कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में कहा गया है कि समदर्शी मन वाला व्यक्ति इसी लोक में जन्म-मरण से परे हो जाता है।

संस्कृत श्लोक

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः । निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥ १९॥

ihaiva tair jitaḥ sargo yeṣāṃ sāmye sthitaṃ manaḥ | nirdoṣaṃ hi samaṃ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

इह: इसी (लोक में); एव: ही; तैः: उनके द्वारा; जितः: जीत लिया गया; सर्गः: संसार (जन्म-मरण); येषाम्: जिनका; साम्ये: समता में; स्थितम्: स्थित; मनः: मन; निर्दोषम्: निर्दोष; हि: निश्चय ही; समम्: सम; ब्रह्म: ब्रह्म; तस्मात्: इसलिए; ब्रह्मणि: ब्रह्म में; ते: वे; स्थिताः: स्थित हैं।

हिंदी अनुवाद

जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने इसी लोक में संसार (जन्म-मरण) को जीत लिया है। ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।

English Translation

Even here (in this world), they have conquered the cycle of birth and death whose mind is established in equanimity. Brahman is flawless and equal; therefore they are established in Brahman.

टीका / Commentary

समदर्शी व्यक्ति इसी जीवन में मुक्त हो जाता है। ब्रह्म स्वयं सम और निर्दोष है, अतः जो समता में स्थित है, वह ब्रह्म में ही स्थित है।