श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 17

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 24 मिनट का पठन 151 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
तद्बुद्धयः
जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है
तदात्मानः
जिनका चित्त उसमें लगा है
तन्निष्ठाः
जिनकी निष्ठा उसमें है
तत्परायणाः
जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं
गच्छन्ति
जाते हैं
अपुनरावृत्तिम्
पुनर्जन्म रहित स्थान
ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः
ज्ञान से पापों से रहित हुए।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है, जिनका चित्त उसी में है, जिनकी निष्ठा उसी में है और जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान द्वारा सब पापों से रहित होकर पुनर्जन्म रहित पद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः - आध्यात्मिक विवेचना

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह सत्रहवां श्लोक केवल शब्दों का समूह नहीं, अपितु मोक्ष का एक संपूर्ण मार्गदर्शक मानचित्र है। जब हम 'तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः' का चिंतन करते हैं, तो हम उस अवस्था की ओर अग्रसर होते हैं जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद मिटने लगता है। वैदिक संस्कृति में, मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य 'अपुनरावृत्ति' यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाना है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि परमात्मा में पूर्ण समर्पण ही वह एकमात्र कुंजी है जो हमारे संचित कर्मों के भारी बोझ को ज्ञान की अग्नि में भस्म कर सकती है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक 'ज्ञान-योग' और 'भक्ति-योग' का अद्भुत संगम है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि जब बुद्धि, आत्मा, निष्ठा और परायणता—ये चारों तत्व एक ही बिंदु (परमात्मा) पर केंद्रित हो जाते हैं, तो साधक के भीतर का अंधकार स्वतः ही तिरोहित हो जाता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि आत्मा का स्वभाव शुद्ध है, किंतु माया के आवरणों के कारण वह स्वयं को बद्ध मानती है। इस श्लोक का निरंतर मनन करने से साधक के सूक्ष्म शरीर में एक दिव्य स्पंदन उत्पन्न होता है, जो उसे भौतिक जगत की आसक्तियों से ऊपर उठाकर उस शाश्वत आनंद की ओर ले जाता है जहाँ से पुनः इस संसार में लौटने की आवश्यकता नहीं रहती। यह श्लोक साधक को 'स्थितप्रज्ञ' बनने की प्रेरणा देता है, जो सुख-दुःख, मान-अपमान से परे होकर केवल परमात्मा के स्वरूप में रमण करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥


पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें, दीप प्रज्वलित करें और मन को शांत करके इस श्लोक का 11 बार उच्चारण करें। उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है, ताकि बुद्धि उस दिव्य तत्व में स्थित हो सके।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तद्बुद्धयःजिनकी बुद्धि उस परमात्मा में हैबुद्धि का परमात्मा में लीन होना ही विवेक की पराकाष्ठा है।
तदात्मानःजिनका आत्मा उस परमात्मा में स्थित हैस्वयं को देह से अलग मानकर परमात्मा का अंश अनुभव करना।
तन्निष्ठाःजो उस परमात्मा में ही निष्ठावान हैंअटूट विश्वास और श्रद्धा का भाव, जो कभी विचलित न हो।
तत्परायणाःजो परमात्मा को ही अपना परम आश्रय मानते हैंसंसार के सभी आश्रयों को त्यागकर केवल ईश्वर पर निर्भरता।
गच्छन्तिवे जाते हैंआत्मा की उस दिव्य लोक की ओर यात्रा।
अपुनरावृत्तिम्जहाँ से पुनः लौटना नहीं होताजन्म-मरण के चक्र से मुक्ति (मोक्ष)।
ज्ञाननिर्धूतज्ञान के द्वारा धुल गए हैंआत्म-साक्षात्कार की अग्नि में अज्ञान का नाश।
कल्मषाःपाप या अशुद्धियाँसंचित कर्मों के संस्कार जो आत्मा को बांधे रखते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए और उन्होंने गांडीव त्यागने का निर्णय लिया, तब भगवान ने उन्हें 'ज्ञान-योग' का मार्ग दिखाया। यह श्लोक अध्याय 5 के उस भाग में आता है जहाँ भगवान 'कर्म-संन्यास' और 'ज्ञान-योग' की तुलना करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि वास्तविक संन्यास बाहरी त्याग नहीं, बल्कि आंतरिक आसक्ति का त्याग है।

