिक शांति के लिए वैदिक सिद्धांतों का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

बिल्कुल नहीं। यह श्लोक 'कर्म' छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि 'कर्म के फल' और 'कर्तापन के अभिमान' को छोड़ने के लिए कहता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध (कर्म) करने के लिए ही प्रेरित कर रहे हैं, लेकिन आसक्ति रहित होकर।

यह शरीर नौ द्वारों वाला एक नगर है। दो आँखें, दो कान, दो नासिका, एक मुख, और दो उत्सर्जन अंग। आत्मा इस शरीर में रहती है, लेकिन वह इन द्वारों के माध्यम से होने वाली क्रियाओं से अलिप्त है।

मन से संन्यास का अर्थ है—यह स्वीकार करना कि शरीर और इंद्रियाँ प्रकृति के गुणों के अधीन कार्य कर रही हैं। मैं केवल साक्षी हूँ। जब हम अपने हर कार्य को ईश्वर की सेवा मानकर करते हैं, तो मन से संन्यास स्वतः हो जाता है।

वशी वह है जिसने अपने मन और इंद्रियों को अपने वश में कर लिया है। वह बाहरी सुख-दुख के प्रभाव में आकर अपना संतुलन नहीं खोता।

आज के युग में जब हर कोई सफलता के दबाव में है, यह श्लोक एक संजीवनी की तरह है। यह सिखाता है कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें, लेकिन परिणाम के प्रति अनासक्त रहें। इससे मानसिक तनाव और अवसाद (Depression) से मुक्ति मिलती है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

शरीर को नौ द्वारों वाला नगर कहा गया है (दो नेत्र, दो नासिका, दो कान, मुख, गुदा, जननेन्द्रिय)। आत्मसंयमी जीव मन से ही सभी कर्मों का संन्यास करके इस नगर में सुखपूर्वक निवास करता है। वह जानता है कि वह कर्ता नहीं है, न ही वह किसी से कुछ करवाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/29 45% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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