श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 14

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 22 मिनट का पठन 178 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
न
नहीं
कर्तृत्वम्
कर्तापन
न
नहीं
कर्माणि
कर्म
लोकस्य
लोक (जीवों) के
सृजति
रचता है
प्रभुः
ईश्वर
न
नहीं
कर्मफलसंयोगम्
कर्मों के फलों का सम्बन्ध
स्वभावः
प्रकृति (स्वभाव)
तु
परन्तु
प्रवर्तते
प्रवृत्त होती है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

प्रभु (परमात्मा) न तो लोक (जीवों) के लिए कर्तृत्व रचते हैं, न कर्म, और न कर्मों के फलों का संयोग। परन्तु स्वभाव (प्रकृति) (इन सबमें) प्रवृत्त होती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक (5.14) वेदांत दर्शन का वह आधारस्तंभ है जो मनुष्य को उसके अस्तित्व के सबसे बड़े भ्रम—'अहंकार'—से मुक्त करने का सामर्थ्य रखता है। अधिकांश साधक जीवन भर इस द्वंद्व में उलझे रहते हैं कि क्या ईश्वर उनके दुखों का कारण है? क्या ईश्वर ने ही हमारे भाग्य की रेखाएं खींची हैं? भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि परमात्मा न तो किसी के कर्मों का सृजन करते हैं, न ही वे किसी को कर्म करने के लिए विवश करते हैं। यह संपूर्ण जगत, जिसमें हमारे कर्म और उनके फल समाहित हैं, 'स्वभाव' यानी प्रकृति के गुणों (सत्व, रज, तम) के अधीन संचालित होता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें 'निष्काम कर्मयोग' की ओर ले जाता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि कर्तापन का भाव केवल एक मानसिक भ्रांति है, तो हम कर्मों के फल से अनासक्त हो जाते हैं। यह ज्ञान न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि व्यक्ति को 'स्थितप्रज्ञ' बनने की दिशा में अग्रसर करता है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ईश्वर तटस्थ साक्षी (Sakshi) हैं। वे सूर्य के समान हैं, जो सबको प्रकाश देते हैं, परंतु कौन उस प्रकाश का उपयोग करके क्या करता है, यह उस जीव की अपनी प्रकृति और चेतना पर निर्भर करता है। इस श्लोक का चिंतन हमें आत्म-साक्षात्कार की उस पराकाष्ठा पर ले जाता है जहाँ 'मैं' का अहंकार विलीन होकर 'ब्रह्म' का बोध जागृत होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४॥


पदच्छेद: न, कर्तृत्वम्, न, कर्माणि, लोकस्य, सृजति, प्रभुः । न, कर्मफलसंयोगम्, स्वभावः, तु, प्रवर्तते ॥

पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें, दीप प्रज्वलित करें और मन को शांत करके इस श्लोक का 11 बार उच्चारण करें। उच्चारण के पश्चात, अपने भीतर के अहंकार को परमात्मा के चरणों में समर्पित करने का भाव रखें। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक 'मंत्र' है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाने में सक्षम है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न कर्तृत्वम्न कर्तापनजीव का यह मिथ्या अहंकार कि "मैं कर रहा हूँ"।
न कर्माणिन कर्मों कोबाह्य क्रियाएं जो प्रकृति के गुणों द्वारा संचालित हैं।
लोकस्यसंसार केइस भौतिक जगत के समस्त प्राणियों के लिए।
सृजतिरचना करते हैंईश्वर किसी भी कर्म या फल का निर्माण नहीं करते।
प्रभुःपरमेश्वरवह परमात्मा जो साक्षी भाव में स्थित हैं।
कर्मफलसंयोगम्कर्म और फल का संबंधकर्म के साथ उसके परिणाम का जुड़ना।
स्वभावःप्रकृति/स्वभावत्रिगुणात्मक प्रकृति (सत्व, रज, तम) का प्रभाव।
प्रवर्ततेप्रवृत्त होता हैस्वयं ही क्रियाशील हो जाता है।

गूढ़ भावार्थ: यहाँ 'स्वभाव' का अर्थ है—पूर्व जन्मों के संस्कारों और वर्तमान प्रकृति के गुणों का मिश्रण। जब हम कहते हैं कि "स्वभाव प्रवर्तते", तो इसका अर्थ है कि हमारी वृत्तियाँ ही हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं। ईश्वर इसमें हस्तक्षेप नहीं करते क्योंकि वे हमें 'स्वतंत्र इच्छा' (Free Will) प्रदान करते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 'कर्मयोग' अध्याय का हृदय है। कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह समझाया कि युद्ध करना या न करना, यह केवल बाह्य क्रिया है। वास्तविक बंधन 'कर्तापन' के भाव में है। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि भगवान राम ने भी अपने जीवन में अनेक कष्ट सहे, परंतु उन्होंने कभी भी प्रकृति के नियमों (स्वभाव) को दोष नहीं दिया। उन्होंने सदैव 'साक्षी' भाव से अपने धर्म का पालन किया।

