श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 18

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 23 मिनट का पठन 184 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
विद्याविनयसम्पन्ने
विद्या और विनय से सम्पन्न
ब्राह्मणे
ब्राह्मण में
गवि
गाय में
हस्तिनि
हाथी में
शुनि
कुत्ते में
च
और
एव
भी
श्वपाके
चाण्डाल (नीच जाति वाले) में
च
और
पण्डिताः
ज्ञानी
समदर्शिनः
समदर्शी होते हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी ज्ञानीजन समान दर्शन करते हैं (अर्थात् सबमें एक ही परमात्मा देखते हैं)।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

विद्याविनयसम्पन्ने - समदर्शिता का दिव्य दर्शन | Bhaktilok.in

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह अठारहवां श्लोक भारतीय दर्शन की उस सर्वोच्च पराकाष्ठा को प्रदर्शित करता है, जिसे 'समत्व योग' कहा गया है। जब हम इस संसार को देखते हैं, तो हमारी दृष्टि अक्सर भेदों में उलझ जाती है—उच्च-नीच, पशु-मानव, विद्वान-अज्ञानी। परंतु, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस दृष्टि का बोध करा रहे हैं जो इन भौतिक आवरणों के पार जाकर उस शाश्वत 'ब्रह्म' को देखती है, जो कण-कण में व्याप्त है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक भारतीय सनातन संस्कृति की उस समावेशी विचारधारा का आधार है, जहाँ 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्ष अनुभव है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जिस प्रकार एक ही सूर्य का प्रतिबिंब अलग-अलग पात्रों में रखे जल में भिन्न दिख सकता है, किंतु सूर्य एक ही है, उसी प्रकार आत्मा का स्वरूप सभी प्राणियों में एक समान है। इस श्लोक का चिंतन मनुष्य को अहंकार के उस संकीर्ण दायरे से बाहर निकालता है, जहाँ वह स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ या भिन्न मानता है। यह समदर्शिता ही मोक्ष का मार्ग है, क्योंकि जब द्वेष और भेदभाव का अंत होता है, तभी हृदय में परमात्मा का वास होता है। यह श्लोक न केवल एक दार्शनिक सूत्र है, बल्कि यह एक जीवन-पद्धति है जो हमें मानसिक शांति, सामाजिक समरसता और आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है। इसका निरंतर चिंतन हमारे भीतर की संकीर्णताओं को जलाकर भस्म कर देता है और हमें उस दिव्य प्रकाश से जोड़ता है जो समस्त चराचर जगत का आधार है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के स्पष्ट उच्चारण पर ध्यान दें। 'विद्या-विनय-सम्पन्ने' को लयबद्ध तरीके से पढ़ें। पाठ से पूर्व शांत चित्त होकर भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और मन में यह संकल्प लें कि आप समस्त प्राणियों में उस परमात्मा को देखने का प्रयास करेंगे। इसे कम से कम 11 बार शांत मुद्रा में जपें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
विद्याविनयसम्पन्नेविद्या और विनय से युक्तज्ञान के साथ विनम्रता का होना ही पूर्णता है; अहंकाररहित ज्ञान ही मुक्ति देता है।
ब्राह्मणेब्राह्मण मेंसात्विक गुणों और ब्रह्मज्ञान से संपन्न व्यक्ति में परमात्मा का दर्शन।
गविगाय मेंपशुओं में भी उसी चेतना का वास है जो मनुष्यों में है।
हस्तिनिहाथी मेंशक्ति और विशालता के भीतर भी वही सूक्ष्म आत्मा विद्यमान है।
शुनिकुत्ते मेंनिम्न माने जाने वाले प्राणियों में भी परमात्मा की उपस्थिति का बोध।
श्वपाकेचांडाल (श्वपच) मेंसामाजिक दृष्टि से बहिष्कृत व्यक्ति में भी ईश्वर को देखना—यही समदर्शिता है।
पण्डिताःज्ञानी पुरुषवे जो द्वैत से ऊपर उठकर अद्वैत का अनुभव करते हैं।
समदर्शिनःसमान दृष्टि वालेजो बाहरी आवरण को नहीं, बल्कि भीतर के ब्रह्म को देखते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 'ज्ञान-विज्ञान योग' (अध्याय 5) का हिस्सा है। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो रहे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मा के अमरत्व और समता के योग का उपदेश दिया। यह श्लोक उस उपदेश का सार है। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि भगवान विष्णु ने स्वयं नरसिंह अवतार लेकर यह सिद्ध किया कि वे खंभे में भी हैं और भक्त प्रह्लाद के हृदय में भी। इसी प्रकार, भगवान राम ने शबरी के जूठे बेरों को प्रेमपूर्वक ग्रहण कर यह संदेश दिया कि भक्ति और समदर्शिता का मार्ग जाति या कुल से ऊपर है।

