कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 20

श्लोक २० में बताया गया है कि ब्रह्मज्ञानी प्रिय-अप्रिय में समान रहता है।

संस्कृत श्लोक

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् । स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥ २०॥

na prahṛṣyet priyaṃ prāpya nodvijet prāpya cāpriyam | sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ ||20||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; प्रहृष्येत्: हर्षित होता है; प्रियम्: प्रिय; प्राप्य: प्राप्त करके; न: नहीं; उद्विजेत्: उद्विग्न होता है; प्राप्य: प्राप्त करके; च: और; अप्रियम्: अप्रिय; स्थिरबुद्धिः: स्थिरबुद्धि; असम्मूढः: मोहरहित; ब्रह्मवित्: ब्रह्मज्ञानी; ब्रह्मणि: ब्रह्म में; स्थितः: स्थित।

हिंदी अनुवाद

जो प्रिय वस्तु पाकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय पाकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, मोहरहित, ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्म में स्थित है।

English Translation

He who neither rejoices on obtaining what is pleasant nor grieves on obtaining what is unpleasant – he is of steady intellect, undeluded, a knower of Brahman, and established in Brahman.

टीका / Commentary

ब्रह्मज्ञानी की पहचान है कि वह सुख-दुःख, प्रिय-अप्रिय में समान रहता है। उसकी बुद्धि विचलित नहीं होती, क्योंकि वह जानता है कि ये सब इन्द्रियों के विषय हैं और आत्मा से परे हैं।