श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 21

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 20 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् । स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
बाह्यस्पर्शेषु
बाह्य विषय-सुखों में
असक्तात्मा
अनासक्त
विन्दति
प्राप्त करता है
आत्मनि
अपने में
यत्
जो
सुखम्
सुख
स
वह
ब्रह्मयोगयुक्तात्मा
ब्रह्मयोग में लगा हुआ
सुखम्
सुख
अक्षयम्
अक्षय (नाशरहित)
अश्नुते
भोगता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

बाह्य विषयों के सुखों में अनासक्त हुआ पुरुष अपने भीतर जो सुख पाता है, वह ब्रह्मयोग में लगा हुआ उस अक्षय सुख को भोगता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Bhaktilok - श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक २१ व्याख्या

आध्यात्मिक प्रस्तावना: सनातन धर्म के महाग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय का २१वां श्लोक मानव जीवन के सबसे गहरे रहस्य को उद्घाटित करता है। यह श्लोक केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक दिव्य औषधि है जो हमें बाह्य जगत के मायावी आकर्षणों से मुक्त कर आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है। संसार में हम जो भी सुख खोजते हैं, वे इंद्रियों के विषयों (बाह्य स्पर्श) से उत्पन्न होते हैं, जो स्वभाव से ही क्षणभंगुर और अंततः दुःख के कारण होते हैं।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक 'वैराग्य' और 'योग' के समन्वय को दर्शाता है। जब मनुष्य अपनी चेतना को बाह्य विषयों से हटाकर अपने अंतःकरण में स्थित करता है, तब उसे उस 'अक्षय सुख' की प्राप्ति होती है, जिसे ब्रह्मयोग कहा गया है। यह वह अवस्था है जहाँ आत्मा स्वयं को परमात्मा के साथ एकाकार अनुभव करती है। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह हमें सिखाता है कि सुख बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही विद्यमान है। जो साधक इस सत्य को समझ लेता है, वह संसार के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित होकर एक शांत, स्थिर और आनंदमयी जीवन व्यतीत करता है। यह श्लोक हमें भौतिकता की अंधी दौड़ से बाहर निकालकर आत्मिक शांति की ओर ले जाने वाला एक दिव्य प्रकाश स्तंभ है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥ २१॥

श्लोक का उच्चारण एवं विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए। 'बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा' का अर्थ है—बाहरी स्पर्शों (इंद्रिय विषयों) में आसक्ति न रखने वाला। इसका पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। पाठ के पूर्व भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें और मन को एकाग्र करते हुए इस श्लोक के अर्थ पर चिंतन करें। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि एक ध्यान प्रक्रिया है। इसे कम से कम 11 बार शांत मन से दोहराने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
बाह्यस्पर्शेषुबाहरी विषयों के स्पर्श मेंइंद्रियों द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भौतिक सुख।
असक्तात्माआसक्ति रहित मन वालाजिसका मन विषयों में नहीं फंसा है।
विन्दतिप्राप्त करता हैअनुभव करना या साक्षात करना।
आत्मनिस्वयं में (आत्मा में)परमात्मा का निवास स्थान।
यत्सुखम्जो सुखवह आनंद जो इंद्रियजन्य नहीं है।
सवहसाधक या योगी।
ब्रह्मयोगयुक्तात्माब्रह्मयोग में स्थित मन वालापरमात्मा के साथ निरंतर जुड़ाव।
सुखमक्षयम्अविनाशी सुखवह आनंद जो कभी समाप्त नहीं होता।
अश्नुतेभोगता है / प्राप्त करता हैउस आनंद में लीन हो जाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए थे, तब भगवान ने उन्हें 'कर्मयोग' और 'ज्ञानयोग' का मार्ग दिखाया। यह श्लोक 'कर्मसंन्यास योग' (अध्याय 5) के अंतर्गत आता है।

पौराणिक संदर्भों में, इस श्लोक का महत्व ऋषि मुनियों के जीवन से जुड़ा है। जिस प्रकार ध्रुव ने अपनी इंद्रियों को वश में कर भगवान विष्णु को प्राप्त किया, या जिस प्रकार राजा जनक ने राजकाज करते हुए भी वैराग्य को धारण किया, यह श्लोक उसी 'स्थितप्रज्ञ' अवस्था की व्याख्या करता है। वेदों में भी 'आत्मरति' (स्वयं में रमण करने वाले) को ही सबसे बड़ा ज्ञानी माना गया है। उपनिषदों में कहा गया है—"आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (बृहदारण्यक उपनिषद)। अर्थात, आत्मा ही देखने, सुनने और चिंतन करने योग्य है। भगवान कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं कि जब तक तुम बाहर सुख ढूंढोगे, तब तक तुम दुखी रहोगे। जैसे ही तुम अपनी चेतना को भीतर मोड़ोगे, तुम्हें वह अक्षय सुख मिलेगा जो न तो जन्म लेता है और न ही मरता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हम संसार में रहते हुए भी संसार से ऊपर उठ सकते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: बाह्य विषयों से मन हटने पर चिंता और तनाव का स्वतः नाश होता है।
  • इंद्रिय निग्रह: इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है, जिससे व्यसनों से मुक्ति मिलती है।
  • अक्षय आनंद: भौतिक सुखों की निर्भरता समाप्त होती है, जिससे व्यक्ति सदा प्रसन्न रहता है।
  • आत्म-विश्वास: स्वयं के भीतर परमात्मा के अंश का अनुभव होने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
  • कर्म शुद्धि: आसक्ति रहित होकर कर्म करने से कर्म बंधन कट जाते हैं।
  • सकारात्मक आभा (Aura): नियमित चिंतन से साधक के व्यक्तित्व में दिव्य तेज और शांति का संचार होता है।
  • भय से मुक्ति: जब सुख बाहर नहीं, भीतर होता है, तो उसे खोने का भय भी समाप्त हो जाता है।
  • मोक्ष का मार्ग: यह श्लोक साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की ओर अग्रसर करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों के समन्वय से तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है। समस्त संदर्भ गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता' के प्रामाणिक संस्करणों पर आधारित हैं। यह सामग्री आध्यात्मिक जिज्ञासाओं को शांत करने और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए एक मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

बाह्य स्पर्श का अर्थ है इंद्रियों का विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) के साथ संपर्क। जब हम इन विषयों में सुख ढूंढते हैं, तो हम बाह्य स्पर्श में बंध जाते हैं।

अक्षय सुख वह आनंद है जो कभी समाप्त नहीं होता। यह आत्मा का स्वभाव है, जो किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं है।

नहीं, गीता संसार छोड़ने के लिए नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए आसक्ति छोड़ने के लिए कहती है। इसे ही 'कर्मयोग' कहा गया है।

ब्रह्मयोग का अर्थ है अपने मन को परमात्मा में लगाना। इसके लिए ध्यान, स्वाध्याय और निष्काम कर्म का अभ्यास आवश्यक है।

तनाव का मुख्य कारण इच्छाओं की पूर्ति न होना है। जब हम आत्म-सुख में स्थित होते हैं, तो बाहरी इच्छाएं कम हो जाती हैं, जिससे तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

बाहरी इन्द्रिय-विषयों से अनासक्त व्यक्ति अपने अन्तर में जो सुख पाता है, वह ब्रह्म से युक्त होकर अक्षय सुख को भोगता है। बाहरी सुख नाशवान हैं, आत्मिक सुख शाश्वत।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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श्लोक 21/29 72% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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