वेदों में 'ऋत' (Cosmic Order) की अवधारणा है। यह श्लोक उसी 'ऋत' का विस्तार है। जिस प्रकार ऋतुएं अपने आप बदलती हैं, उसी प्रकार जीव के कर्म उसके संस्कारों के अनुसार फल देते हैं। महाभारत के युद्ध में दुर्योधन का विनाश उसके अपने 'स्वभाव' (तमोगुण) के कारण हुआ, न कि भगवान कृष्ण के कारण। कृष्ण ने तो केवल निमित्त मात्र बनकर अर्जुन को उसके स्वधर्म के प्रति जागृत किया। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी हैं। यदि हम सात्विक स्वभाव विकसित करते हैं, तो हमारे कर्म स्वतः ही कल्याणकारी हो जाते हैं। यह ज्ञान उपनिषदों के उस सार को समाहित करता है जहाँ कहा गया है—"अहं ब्रह्मास्मि", अर्थात जब जीव यह जान लेता है कि वह स्वयं ब्रह्म का अंश है, तो वह कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक साधक को 'अकर्ता' (Non-doer) के बोध तक ले जाने का एक मार्ग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का शमन: नियमित पाठ से 'मैं' का भाव कम होता है, जिससे मानसिक तनाव में कमी आती है।
  • कर्म के प्रति अनासक्ति: व्यक्ति फल की चिंता किए बिना अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म करने में सक्षम होता है।
  • दोषारोपण से मुक्ति: दूसरों या भाग्य को दोष देने की आदत छूट जाती है, जिससे आत्म-निर्भरता बढ़ती है।
  • मानसिक स्पष्टता: यह श्लोक मन के द्वंद्वों को शांत कर निर्णय लेने की क्षमता को तीव्र करता है।
  • दिव्य कृपा का अनुभव: जब हम कर्तापन ईश्वर को सौंप देते हैं, तो जीवन में दैवीय मार्गदर्शन का अनुभव होने लगता है।
  • कर्मिक शुद्धि: अज्ञानवश किए गए गलत कर्मों के प्रति पश्चाताप और सुधार की भावना जागृत होती है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): निरंतर चिंतन से मन में सात्विक विचारों का संचार होता है, जिससे व्यक्तित्व में ओज आता है।
  • मोक्ष का मार्ग: यह ज्ञान जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति का प्रथम सोपान है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय (कर्मसंन्यासयोग) के श्लोक 14 पर आधारित है। हमने आदि शंकराचार्य के गीता भाष्य और स्वामी विवेकानंद के कर्मयोग दर्शन को आधार मानकर इस सामग्री को तैयार किया है। यह सामग्री पूर्णतः शास्त्रीय सिद्धांतों के अनुरूप है और इसका उद्देश्य पाठकों को भारतीय दर्शन के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराना है। (संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता, गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण)।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, ईश्वर तटस्थ हैं। हमारे सुख और दुख हमारे अपने कर्मों और स्वभाव का परिणाम हैं। ईश्वर केवल साक्षी हैं।

स्वभाव का अर्थ है हमारे पूर्व जन्मों के संस्कार और वर्तमान में हमारे द्वारा अपनाए गए गुण (सत्व, रज, तम)। यही हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित करके (ईश्वरार्पण बुद्धि) और यह समझकर कि शरीर और इंद्रियां प्रकृति के अधीन हैं, हम कर्तापन छोड़ सकते हैं।

बिल्कुल नहीं। यह श्लोक कर्म करने से नहीं, बल्कि कर्म के 'फल' की आसक्ति और 'कर्ता' होने के अहंकार से बचने का संदेश देता है।

अपने हर कार्य को एक कर्तव्य (Duty) के रूप में करें, न कि एक बोझ के रूप में। परिणाम जो भी हो, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर स्वीकार करें।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

परमात्मा किसी के लिए कर्तापन, कर्म या कर्मफल का सृजन नहीं करते। वास्तव में यह सब प्रकृति (स्वभाव) के गुणों द्वारा होता है। जीव अहंकारवश स्वयं को कर्ता मान लेता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/29 48% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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