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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 17

अध्याय 5 · श्लोक 17

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ १७॥

tad-buddhayas tad-ātmānas tan-niṣṭhās tat-parāyaṇāḥ | gacchanty apunar-āvṛttiṃ jñāna-nirdhūta-kalmaṣāḥ ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तद्बुद्धयः: जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है; तदात्मानः: जिनका चित्त उसमें लगा है; तन्निष्ठाः: जिनकी निष्ठा उसमें है; तत्परायणाः: जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं; गच्छन्ति: जाते हैं; अपुनरावृत्तिम्: पुनर्जन्म रहित स्थान; ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः: ज्ञान से पापों से रहित हुए।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में लगी है, जिनका चित्त उसी में है, जिनकी निष्ठा उसी में है और जो उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, वे ज्ञान द्वारा सब पापों से रहित होकर पुनर्जन्म रहित पद (मोक्ष) को प्राप्त होते हैं।

English Translation

Those whose intellect is fixed in That (Brahman), whose self is identified with That, whose conviction is in That, and who have That as their supreme goal – they reach the state of no-return (liberation), their sins dispelled by knowledge.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस श्लोक में भक्ति और समर्पण के मार्ग का वर्णन है। जो पूरी तरह से परमात्मा में स्थित हो जाते हैं, उनके सभी पाप (संस्कार) ज्ञान से धुल जाते हैं और वे मुक्त हो जाते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।