श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 15

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 22 मिनट का पठन 150 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
न
नहीं
आदत्ते
ग्रहण करता है
कस्यचित्
किसी का
पापम्
पाप
न
नहीं
च
और
एव
ही
सुकृतम्
पुण्य
विभुः
सर्वव्यापी (ईश्वर)
अज्ञानेन
अज्ञान से
आवृतम्
ढका हुआ
ज्ञानम्
ज्ञान
तेन
उससे
मुह्यन्ति
मोहित होते हैं
जन्तवः
प्राणी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सर्वव्यापी प्रभु किसी के पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करते। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण सब प्राणी मोहित हो रहे हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह पंद्रहवां श्लोक (अध्याय 5, श्लोक 15) वेदांत दर्शन का वह शिखर है, जहाँ जीव को उसके अस्तित्व और ईश्वर के साथ उसके संबंधों का वास्तविक बोध होता है। सामान्यतः मनुष्य यह मानता है कि ईश्वर उसके सुख-दुख का दाता है, या वह हमारे पाप और पुण्यों का हिसाब रखने वाला कोई 'न्यायाधीश' है। परंतु, भगवान श्रीकृष्ण यहाँ एक क्रांतिकारी सत्य उद्घाटित करते हैं—परमात्मा 'विभु' है, सर्वव्यापी है, और वह किसी के भी पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करता।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टि से यह श्लोक 'अद्वैत' की नींव है। जब हम कहते हैं कि ईश्वर निर्लिप्त है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह उदासीन है, अपितु इसका अर्थ यह है कि वह 'साक्षी' है। जीव का अज्ञान (अविद्या) ही उसे यह भ्रम देता है कि वह कर्ता है। जैसे सूर्य के प्रकाश में कोई शुभ कार्य करे या अशुभ, सूर्य न तो उस कार्य का फल भोगता है और न ही उसे ग्रहण करता है, ठीक वैसे ही परमात्मा का स्वरूप भी है। यह श्लोक हमें 'निष्काम कर्मयोग' की ओर ले जाता है। जब साधक यह समझ लेता है कि परमात्मा उसके कर्मों से प्रभावित नहीं होता, तो वह स्वयं को भी कर्मों के फल से मुक्त करने का प्रयास करने लगता है। यह बोध ही मोक्ष का मार्ग है। इस श्लोक का चिंतन मनुष्य को अहंकार के उस बोझ से मुक्त करता है जो उसे 'मैं कर रहा हूँ' की ग्रंथि में जकड़े रखता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य हमें सिखाता है कि हम केवल निमित्त मात्र हैं, और वास्तविक सत्ता उस निर्विकार परमात्मा की है जो समस्त चराचर जगत में व्याप्त होकर भी सबसे परे है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥ १५॥


(उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'नादत्ते' पर बल दें और 'अज्ञानेनावृतं' का उच्चारण स्पष्टता के साथ करें। यह श्लोक आत्म-साक्षात्कार के लिए अत्यंत प्रभावशाली है।)

इस श्लोक का पाठ करने की विधि अत्यंत सरल है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात, शांत चित्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। गीता के इस श्लोक का 108 बार मानसिक जप करने से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं और अहंकार का शमन होता है। यह श्लोक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए है। जब भी मन में 'मैंने यह किया' का भाव आए, तब इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए ताकि जीव पुनः अपनी वास्तविक स्थिति में लौट सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
नादत्तेनहीं ग्रहण करतापरमात्मा कर्मों के फल को अपने में नहीं जोड़ते।
कस्यचित्किसी के भीयह नियम सभी जीवों के लिए समान है।
पापंपापअधर्म या निषिद्ध कर्मों का फल।
सुकृतंपुण्यधर्म सम्मत या शुभ कर्मों का फल।
विभुःसर्वव्यापी परमात्माजो सर्वत्र व्याप्त है, वह निर्विकार है।
अज्ञानेनअज्ञान सेअविद्या या माया का आवरण।
आवृतंढका हुआज्ञान का प्रकाश माया के कारण छिपा है।
ज्ञानंवास्तविक बोधआत्मा का स्वरूप जो शुद्ध और मुक्त है।
मुह्यन्तिमोहित होते हैंभ्रमित होकर दुखी होते हैं।
जन्तवःप्राणीसंसार में जन्म लेने वाले जीव।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में डूबे थे और यह सोच रहे थे कि युद्ध में होने वाले पापों का भागी कौन होगा, तब भगवान ने उन्हें 'सांख्य योग' और 'कर्मयोग' का समन्वय समझाया।

