श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 22

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 21 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ये
जो
हि
निश्चय ही
संस्पर्शजा
इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न
भोगाः
भोग
दुःखयोनयः
दुःख के कारण
एव
ही
ते
वे
आद्यन्तवन्तः
आदि-अन्त वाले (नाशवान)
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
न
नहीं
तेषु
उनमें
रमते
रमता है
बुधः
बुद्धिमान।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के कारण ही हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है (वे नाशवान हैं)। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें नहीं रमते।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवद गीता श्लोक २.२२ - आध्यात्मिक विश्लेषण

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद गीता के द्वितीय अध्याय का २२वां श्लोक (कुछ संस्करणों में ५.२२ के रूप में भी उद्धृत) मानव जीवन के सबसे बड़े भ्रम—'इंद्रिय सुख'—पर एक कठोर और सत्यवादी प्रहार है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि संसार में हम जिन सुखों की खोज में दिन-रात भागते हैं, वे वास्तव में सुख नहीं, बल्कि दुखों के बीज (दुःखयोनय) हैं। भारतीय दर्शन में इसे 'विषय-सुख' कहा गया है, जो क्षणभंगुर है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक 'वैराग्य' की नींव रखता है। जब एक साधक यह समझ जाता है कि इंद्रियों का विषयों के साथ संयोग केवल एक रासायनिक प्रतिक्रिया है जो अंततः थकान और तृष्णा को जन्म देती है, तब वह वास्तविक 'आनंद' की खोज शुरू करता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक सूत्र है जो हमें बताता है कि हमारी अशांति का मूल कारण बाहरी वस्तुओं में सुख की तलाश करना है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, आत्मा नित्य है और ये भोग अनित्य। जो नित्य है, वह अनित्य में कैसे रम सकता है? यही विवेक की पराकाष्ठा है। इस श्लोक का चिंतन मनुष्य को वासनाओं के दलदल से निकालकर आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर अग्रसर करता है, जहाँ सुख किसी वस्तु पर निर्भर नहीं, बल्कि आत्मा का स्वभाव बन जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'संस्पर्शजा' और 'दुःखयोनय' शब्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसे शांत चित्त से, मेरुदंड सीधा रखकर, कम से कम ११ बार जप करने से इंद्रियों पर नियंत्रण की शक्ति प्राप्त होती है। पाठ के पूर्व भगवान श्री गणेश और गुरुदेव का स्मरण अनिवार्य है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जिस प्रकार एक जलती हुई मशाल को पकड़ने से हाथ जलता है, उसी प्रकार इंद्रिय सुखों की आसक्ति आत्मा को मलिन करती है। इसका नित्य पाठ करने से व्यक्ति के भीतर 'विवेक' का उदय होता है, जिससे वह संसार के प्रलोभनों में नहीं फंसता।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
येजोवे सभी विषय जो इंद्रियों के गोचर हैं।
हिनिश्चित रूप सेयह सत्य की पुष्टि करता है, कोई संदेह नहीं।
संस्पर्शजाइंद्रियों के संयोग से उत्पन्नविषय और इंद्रियों के मिलन से पैदा होने वाला भ्रम।
भोगाभोगसांसारिक सुख-साधन जो आत्मा को बांधते हैं।
दुःखयोनयदुःख के कारणये सुख नहीं, बल्कि भविष्य के दुखों की जननी हैं।
एवहीकेवल यही सत्य है, दूसरा कोई मार्ग नहीं।
आद्यन्तवन्तःआदि और अंत वालेजो पैदा होते हैं और नष्ट हो जाते हैं (अनित्य)।
कौन्तेयकुंतीपुत्र (अर्जुन)आत्मा की महानता को संबोधित करना।
न तेषु रमतेउनमें नहीं रमताज्ञानी पुरुष इन नाशवान वस्तुओं में सुख नहीं ढूंढता।
बुधःबुद्धिमान/ज्ञानीवह जो विवेकशील है और सत्य को जानता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का हिस्सा है। अर्जुन, जो अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए थे और युद्ध से विमुख हो रहे थे, उन्हें श्रीकृष्ण ने 'सांख्य योग' के माध्यम से सत्य का बोध कराया।

