श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 16

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 23 मिनट का पठन 152 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
ज्ञानेन
ज्ञान द्वारा
तु
परन्तु
तत्
उस
अज्ञानम्
अज्ञान को
येषाम्
जिनका
नाशितम्
नष्ट कर दिया गया है
आत्मनः
अपने
तेषाम्
उनका
आदित्यवत्
सूर्य के समान
ज्ञानम्
ज्ञान
प्रकाशयति
प्रकाशित करता है
तत् परम्
उस परम तत्त्व को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जिन पुरुषों का वह अज्ञान आत्म-ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के समान उस परम तत्त्व (ब्रह्म) को प्रकाशित कर देता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय का सोलहवां श्लोक मानव चेतना के विकास का वह शिखर है, जहाँ अज्ञान की सघन रात्रि समाप्त होकर आत्म-ज्ञान का सूर्य उदित होता है। वैदिक परंपरा में 'ज्ञान' केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं है, अपितु यह वह दिव्य चक्षु है जो जीव को उसके वास्तविक स्वरूप—'अहं ब्रह्मास्मि'—से साक्षात्कार कराता है। जब हम सांसारिक मोह, माया और द्वैत के अंधकार में भटकते हैं, तब यह श्लोक एक प्रकाश-स्तंभ की भांति कार्य करता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, भारत की ऋषि-परंपरा ने सदैव 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो) का उद्घोष किया है। यह श्लोक उसी वैदिक ऋचा का व्यावहारिक अनुप्रयोग है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, आत्मा परमात्मा का ही अंश है, किंतु अज्ञान के आवरण के कारण वह स्वयं को शरीर और मन मान बैठती है। जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर संसार की वस्तुएं स्वतः स्पष्ट हो जाती हैं, उसी प्रकार जब साधक के भीतर आत्म-ज्ञान का उदय होता है, तो उसे परमात्मा के दर्शन के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती। वह सर्वत्र, कण-कण में उसी परम तत्व का अनुभव करने लगता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मुक्ति कोई दूरस्थ गंतव्य नहीं है, बल्कि अज्ञान का नाश होते ही प्राप्त होने वाली एक सहज अवस्था है। इस श्लोक का चिंतन साधक को मानसिक विकारों से मुक्त कर उसे ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार करने की सामर्थ्य प्रदान करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥ १६॥

उच्चारण विधि एवं विनियोग: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए। मेरुदंड सीधा रखें और श्वासों की गति को नियंत्रित करें। 'ज्ञानेन' शब्द पर बल देते हुए यह अनुभव करें कि आपके भीतर का अज्ञान धीरे-धीरे विलीन हो रहा है। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय या संध्याकाल में कम से कम 11 बार जपने से बुद्धि की शुद्धि होती है। यह श्लोक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि आत्मसात करने के लिए है। इसका पाठ करते समय मन में यह भाव रखें कि आप स्वयं उस सूर्य के समान हैं जो अपनी ही किरणों से अपने भीतर के अंधकार को मिटा रहा है। यह विधि साधक को एकाग्रता और मानसिक स्पष्टता प्रदान करती है, जिससे जीवन के जटिल निर्णय लेने में सरलता होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ज्ञानेनज्ञान के द्वाराविवेक और आत्म-साक्षात्कार की शक्ति।
तुनिश्चय हीयह शब्द सत्य की दृढ़ता को प्रकट करता है।
तदज्ञानम्वह अज्ञानअविद्या, जो आत्मा को शरीर मानती है।
येषांजिनकाउन भाग्यशाली साधकों का।
नाशितम्नष्ट कर दिया गयाअज्ञान का पूर्ण उन्मूलन।
आत्मनःस्वयं केआत्मा के भीतर स्थित अज्ञान।
तेषाम्उनकाज्ञानियों का।
आदित्यवत्सूर्य के समानप्रकाशवान और तेजस्वी।
प्रकाशयतिप्रकाशित करता हैपरमात्मा के स्वरूप को प्रकट करता है।
तत्परम्उस परम तत्व कोपरमेश्वर या ब्रह्म का साक्षात्कार।

