श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 19

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 24 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
इह
इसी (लोक में)
एव
ही
तैः
उनके द्वारा
जितः
जीत लिया गया
सर्गः
संसार (जन्म-मरण)
येषाम्
जिनका
साम्ये
समता में
स्थितम्
स्थित
मनः
मन
निर्दोषम्
निर्दोष
हि
निश्चय ही
समम्
सम
ब्रह्म
ब्रह्म
तस्मात्
इसलिए
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
ते
वे
स्थिताः
स्थित हैं।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने इसी लोक में संसार (जन्म-मरण) को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व:

श्रीमद्भगवद्गीता का यह उन्नीसवां श्लोक (5.19) केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि मोक्ष का वह राजमार्ग है जिस पर चलकर साधक जीवन की सीमाओं को लांघकर अनंत ब्रह्म में विलीन हो जाता है। सनातन धर्म में 'समत्व' को ही योग कहा गया है—"समत्वं योग उच्यते"। जब हम इस श्लोक की गहराई में उतरते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि संसार में सुख-दुःख, मान-अपमान, और लाभ-हानि के द्वंद्व ही मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र में बांधे रखते हैं। जिस क्षण साधक का मन 'साम्य' (समानता) की स्थिति में प्रतिष्ठित हो जाता है, वह इसी देह में रहते हुए, इसी संसार में रहते हुए जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक भारतीय दर्शन की उस सर्वोच्च अवस्था को दर्शाता है जहाँ द्वैत समाप्त हो जाता है। ब्रह्म निर्दोष है, वह किसी के प्रति पक्षपाती नहीं है। वह सूर्य की भांति है जो सभी पर समान प्रकाश डालता है। जो व्यक्ति अपने भीतर उस ब्रह्म को अनुभव करने लगता है, वह स्वतः ही समदर्शी हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए हिमालय की गुफाओं में जाने की आवश्यकता नहीं है, अपितु अपने मन को विकारों से मुक्त कर उसे 'सम' बनाने की आवश्यकता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि जो व्यक्ति समता में स्थित है, वह साक्षात ब्रह्म में ही स्थित है। यह श्लोक साधक को एक ऐसी मानसिक स्थिति प्रदान करता है जहाँ बाहरी परिस्थितियां उसे विचलित नहीं कर पातीं। यह आत्म-साक्षात्कार का वह सोपान है जो मनुष्य को नर से नारायण बनाने की सामर्थ्य रखता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'इहैव' में 'इह' और 'एव' की संधि पर ध्यान दें। 'सर्गा:' के विसर्ग का उच्चारण हल्का और स्पष्ट होना चाहिए। 'निर्दोषं' शब्द का उच्चारण करते समय मन में उस ब्रह्म की पवित्रता का ध्यान करें जो समस्त दोषों से परे है। प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात, पूर्व दिशा की ओर मुख करके, शांत चित्त से इस श्लोक का 11 बार पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। पाठ के उपरांत कुछ क्षण मौन रहकर अपने मन को 'सम' अवस्था में लाने का प्रयास करें। यह श्लोक केवल वाणी का विषय नहीं, अपितु अभ्यास का विषय है। इसे अपने जीवन के हर निर्णय में उतारने का संकल्प लेना ही इसका वास्तविक पाठ है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इहैवइसी लोक मेंसाधना के लिए परलोक की प्रतीक्षा नहीं, वर्तमान क्षण ही पर्याप्त है।
तैःउनके द्वाराउन साधकों द्वारा जिन्होंने मन को वश में कर लिया है।
जितःजीत लिया गयाजन्म-मृत्यु के चक्र रूपी संसार को परास्त कर दिया।
सर्गःसृष्टि/जन्म-मरणसंसार के आवागमन के चक्र से पूर्ण मुक्ति।
येषाम्जिनकाउन महापुरुषों का जिनका मन स्थिर है।
साम्येसमानता मेंसुख-दुःख, राग-द्वेष से परे की तटस्थ अवस्था।
स्थितं मनःमन स्थित हैमन का चंचलता त्यागकर परमात्मा में लीन होना।
निर्दोषम्दोषरहितब्रह्म में कोई विकार या पक्षपात नहीं है।
समम्समानब्रह्म सर्वत्र एक समान व्याप्त है।
ब्रह्मणिब्रह्म मेंपरमेश्वर के स्वरूप में।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में डूबे थे और उन्हें जीवन की सार्थकता पर संदेह हो रहा था, तब भगवान ने उन्हें 'ज्ञान-कर्म-संन्यास योग' के माध्यम से यह समझाया कि कर्म करना बंधन नहीं है, यदि वह समभाव से किया जाए। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि राजा जनक जैसे राजर्षि इसी 'समत्व' के प्रतीक थे। वे राजकाज भी करते थे और आत्म-ज्ञान में भी स्थित रहते थे।