पौराणिक संदर्भों में, वेदों में भी 'साक्षी भाव' की चर्चा की गई है। उपनिषदों में 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' (दो पक्षी एक ही वृक्ष पर बैठे हैं) की कथा आती है, जिसमें एक पक्षी फल खाता है और दूसरा केवल देखता है। यहाँ 'देखने वाला' परमात्मा है और 'फल खाने वाला' जीव है। महाभारत के युद्ध के दौरान, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को मारने के पाप से डरकर गांडीव छोड़ दिया था, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह ज्ञान दिया कि 'कर्तापन' का भाव ही बंधन है। यदि तुम यह समझ लो कि तुम केवल एक निमित्त हो और ईश्वर ही सब कुछ करा रहा है, तो तुम पाप-पुण्य के चक्र से मुक्त हो जाओगे।

यह श्लोक हमें यह भी याद दिलाता है कि ईश्वर का स्वरूप 'निर्गुण' और 'निराकार' है। वह न तो किसी को दंड देता है और न ही किसी को पुरस्कार; जीव अपने कर्मों के फल को स्वयं ही भोगता है। यह सिद्धांत 'कर्म के नियम' (Law of Karma) को स्पष्ट करता है। अज्ञान के कारण जीव स्वयं को शरीर मान बैठता है और इसी कारण वह सुख-दुख के द्वंद्व में फँस जाता है। यह श्लोक उस अज्ञान को नष्ट करने के लिए एक दिव्य औषधि के समान है, जो सदियों से ऋषियों और मुनियों द्वारा अनुभूत किया गया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का नाश: नियमित जप से 'मैं' का भाव कम होता है और विनम्रता का उदय होता है।
  • मानसिक शांति: यह बोध कि ईश्वर सब देख रहा है, मन की व्यग्रता को कम करता है।
  • कर्मों के प्रति सजगता: साधक यह समझ जाता है कि उसे अपने कर्मों के लिए स्वयं उत्तरदायी होना है।
  • भय से मुक्ति: ईश्वर के प्रति 'न्यायाधीश' का डर समाप्त होकर 'साक्षी' का विश्वास जागृत होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इस श्लोक का चिंतन करने से मन में सात्विक विचारों का प्रवाह बढ़ता है।
  • कर्म बंधन से मुक्ति: निष्काम भाव से कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
  • आत्म-साक्षात्कार: जीव को अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) का आभास होने लगता है।
  • तनाव प्रबंधन: जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी समभाव (Equanimity) बनाए रखने की शक्ति मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' (अध्याय 5, श्लोक 15) के मूल संस्कृत पाठ पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसका उद्देश्य पाठकों को वेदान्त के गूढ़ सिद्धांतों से सरल भाषा में परिचित कराना है। हमारे शोध में आदि शंकराचार्य के गीता भाष्य और स्वामी विवेकानंद के कर्मयोग के दर्शन को आधार माना गया है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु आत्म-चिंतन और शास्त्र-सम्मत ज्ञान को प्रोत्साहित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

ईश्वर पाप माफ करने वाला कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक व्यवस्था है। कर्म का नियम अटल है। आप जो बोएंगे, वही काटेंगे। ईश्वर का 'माफ करना' केवल तब संभव है जब आप अज्ञान से मुक्त होकर आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लें।

हमारा वास्तविक स्वरूप शुद्ध आत्मा है, लेकिन माया (अज्ञान) के कारण हम खुद को शरीर, मन और अहंकार मान लेते हैं। यही 'अज्ञान से ढका ज्ञान' है।

'विभु' का अर्थ है सर्वव्यापी, जो हर कण में मौजूद है। वह किसी एक स्थान पर सीमित नहीं है, इसलिए वह किसी एक के कर्म से प्रभावित नहीं होता।

बिल्कुल नहीं। गीता कर्म छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि 'कर्मफल' की आसक्ति छोड़ने के लिए कहती है। कर्म करना धर्म है, फल की चिंता करना अज्ञान है।

जब भी आप किसी कार्य में असफल हों या अत्यधिक सफल, तो इस श्लोक को याद करें। यह आपको अहंकार और निराशा दोनों से बचाकर संतुलन प्रदान करेगा।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

सर्वव्यापी परमेश्वर किसी जीव के पाप या पुण्य को अपने ऊपर नहीं लगाते। वे तो साक्षी मात्र हैं। जीवों का ज्ञान अज्ञान से ढका है, जिसके कारण वे मोहित होते हैं और पाप-पुण्य के बन्धन में पड़ते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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