महाभारत के प्रसंगों में भी, युधिष्ठिर की धर्मपरायणता इसी समदर्शिता का परिणाम थी। वे शत्रु और मित्र, दास और राजा के प्रति एक समान भाव रखते थे। यह श्लोक वेदों के उस महावाक्य 'तत्त्वमसि' (वह तुम ही हो) का व्यावहारिक प्रयोग है। जब एक ज्ञानी व्यक्ति यह समझ जाता है कि जो आत्मा उसमें है, वही गाय में, हाथी में और चांडाल में है, तो उसके भीतर से हिंसा, घृणा और अहंकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। यह दर्शन हमें सिखाता है कि सृष्टि का कोई भी जीव तुच्छ नहीं है। यह श्लोक हमें उस 'अद्वैत' की ओर ले जाता है जहाँ 'मैं' और 'तुम' का भेद मिटकर केवल 'परमात्मा' शेष रह जाता है। यह भारतीय ऋषियों की वह महान दृष्टि है जिसने विश्व को सह-अस्तित्व का पाठ पढ़ाया है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का नाश: इस श्लोक का नित्य चिंतन व्यक्ति के भीतर से 'मैं' और 'मेरा' के अहंकार को समाप्त करता है।
  • मानसिक शांति: जब हम दूसरों में दोष देखना बंद कर देते हैं, तो मन स्वतः ही शांत और स्थिर हो जाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): समदर्शी व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है जो दूसरों को भी प्रभावित करती है।
  • कर्म शुद्धि: भेदभाव रहित व्यवहार करने से व्यक्ति के कर्मों में पवित्रता आती है, जिससे संचित पापों का नाश होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: जो भक्त सभी प्राणियों में ईश्वर को देखता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा सदैव बनी रहती है।
  • सामाजिक समरसता: यह श्लोक समाज में व्याप्त ऊंच-नीच की कुरीतियों को मिटाने का सबसे सशक्त आध्यात्मिक अस्त्र है।
  • भय से मुक्ति: जब सबमें एक ही ब्रह्म का दर्शन होता है, तो किसी से भी भय या द्वेष शेष नहीं रहता।
  • आत्म-साक्षात्कार: यह श्लोक साधक को स्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को पहचानने में सहायता करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों, विशेषकर आदि शंकराचार्य के भाष्य और स्वामी विवेकानंद के वेदांत दर्शन के सिद्धांतों पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य पाठकों को श्लोक के गूढ़ अर्थ से परिचित कराना है। हम यह स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक उन्नति के लिए केवल पाठ पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे जीवन में उतारना (आचरण) अनिवार्य है। सभी संदर्भ श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 5, श्लोक 18 से उद्धृत हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

समदर्शिता का अर्थ यह नहीं है कि आप दुष्ट के कुकर्मों को सही ठहराएं। इसका अर्थ है कि आप आत्मा के स्तर पर दोनों को समान मानें, किंतु व्यवहार में धर्म और अधर्म का विवेक रखें।

विद्या (ज्ञान) यदि विनय (नम्रता) के बिना हो, तो वह अहंकार को जन्म देती है। सच्चा ज्ञान वही है जो व्यक्ति को विनम्र बनाए।

हाँ, यह श्लोक स्पष्ट करता है कि ब्रह्म का वास सभी में समान है, अतः जन्म आधारित भेदभाव आध्यात्मिक दृष्टि से मिथ्या है।

दैनिक जीवन में जब भी आप किसी व्यक्ति या जीव को देखें, तो मन में यह स्मरण करें कि 'इसमें भी वही परमात्मा है जो मुझमें है'। यह अभ्यास धीरे-धीरे आपकी दृष्टि बदल देगा।

गीता में 'पण्डित' उसे कहा गया है जो आत्मज्ञानी है, न कि केवल शास्त्रों को रटने वाला। सच्चा पण्डित वही है जो समदर्शी है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण हो, गाय हो, हाथी हो, कुत्ता हो या चाण्डाल – ऐसे सबमें ज्ञानीजन एक ही परमात्मा को देखते हैं। उनकी दृष्टि में कोई भेद नहीं है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/29 62% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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