कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 21

श्लोक २१ में कहा गया है कि अनासक्त पुरुष आत्मा में नित्य सुख पाता है।

संस्कृत श्लोक

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥

bāhya-sparśeṣv asaktātmā vindaty ātmani yat sukham | sa brahma-yoga-yuktātmā sukham akṣayam aśnute ||21||

पदच्छेद / शब्दार्थ

बाह्यस्पर्शेषु: बाह्य विषय-सुखों में; असक्तात्मा: अनासक्त; विन्दति: प्राप्त करता है; आत्मनि: अपने में; यत्: जो; सुखम्: सुख; स: वह; ब्रह्मयोगयुक्तात्मा: ब्रह्मयोग में लगा हुआ; सुखम्: सुख; अक्षयम्: अक्षय (नाशरहित); अश्नुते: भोगता है।

हिंदी अनुवाद

बाह्य विषयों के सुखों में अनासक्त हुआ पुरुष अपने भीतर जो सुख पाता है, वह ब्रह्मयोग में लगा हुआ उस अक्षय सुख को भोगता है।

English Translation

With the self unattached to external contacts, he finds the joy that is in the Self. With the self engaged in the yoga of Brahman, he enjoys imperishable bliss.

टीका / Commentary

बाह्य विषयों के सुख क्षणिक और दुःखदायी होते हैं। आत्मिक सुख नित्य और अक्षय है। जो व्यक्ति बाह्य सुखों में आसक्त नहीं होता, वह आत्म-सुख पाता है और ब्रह्मयोग में स्थित होकर उस अमृत सुख का अनुभव करता है।