आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 15

अध्याय 5 · श्लोक 15

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५॥

nādatte kasyacit pāpaṃ na caiva sukṛtaṃ vibhuḥ | ajñānenāvṛtaṃ jñānaṃ tena muhyanti jantavaḥ ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; आदत्ते: ग्रहण करता है; कस्यचित्: किसी का; पापम्: पाप; न: नहीं; च: और; एव: ही; सुकृतम्: पुण्य; विभुः: सर्वव्यापी (ईश्वर); अज्ञानेन: अज्ञान से; आवृतम्: ढका हुआ; ज्ञानम्: ज्ञान; तेन: उससे; मुह्यन्ति: मोहित होते हैं; जन्तवः: प्राणी।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सर्वव्यापी प्रभु किसी के पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करते। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण सब प्राणी मोहित हो रहे हैं।

English Translation

The all-pervading Lord does not take note of anyone's sin or merit. Knowledge is enveloped by ignorance; thereby beings are deluded.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ईश्वर किसी के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा नहीं रखते – वह तो निर्लिप्त है। जीव अज्ञान के कारण मोहित होता है और कर्तृत्व का भ्रम पाल लेता है, जिससे पाप-पुण्य का बन्धन होता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।