श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 23

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 22 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
शक्नोति
समर्थ होता है
इह
इस (लोक) में
एव
ही
यः
जो
सोढुम्
सहन करने में
प्राक्
पहले
शरीरविमोक्षणात्
शरीर त्यागने से
कामक्रोधोद्भवम्
काम और क्रोध से उत्पन्न
वेगम्
वेग (आवेग)
स
वह
युक्तः
योगी
स
वह
सुखी
सुखी
नरः
मनुष्य।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मनुष्य इस जीवन में शरीर त्यागने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और वह सुखी है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के मनीषियों ने मानव जीवन को एक महायज्ञ माना है, जहाँ इंद्रिय-निग्रह ही सबसे बड़ी आहुति है। श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय का यह तेईसवां श्लोक (५.२३) न केवल एक उपदेश है, बल्कि यह आत्म-साक्षात्कार का एक वैज्ञानिक मार्गदर्शक है। ब्रह्मांड की ऊर्जा निरंतर गतिमान है, और मनुष्य का मन इस ऊर्जा का केंद्र है। जब हम 'काम' (अति-इच्छा) और 'क्रोध' (अति-असंतोष) के आवेगों में बहते हैं, तो हम अपनी चेतना को निम्न स्तर पर ले आते हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक 'स्थितप्रज्ञ' होने की पहली सीढ़ी है। भारतीय दर्शन में शरीर को 'रथ' और आत्मा को 'रथी' कहा गया है। यदि काम और क्रोध रूपी घोड़े बेलगाम हो जाएं, तो जीवन का रथ विनाश की खाई में गिरना निश्चित है। इस श्लोक का महत्व इस बात में निहित है कि यह 'शरीर विमोक्षणात्' (मृत्यु से पूर्व) की बात करता है। इसका अर्थ है कि मोक्ष के लिए मृत्यु की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है; जो व्यक्ति जीवित रहते हुए अपने मनोविकारों को जीत लेता है, वह 'जीवन्मुक्त' है। यह ब्रह्मांडीय संतुलन का वह सूत्र है जो मनुष्य को पशुत्व से उठाकर देवत्व की ओर ले जाता है। जब कोई साधक इन आवेगों को नियंत्रित करता है, तो उसके भीतर का 'आत्म-प्रकाश' प्रज्वलित होता है, जिससे वह न केवल स्वयं सुखी होता है, बल्कि अपने परिवेश में भी शांति और सकारात्मकता का संचार करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि सुख बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर की इंद्रियों के अनुशासन में निहित है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥

पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी है। पाठ से पूर्व भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें और मन को शांत कर श्लोक के प्रत्येक अक्षर का उच्चारण करें। इसे कम से कम 11 बार जपने से मन की चंचलता कम होती है और आत्म-नियंत्रण की शक्ति बढ़ती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
शक्नोतिसमर्थ हैआत्म-शक्ति का जागरण, जो स्वयं को नियंत्रित करने में सक्षम है।
इहैवयहीं (इसी जीवन में)मोक्ष के लिए परलोक की प्रतीक्षा नहीं, वर्तमान क्षण में ही सिद्धि संभव है।
यःजोवह साधक जो पुरुषार्थ करने का संकल्प ले चुका है।
सोढुम्सहन करने मेंआवेगों को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें धैर्यपूर्वक झेलकर रूपांतरित करना।
प्राक्शरीरविमोक्षणात्शरीर छोड़ने से पूर्वमृत्यु के अंतिम क्षण तक प्रतीक्षा न करके जीवित रहते हुए मुक्ति का अनुभव।
कामक्रोधोद्भवम्काम और क्रोध से उत्पन्नअति-इच्छा और उसके अवरुद्ध होने से पैदा होने वाली मानसिक अशांति।
वेगम्आवेग (प्रवाह)मन की वह तीव्र लहर जो विवेक को बहा ले जाती है।
स युक्तःवह योगी हैजो परमात्मा से जुड़ गया है, जिसका मन स्थिर है।
स सुखी नरःवह सुखी मनुष्य हैबाह्य सुखों से परे, आत्मिक आनंद में स्थित व्यक्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे, तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जीवन के वास्तविक संग्राम से परिचित कराया। यह श्लोक उसी संवाद का हिस्सा है। पौराणिक संदर्भों में, काम और क्रोध को 'नरक के द्वार' कहा गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में भी भगवान ने कहा है कि काम ही वह अग्नि है जो ज्ञान को ढके रहती है।