पौराणिक संदर्भों में, हम राजा ययाति की कथा देखते हैं, जिन्होंने हजारों वर्षों तक भोग विलास किया, किंतु अंत में उन्होंने स्वीकार किया कि 'भोगों से तृष्णा कभी शांत नहीं होती, जैसे घी डालने से अग्नि और प्रज्वलित होती है।' यह श्लोक उसी सत्य का सार है। वेदों में भी 'प्रेय' (जो प्रिय लगे) और 'श्रेय' (जो कल्याणकारी हो) का भेद बताया गया है। इंद्रिय सुख 'प्रेय' हैं, जो अंततः दुःख देते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को 'कौन्तेय' कहकर संबोधित करते हैं, जो यह याद दिलाता है कि अर्जुन एक महान कुल के हैं और उन्हें तुच्छ सुखों में नहीं उलझना चाहिए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि संसार एक 'माया' है, जिसका आदि और अंत निश्चित है। जो ज्ञानी है, वह इस माया के जाल को समझकर 'बुध' बन जाता है। यह उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए है जो क्षणिक सुखों के पीछे भागकर अपने शाश्वत आनंद को खो रहे हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • इंद्रिय निग्रह: निरंतर चिंतन से इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है और व्यक्ति वासनाओं का दास नहीं रहता।
  • मानसिक शांति: जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि सुख क्षणिक है, तो हम अपेक्षाएं कम कर देते हैं, जिससे मानसिक तनाव समाप्त होता है।
  • विवेक की जागृति: यह श्लोक बुद्धि को सूक्ष्म बनाता है, जिससे सही और गलत का निर्णय लेना सरल हो जाता है।
  • कर्म शुद्धि: आसक्ति रहित कर्म करने की प्रेरणा मिलती है, जिससे कर्म बंधन (Karma) कम होते हैं।
  • अहंकार का नाश: यह बोध कि सब कुछ अनित्य है, अहंकार को गला देता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): वैराग्य और संतोष से मन में एक दिव्य तेज और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: जो ज्ञानी सांसारिक प्रलोभनों से ऊपर उठ जाता है, उस पर परमात्मा की विशेष कृपा होती है।
  • भय से मुक्ति: नाशवान वस्तुओं के खोने का डर समाप्त हो जाता है क्योंकि साधक जानता है कि जो गया, वह कभी उसका था ही नहीं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री श्रीमद्भगवद गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, आदि शंकराचार्य के भाष्य और स्वामी विवेकानंद के 'ज्ञान योग' के सिद्धांतों पर आधारित है। भक्तीलोक.इन का उद्देश्य सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाना है। सभी व्याख्याएं शास्त्रीय प्रमाणों के अनुरूप हैं और किसी भी प्रकार के भ्रामक दावों से मुक्त हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे इसे केवल एक लेख के रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारने योग्य एक मार्गदर्शक के रूप में देखें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, गीता त्याग का अर्थ 'आसक्ति का त्याग' बताती है। आप संसार में रहें, कार्य करें, लेकिन उनमें 'रमें' नहीं। जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी गीला नहीं होता।

इसका अर्थ है 'दुःख की उत्पत्ति का स्थान'। जिस प्रकार बीज से वृक्ष निकलता है, उसी प्रकार इंद्रिय सुखों की इच्छा से भविष्य में दुःख उत्पन्न होता है।

ज्ञानी वह है जो सुख-दुःख, मान-अपमान और लाभ-हानि में सम रहता है। वह जानता है कि ये सब परिवर्तनशील हैं।

अवश्य। यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों के लिए है ताकि वे सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी मानसिक रूप से मुक्त रह सकें।

जब भी मन किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक आकर्षित हो, तो स्वयं को याद दिलाएं: 'यह क्षणिक है और इसका अंत निश्चित है।' यह विचार आपको तुरंत संतुलन में ले आएगा।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जितने भी इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न भोग हैं, वे सभी दुःख के स्रोत हैं, क्योंकि वे अनित्य हैं। इसलिए हे अर्जुन, बुद्धिमान व्यक्ति उनमें रुचि नहीं लेता।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 22 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 22/29 76% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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