कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 15

श्लोक १५ में बताया गया है कि ईश्वर किसी के पाप-पुण्य को नहीं लेते, अज्ञान के कारण जीव मोहित होते हैं।

संस्कृत श्लोक

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५॥

nādatte kasyacit pāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ | ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ ||15||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; आदत्ते: ग्रहण करता है; कस्यचित्: किसी का; पापम्: पाप; न: नहीं; च: और; एव: ही; सुकृतम्: पुण्य; विभुः: सर्वव्यापी (ईश्वर); अज्ञानेन: अज्ञान से; आवृतम्: ढका हुआ; ज्ञानम्: ज्ञान; तेन: उससे; मुह्यन्ति: मोहित होते हैं; जन्तवः: प्राणी।

हिंदी अनुवाद

सर्वव्यापी प्रभु किसी के पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करते। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण सब प्राणी मोहित हो रहे हैं।

English Translation

The all-pervading Lord does not take note of anyone's sin or merit. Knowledge is enveloped by ignorance; thereby beings are deluded.

टीका / Commentary

ईश्वर किसी के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा नहीं रखते – वह तो निर्लिप्त है। जीव अज्ञान के कारण मोहित होता है और कर्तृत्व का भ्रम पाल लेता है, जिससे पाप-पुण्य का बन्धन होता है।