श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 20

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 22 मिनट का पठन 162 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
न
नहीं
प्रहृष्येत्
हर्षित होता है
प्रियम्
प्रिय
प्राप्य
प्राप्त करके
न
नहीं
उद्विजेत्
उद्विग्न होता है
प्राप्य
प्राप्त करके
च
और
अप्रियम्
अप्रिय
स्थिरबुद्धिः
स्थिरबुद्धि
असम्मूढः
मोहरहित
ब्रह्मवित्
ब्रह्मज्ञानी
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
स्थितः
स्थित।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, मोहरहित, ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्म में स्थित है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के दर्शन में 'समत्व' को ही योग कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक—"न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्..."—मानव चेतना के उस उच्चतम शिखर का वर्णन करता है, जहाँ पहुँचकर साधक द्वैत के बंधनों से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से, यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि आत्मा की उस शाश्वत स्थिति का दर्पण है जो जन्म-मरण, सुख-दुःख और लाभ-हानि के चक्र से परे है।

वैदिक संस्कृति में 'ब्रह्मविद्' उसे कहा गया है जिसने स्वयं को जान लिया है। जब हम इस श्लोक का चिंतन करते हैं, तो हम पाते हैं कि संसार की नश्वरता और आत्मा की अमरता के बीच का सेतु 'स्थिर बुद्धि' ही है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि प्रिय की प्राप्ति पर हर्षित होना और अप्रिय की प्राप्ति पर व्याकुल होना—ये दोनों ही स्थितियाँ इन्द्रियजन्य हैं। जो व्यक्ति इन इन्द्रिय-विषयों के पार जाकर ब्रह्म में स्थित हो जाता है, वही वास्तव में 'असंमूढ़' (भ्रमरहित) है। यह श्लोक न केवल मानसिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि यह आत्म-साक्षात्कार की वह कुंजी है जो साधक को संसार के कोलाहल में भी 'मौन' का अनुभव कराती है। इसका सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह हमें 'स्थितप्रज्ञ' बनने की प्रेरणा देता है, जो भारतीय दर्शन का सबसे परिष्कृत आदर्श है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन की परिस्थितियों को बदलने की शक्ति हमारे पास हो या न हो, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति हमारी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति सदैव हमारे भीतर विद्यमान है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

