कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 18

श्लोक १८ में ज्ञानी की समदर्शिता का वर्णन है – वह सभी प्राणियों में एक ही ब्रह्म देखता है।

संस्कृत श्लोक

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥

vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini | śuni caiva śva-pāke ca paṇḍitāḥ sama-darśinaḥ ||18||

पदच्छेद / शब्दार्थ

विद्याविनयसम्पन्ने: विद्या और विनय से सम्पन्न; ब्राह्मणे: ब्राह्मण में; गवि: गाय में; हस्तिनि: हाथी में; शुनि: कुत्ते में; च: और; एव: भी; श्वपाके: चाण्डाल (नीच जाति वाले) में; च: और; पण्डिताः: ज्ञानी; समदर्शिनः: समदर्शी होते हैं।

हिंदी अनुवाद

विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी ज्ञानीजन समान दर्शन करते हैं (अर्थात् सबमें एक ही परमात्मा देखते हैं)।

English Translation

The wise see the same (Brahman) in a learned and humble Brahmin, in a cow, in an elephant, and even in a dog and an outcaste.

टीका / Commentary

यह गीता का प्रसिद्ध श्लोक है जो समदर्शिता का वर्णन करता है। ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही चेतन तत्त्व (ब्रह्म) को देखता है, चाहे वह किसी भी योनि में हो।