कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 22
श्लोक २२ में बताया गया है कि इन्द्रिय-सुख दुःख के कारण हैं, इसलिए बुद्धिमान उनमें नहीं रमते।
संस्कृत श्लोक
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ २२॥
ye hi saṃsparśa-jā bhogā duḥkha-yonaya eva te | ādy-antavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ ||22||
पदच्छेद / शब्दार्थ
ये: जो; हि: निश्चय ही; संस्पर्शजा: इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न; भोगाः: भोग; दुःखयोनयः: दुःख के कारण; एव: ही; ते: वे; आद्यन्तवन्तः: आदि-अन्त वाले (नाशवान); कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; न: नहीं; तेषु: उनमें; रमते: रमता है; बुधः: बुद्धिमान।
हिंदी अनुवाद
हे कौन्तेय! इन्द्रियों के विषयों से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं, वे दुःख के कारण ही हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है (वे नाशवान हैं)। इसलिए बुद्धिमान पुरुष उनमें नहीं रमते।
English Translation
The pleasures that arise from contact (with sense objects) are indeed sources of sorrow. They have a beginning and an end, O son of Kunti; the wise do not delight in them.
टीका / Commentary
इन्द्रिय-सुख क्षणिक होते हैं और उनकी प्राप्ति के बाद दुःख ही शेष रहता है – इच्छा, तृप्ति, फिर इच्छा। ज्ञानी इन नाशवान सुखों में आसक्त नहीं होता।