पौराणिक संदर्भों में, इस श्लोक का महत्व उपनिषदों की उस ऋचा से मिलता है जहाँ कहा गया है—"तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः।" यानी, उस परमात्मा को जानकर ही बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी प्रज्ञा स्थिर करनी चाहिए। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के माध्यम से यह संदेश दिया है कि मनुष्य चाहे किसी भी वर्ण या आश्रम में हो, यदि उसकी बुद्धि और निष्ठा परमात्मा में है, तो वह उसी क्षण मुक्त है। यह श्लोक हमें प्रह्लाद, ध्रुव और मीराबाई जैसे भक्तों की याद दिलाता है, जिन्होंने 'तत्परायणाः' की स्थिति को प्राप्त कर संसार के बंधनों को काट दिया था। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि उन सभी ऋषियों का निचोड़ है जिन्होंने तपस्या के माध्यम से सत्य को जाना। इसका ऐतिहासिक महत्व यह है कि यह मनुष्य को उसके 'स्व' से जोड़ता है, जो कि वेदों का मूल प्रतिपाद्य है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: इस श्लोक का निरंतर जप मन की चंचलता को कम करता है और एकाग्रता बढ़ाता है।
  • कर्म शुद्धि: 'ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः' के प्रभाव से साधक के पुराने नकारात्मक संस्कार धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं।
  • भय से मुक्ति: जब बुद्धि परमात्मा में स्थित हो जाती है, तो मृत्यु और भविष्य का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): नियमित पाठ से साधक के चारों ओर एक दिव्य और शांत ऊर्जा का मंडल विकसित होता है।
  • निर्णय लेने की क्षमता: बुद्धि के शुद्ध होने से व्यक्ति सही और गलत के बीच का भेद स्पष्ट देख पाता है।
  • अहंकार का नाश: 'तदात्मानः' का भाव साधक के अहंकार को गलाकर उसे विनम्र बनाता है।
  • ईश्वरीय कृपा: 'तत्परायणाः' होने से साधक को ईश्वर का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन अनुभव होने लगता है।
  • मोक्ष का मार्ग: यह श्लोक साधक को जीवन के अंतिम लक्ष्य 'अपुनरावृत्ति' के प्रति सचेत रखता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों, जैसे कि शंकराचार्य कृत 'गीता भाष्य' और स्वामी रामसुखदास जी की 'साधक संजीवनी' के आधार पर तैयार की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। यह व्याख्या किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, अपितु आत्म-साक्षात्कार के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मार्ग को रेखांकित करती है। सभी संदर्भ शास्त्रों की मूल भावना के अनुरूप हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, यह श्लोक गृहस्थों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 'तद्बुद्धयः' का अर्थ है अपने कर्तव्यों को करते हुए बुद्धि को परमात्मा में रखना। आप संसार में रहकर भी मानसिक रूप से ईश्वर में स्थित हो सकते हैं।

इसका अर्थ है कि ज्ञान की अग्नि से पापों का धुल जाना। यहाँ 'पाप' का अर्थ उन संस्कारों से है जो हमें बार-बार जन्म लेने के लिए विवश करते हैं। आत्म-ज्ञान ही वह एकमात्र साबुन है जो इन संस्कारों को धो सकता है।

अपुनरावृत्ति का अर्थ है 'पुनः न लौटना'। जब आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, तो वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाती है। इसे ही मोक्ष या परम गति कहा गया है।

जप से मन को शक्ति मिलती है, लेकिन दुख दूर करने के लिए 'निष्ठा' और 'परायणता' का अभ्यास भी आवश्यक है। जब आप ईश्वर को ही अपना एकमात्र आश्रय मान लेते हैं, तो सांसारिक दुख आपको प्रभावित करना बंद कर देते हैं।

अपने दिन की शुरुआत में संकल्प लें कि आज जो भी कार्य करेंगे, वह परमात्मा की सेवा के रूप में करेंगे। हर कार्य के फल को ईश्वर को समर्पित करना ही 'तत्परायणाः' होने का प्रथम चरण है।

© Bhaktilok.in - आध्यात्मिक ज्ञान का पावन स्रोत

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिनकी बुद्धि, मन, निष्ठा और परम लक्ष्य केवल परमात्मा में हैं, वे ज्ञान से सभी पापों से मुक्त होकर उस परम धाम को प्राप्त होते हैं, जहाँ से लौटना नहीं होता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/29 59% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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