इस श्लोक का गूढ़ अर्थ यह है कि ज्ञान कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे अर्जित करना है, बल्कि यह आत्मा का स्वभाव है। अज्ञान के हटते ही ज्ञान स्वतः प्रकट हो जाता है, जैसे बादलों के हटते ही सूर्य का प्रकाश स्वतः दिखने लगता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 'कर्मसंन्यासयोग' (अध्याय 5) का हिस्सा है। कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें ज्ञान और कर्म के समन्वय का उपदेश देते हैं। यह श्लोक उस संवाद की पराकाष्ठा है जहाँ भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि कर्म और ज्ञान परस्पर विरोधी नहीं हैं।

पौराणिक संदर्भों में, ज्ञान को 'अग्नि' कहा गया है। जिस प्रकार अग्नि सब कुछ भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान का उदय समस्त पापों और अज्ञानता को जला देता है। उपनिषदों में भी 'आदित्य' (सूर्य) को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। कठोपनिषद में नचिकेता को यमराज ने इसी आत्म-ज्ञान का उपदेश दिया था। महाभारत के युद्ध में, जब अर्जुन ने भगवान के विश्वरूप का दर्शन किया, तब उन्हें इसी ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। यह श्लोक हमें यह स्मरण दिलाता है कि हम सभी के भीतर एक 'अर्जुन' है जो मोह में फंसा है, और एक 'कृष्ण' है जो ज्ञान के रूप में हमारे हृदय में स्थित है। जब हम अपने भीतर के कृष्ण (विवेक) को जागृत करते हैं, तो अज्ञान का नाश निश्चित है। यह श्लोक केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक औषधि है जो युगों-युगों से साधकों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा रही है। इसका संदर्भ हमें यह सिखाता है कि जीवन की सबसे बड़ी विजय बाहरी शत्रुओं पर नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान पर विजय पाना है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: नियमित पाठ से मन की उलझनें दूर होती हैं और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • अहंकार का नाश: यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि वह शरीर नहीं, आत्मा है, जिससे अहंकार स्वतः कम हो जाता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: सूर्य के समान तेज का अनुभव होने से व्यक्तित्व में आकर्षण और सकारात्मकता आती है।
  • कर्म शुद्धि: अज्ञान के नाश से साधक निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है, जिससे कर्म बंधन शिथिल होते हैं।
  • भय से मुक्ति: मृत्यु और अनिश्चितता का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक को अपनी अमरता का आभास होता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान के दौरान इस श्लोक का जप मन को स्थिर करने में सहायक होता है।
  • परमात्मा से जुड़ाव: यह श्लोक भक्ति और ज्ञान का सेतु है, जो साधक को ईश्वर के निकट ले जाता है।
  • आत्म-विश्वास: स्वयं के दिव्य स्वरूप को जानने से आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्य (जैसे शंकराचार्य भाष्य और स्वामी रामसुखदास जी की 'साधक-संजीवनी') के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शुद्ध और शास्त्र-सम्मत ज्ञान प्रदान करना है। इस श्लोक का अर्थ और व्याख्या पारंपरिक वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप है, जो आत्म-कल्याण के मार्ग को प्रशस्त करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, यह श्लोक सार्वभौमिक है। इसे कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पंथ या आयु का हो, अपने जीवन में ज्ञान और प्रकाश के लिए पढ़ सकता है।

अज्ञान का नाश होने का अर्थ है—स्वयं को शरीर, मन और बुद्धि से अलग एक शुद्ध आत्मा के रूप में अनुभव करना। यह मोह और आसक्ति से मुक्ति की अवस्था है।

निश्चित रूप से। जब हम यह समझते हैं कि सब कुछ परमात्मा की इच्छा से हो रहा है और हम केवल एक निमित्त हैं, तो तनाव स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

इसे अपने दैनिक जीवन में 'विवेक' के रूप में उतारें। हर कार्य करने से पहले यह सोचें कि क्या यह कार्य मेरे आत्म-स्वरूप के अनुकूल है।

नहीं, इसके लिए किसी बाह्य अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। केवल श्रद्धा और निरंतर चिंतन ही इसकी सबसे बड़ी पूजा है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिन लोगों ने आत्म-ज्ञान के द्वारा अज्ञान को नष्ट कर दिया है, उनके लिए वह ज्ञान स्वयं ही सूर्य के समान परमात्मा को प्रकाशित कर देता है। उनके लिए कोई अंधकार नहीं रहता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/29 55% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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