पौराणिक कथाओं में हम देखते हैं कि कैसे बड़े-बड़े ऋषियों ने भी काम और क्रोध के वेग को नियंत्रित करने के लिए कठोर तपस्या की। विश्वामित्र जैसे महर्षि भी जब काम के वेग में विचलित हुए, तो उन्हें पुनः तपस्या की ओर लौटना पड़ा। यह श्लोक हमें यह संदेश देता है कि काम और क्रोध का वेग एक 'ऊर्जा' है। यदि इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह विनाशकारी है, लेकिन यदि इसे 'योग' के माध्यम से संयमित किया जाए, तो यही ऊर्जा ओज और तेज में परिवर्तित हो जाती है। महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को यही उपदेश दिया था कि जो मनुष्य अपने क्रोध को पी जाता है, वह संसार के सबसे बड़े शत्रु को परास्त कर देता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि युगों-युगों से चले आ रहे उस आध्यात्मिक विज्ञान का सार है जिसे अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। यह हमें सिखाता है कि हम अपने भाग्य के निर्माता स्वयं हैं, बशर्ते हम अपने मन के वेगों को वश में रखें।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: निरंतर पाठ से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • क्रोध प्रबंधन: यह श्लोक अवचेतन मन को शांत करता है, जिससे क्रोध आने की आवृत्ति कम हो जाती है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): आत्म-संयम से व्यक्ति के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।
  • कर्म शुद्धि: आवेगों पर नियंत्रण होने से व्यक्ति गलत निर्णय लेने से बचता है, जिससे कर्म शुद्ध होते हैं।
  • दैवीय अनुकंपा: जो योगी स्वयं को जीत लेता है, उस पर परमात्मा की कृपा सहज ही बरसती है।
  • तनाव मुक्ति: सांसारिक इच्छाओं के वेग को रोकने से मानसिक तनाव और चिंता का स्वतः नाश होता है।
  • आत्म-विश्वास में वृद्धि: स्वयं पर विजय पाने से व्यक्ति का आत्मविश्वास चरम पर होता है।
  • दीर्घायु एवं स्वास्थ्य: क्रोध और काम के आवेग शरीर के रसायनों को बिगाड़ते हैं; संयम से स्वास्थ्य बेहतर रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'Bhaktilok.in' के संपादकीय विभाग द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों के समन्वय से 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के रूप में प्रस्तुत की गई है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रों के गूढ़ अर्थों को सरल भाषा में समझाना है ताकि वे अपने दैनिक जीवन में इनका प्रयोग कर सकें। संदर्भ हेतु गीता प्रेस गोरखपुर की 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' एवं अन्य प्रामाणिक टीकाओं का आधार लिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

शास्त्रों के अनुसार, काम और क्रोध को मिटाना नहीं, बल्कि उन्हें 'संयमित' करना और 'रूपांतरित' करना लक्ष्य है। पूर्ण निषेध असंभव है, लेकिन विवेक के माध्यम से उन्हें वश में करना ही योग है।

इसका अर्थ है 'शरीर छोड़ने से पूर्व'। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि मोक्ष या शांति के लिए मृत्यु का इंतजार न करें, बल्कि जीवित रहते हुए ही अपने मन को वश में करके सुख प्राप्त करें।

गृहस्थ जीवन में काम (इच्छाएं) और क्रोध (अपेक्षाएं) सबसे अधिक होते हैं। यह श्लोक गृहस्थों को सिखाता है कि कैसे वे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी मानसिक रूप से शांत और सुखी रह सकते हैं।

जप से मन की तरंगें शांत होती हैं। निरंतर अभ्यास से व्यक्ति को 'स्थितप्रज्ञ' होने की शक्ति प्राप्त होती है, जिससे वह विपरीत परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता।

जब मन में तीव्र बेचैनी, प्रतिशोध की भावना या अत्यधिक आसक्ति महसूस हो, तो समझें कि ये काम और क्रोध के वेग हैं। उस समय मौन धारण करना और श्वास पर ध्यान केंद्रित करना सबसे प्रभावी उपाय है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस जीवन में, शरीर त्यागने से पूर्व ही जो मनुष्य काम और क्रोध के वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और सच्चे अर्थों में सुखी है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/29 79% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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