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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 5 · श्लोक 20

अध्याय 5 · श्लोक 20

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

na prahṛṣyet priyaṃ prāpya nodvijet prāpya cāpriyam | sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; प्रहृष्येत्: हर्षित होता है; प्रियम्: प्रिय; प्राप्य: प्राप्त करके; न: नहीं; उद्विजेत्: उद्विग्न होता है; प्राप्य: प्राप्त करके; च: और; अप्रियम्: अप्रिय; स्थिरबुद्धिः: स्थिरबुद्धि; असम्मूढः: मोहरहित; ब्रह्मवित्: ब्रह्मज्ञानी; ब्रह्मणि: ब्रह्म में; स्थितः: स्थित।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, मोहरहित, ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्म में स्थित है।

English Translation

He who neither rejoices on obtaining what is pleasant nor grieves on obtaining what is unpleasant – he is of steady intellect, undeluded, a knower of Brahman, and established in Brahman.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

ब्रह्मज्ञानी की पहचान है कि वह सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय में समान रहता है। उसकी बुद्धि विचलित नहीं होती, क्योंकि वह जानता है कि ये सब इन्द्रियों के विषय हैं और आत्मा से परे हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।