वेदों में भी 'समत्व' को ब्रह्म का लक्षण माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (यह सब कुछ ब्रह्म ही है)। जब साधक यह देख लेता है कि शत्रु और मित्र, सोना और पत्थर, सुख और दुःख—सबमें वही एक ब्रह्म व्याप्त है, तो वह 'निर्दोष' हो जाता है। महाभारत के युद्ध के दौरान, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह स्पष्ट किया कि विजय या पराजय का विचार मन को अशांत करता है। जो व्यक्ति फल की इच्छा छोड़कर केवल कर्तव्य (धर्म) का पालन करता है, उसका मन स्वतः ही 'साम्य' में स्थित हो जाता है। यह श्लोक हमें उस प्राचीन ऋषियों की परंपरा से जोड़ता है जिन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में करके ब्रह्म का साक्षात्कार किया था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार एक 'सर्ग' (सृष्टि) है, जो निरंतर बदल रहा है। जो इस परिवर्तन के बीच अपरिवर्तनीय ब्रह्म को देख लेता है, वह इस संसार को जीत लेता है। यह ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य है, जिसे अर्जुन ने भगवान के विराट स्वरूप के दर्शन के बाद आत्मसात किया था।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: नियमित पाठ से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • तनाव मुक्ति: जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति विचलित नहीं होता, जिससे मानसिक तनाव समाप्त होता है।
  • समदर्शी दृष्टिकोण: व्यक्ति के भीतर से भेदभाव की भावना समाप्त होती है और वह सभी जीवों में ईश्वर को देखने लगता है।
  • कर्मों का शुद्धिकरण: निष्काम भाव से कर्म करने की प्रेरणा मिलती है, जिससे नए कर्म-बंधनों का निर्माण नहीं होता।
  • अहंकार का नाश: 'मैं' और 'मेरा' का भाव कम होकर 'सब ब्रह्म है' का बोध जागृत होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): साधक के व्यक्तित्व में एक दिव्य शांति और तेज का संचार होता है।
  • भय से मुक्ति: जन्म-मरण के चक्र का भय समाप्त हो जाता है, जिससे साधक निर्भय होकर जीवन जीता है।
  • दैवीय अनुकंपा: समत्व में स्थित होने पर साधक को ईश्वर की कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे शंकराचार्य भाष्य और स्वामी रामसुखदास जी की साधना संजीवनी) के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल और सुबोध भाषा में उपलब्ध कराना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु आत्म-चिंतन और शास्त्र-सम्मत मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल पढ़ने तक सीमित न रखें, बल्कि अपने दैनिक जीवन में 'समत्व' का अभ्यास करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, समदर्शी होने का अर्थ भावनाओं को मारना नहीं, बल्कि भावनाओं के प्रति तटस्थ होना है। सुख में अत्यधिक हर्षित न होना और दुःख में अत्यधिक दुखी न होना ही समत्व है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का मुख्य उद्देश्य ही गृहस्थों को योग सिखाना है। राजा जनक इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।

क्योंकि ब्रह्म में कोई इच्छा, राग या द्वेष नहीं है। वह पूर्ण है और पूर्णता में कोई दोष नहीं हो सकता।

छोटे-छोटे निर्णयों में 'सम' रहने का प्रयास करें। जैसे भोजन करते समय स्वाद के प्रति आसक्ति न रखना या किसी की प्रशंसा/निंदा पर प्रतिक्रिया न देना।

शास्त्रों के अनुसार, समत्व ही मोक्ष है। जब मन ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तो मोक्ष स्वतः ही प्राप्त हो जाता है।

© Bhaktilok.in - सनातन ज्ञान का पावन स्रोत।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिनका मन समभाव में स्थिर हो गया है, उन्होंने इसी जन्म में संसार-रूपी संग्राम को जीत लिया है। चूँकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए ऐसे व्यक्ति ब्रह्म में ही स्थित हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 19 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 19/29 66% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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