कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 17

श्लोक १७ में बताया गया है कि जो पूर्णतः परमात्मा में लीन हैं, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

संस्कृत श्लोक

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥

tad-buddhayas tad-ātmānas tan-niṣṭhās tat-parāyaṇāḥ | gacchanty apunar-āvṛttiṃ jñāna-nirdhūta-kalmaṣāḥ ||17||

पदच्छेद / शब्दार्थ

तद्बुद्धयः: जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है; तदात्मानः: जिनका चित्त उसमें लगा है; तन्निष्ठाः: जिनकी निष्ठा उसमें है; तत्परायणाः: जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं; गच्छन्ति: जाते हैं; अपुनरावृत्तिम्: पुनर्जन्म रहित स्थान; ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः: ज्ञान से पापों से रहित हुए।

हिंदी अनुवाद

जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है, जिनका चित्त उसी में है, जिनकी निष्ठा उसी में है और जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान द्वारा सब पापों से रहित होकर पुनर्जन्म रहित पद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।

English Translation

Those whose intellect is fixed in That (Brahman), whose self is identified with That, whose conviction is in That, and who have That as their supreme goal – they reach the state of no-return (liberation), their sins dispelled by knowledge.

टीका / Commentary

इस श्लोक में भक्ति और समर्पण के मार्ग का वर्णन है। जो पूरी तरह से परमात्मा में स्थित हो जाते हैं, उनके सभी पाप (संस्कार) ज्ञान से धुल जाते हैं और वे मुक्त हो जाते हैं।