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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 14

अध्याय 5 · श्लोक 14

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः । न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १४॥

na kartṛtvaṃ na karmāṇi lokasya sṛjati prabhuḥ | na karma-phala-saṃyogaṃ svabhāvas tu pravartate ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; कर्तृत्वम्: कर्तापन; न: नहीं; कर्माणि: कर्म; लोकस्य: लोक (जीवों) के; सृजति: रचता है; प्रभुः: ईश्वर; न: नहीं; कर्मफलसंयोगम्: कर्मों के फलों का सम्बन्ध; स्वभावः: प्रकृति (स्वभाव); तु: परन्तु; प्रवर्तते: प्रवृत्त होती है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

प्रभु (परमात्मा) न तो लोक (जीवों) के लिए कर्तृत्व रचते हैं, न कर्म, और न कर्मों के फलों का संयोग। परन्तु स्वभाव (प्रकृति) (इन सबमें) प्रवृत्त होती है।

English Translation

The Lord (the Supreme Being) neither creates the sense of agency nor actions for the people, nor the union with the fruits of actions. Rather, it is nature (prakriti) that acts.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ईश्वर जीवों के कर्मों में हस्तक्षेप नहीं करता। कर्तापन का अभिमान, कर्म और उनके फल – यह सब प्रकृति के गुणों के कारण होता है। जीव अज्ञानवश स्वयं को कर्ता मान लेता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।