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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 18

अध्याय 5 · श्लोक 18

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥ १८॥

vidyā-vinaya-sampanne brāhmaṇe gavi hastini | śuni caiva śva-pāke ca paṇḍitāḥ sama-darśinaḥ ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

विद्याविनयसम्पन्ने: विद्या और विनय से सम्पन्न; ब्राह्मणे: ब्राह्मण में; गवि: गाय में; हस्तिनि: हाथी में; शुनि: कुत्ते में; च: और; एव: भी; श्वपाके: चाण्डाल (नीच जाति वाले) में; च: और; पण्डिताः: ज्ञानी; समदर्शिनः: समदर्शी होते हैं।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चाण्डाल में भी ज्ञानीजन समान दर्शन करते हैं (अर्थात् सबमें एक ही परमात्मा देखते हैं)।

English Translation

The wise see the same (Brahman) in a learned and humble Brahmin, in a cow, in an elephant, and even in a dog and an outcaste.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह गीता का प्रसिद्ध श्लोक है जो समदर्शिता का वर्णन करता है। ज्ञानी सभी प्राणियों में एक ही चेतन तत्त्व (ब्रह्म) को देखता है, चाहे वह किसी भी योनि में हो।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।