श्लोक का उच्चारण एवं विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए। 'न प्रहृष्येत्' (हर्षित न हो) और 'नोद्विजेत्' (उद्विग्न न हो) के बीच के सूक्ष्म अंतर को समझते हुए, श्वास की गति को नियंत्रित करना आवश्यक है। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में तीन बार जपने से बुद्धि में स्थिरता आती है। यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' का एक महत्वपूर्ण रत्न है। इसका पाठ करते समय यह भाव रखें कि आप स्वयं को संसार की क्षणभंगुरता से हटाकर शाश्वत ब्रह्म में लीन कर रहे हैं। यह केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि एक मानसिक अभ्यास है जो धीरे-धीरे हमारे अवचेतन मन को समत्व की स्थिति में ढाल देता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
न प्रहृष्येत्हर्षित न होइन्द्रिय सुख मिलने पर भी अहंकार का उदय न होने देना।
प्रियं प्राप्यप्रिय वस्तु पाकरमनोवांछित फल की प्राप्ति पर भी विचलित न होना।
नोद्विजेत्उद्विग्न न होदुःख या कष्ट आने पर भयभीत या व्याकुल न होना।
अप्रियं प्राप्यअप्रिय वस्तु पाकरप्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य न खोना।
स्थिरबुद्धिस्थिर बुद्धि वालाजिसकी विवेक शक्ति द्वैत में भी अविचल है।
असम्मूढभ्रमरहितजिसे यह बोध हो कि संसार माया है।
ब्रह्मविद्ब्रह्म को जानने वालाआत्मज्ञानी पुरुष।
ब्रह्मणि स्थितःब्रह्म में स्थितपरमात्मा के स्वरूप में सदा लीन रहना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया वह उपदेश है, जो आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शक है। जब अर्जुन विषाद में डूबे थे, तब भगवान ने उन्हें 'स्थितप्रज्ञ' और 'ब्रह्मविद्' के लक्षणों का ज्ञान दिया। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि राजा जनक जैसे महापुरुषों ने इसी अवस्था को प्राप्त किया था। जनक को 'विदेह' कहा गया क्योंकि वे शरीर में रहते हुए भी शरीर से परे थे।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस श्लोक के भावों की पुष्टि की गई है। जब भी कोई साधक सांसारिक मोह-माया में फंसता है, तो उसे इसी श्लोक का स्मरण कराया जाता है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से अलिप्त रहता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी संसार में रहकर भी संसार के सुख-दुःख से अलिप्त रहता है। वेदों में भी 'तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः' (बृहदारण्यक उपनिषद) के माध्यम से इसी स्थिति का वर्णन है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन एक महासंग्राम है, और इस संग्राम में विजय उसी की है जो अपनी बुद्धि को स्थिर रख पाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह श्लोक इसलिए सुनाया ताकि वह युद्ध के भीषण परिणामों से विचलित न हो और अपने कर्तव्य (स्वधर्म) का पालन निष्काम भाव से करे। यह श्लोक हमें सिखाता है कि बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी भयावह क्यों न हों, यदि भीतर का केंद्र (ब्रह्म) स्थिर है, तो व्यक्ति कभी पराजित नहीं हो सकता।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: निरंतर जप से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • तनाव मुक्ति: प्रिय-अप्रिय के प्रति तटस्थ भाव आने से चिंता और तनाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
  • भावनात्मक संतुलन: यह श्लोक व्यक्ति को अत्यधिक हर्ष और अत्यधिक शोक के अतिरेक से बचाता है।
  • आभामंडल (Aura) में वृद्धि: स्थिर बुद्धि से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे व्यक्तित्व में ओज आता है।
  • कर्म शुद्धि: निष्काम भाव विकसित होने से कर्मों के बंधन ढीले पड़ते हैं।
  • आत्म-साक्षात्कार: यह श्लोक साधक को स्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मा) की ओर ले जाता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान के वचनों का चिंतन करने से साधक पर ईश्वर की विशेष अनुकंपा बनी रहती है।
  • भ्रम का नाश: 'असम्मूढ' होने से जीवन के कठिन निर्णयों में स्पष्टता आती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्करणों (जैसे गीता प्रेस, गोरखपुर) और उपनिषदों के भाष्य के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाना है। इस श्लोक की व्याख्या में शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के दर्शन का समन्वय किया गया है, ताकि साधक को एक समग्र दृष्टिकोण प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, ब्रह्मज्ञानी होने का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना है। यह 'आसक्ति' को छोड़ने का मार्ग है, न कि 'कर्तव्य' को।

नियमित ध्यान, स्वाध्याय और निष्काम कर्म के अभ्यास से बुद्धि धीरे-धीरे स्थिर होने लगती है।

यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों के लिए ही है, क्योंकि उन्हें ही सुख-दुःख के द्वंद्वों का सबसे अधिक सामना करना पड़ता है।

यह समझकर कि ये दोनों ही क्षणिक हैं और आत्मा इनसे परे है, आप इन्हें नियंत्रित कर सकते हैं।

ब्रह्म में स्थित होने का अर्थ है—अपने अस्तित्व को परमात्मा के साथ एकाकार कर लेना और हर क्रिया को ईश्वरार्पण करना।

© 2024 Bhaktilok.in - सनातन धर्म की सेवा में समर्पित।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो व्यक्ति प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर विचलित नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, असम्मूढ़ और ब्रह्म में स्थित ज्ञानी है। वह द्वन्द्वों से परे है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 20 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 20/29 69% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!