कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 23

श्लोक २३ में कहा गया है कि जो शरीर में रहते हुए काम-क्रोध पर नियंत्रण रखता है, वही सच्चा योगी और सुखी है।

संस्कृत श्लोक

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३॥

śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ prāk śarīra-vimokṣaṇāt | kāma-krodhodbhavaṃ vegaṃ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||23||

पदच्छेद / शब्दार्थ

शक्नोति: समर्थ होता है; इह: इस (लोक) में; एव: ही; यः: जो; सोढुम्: सहन करने में; प्राक्: पहले; शरीरविमोक्षणात्: शरीर त्यागने से; कामक्रोधोद्भवम्: काम और क्रोध से उत्पन्न; वेगम्: वेग (आवेग); स: वह; युक्तः: योगी; स: वह; सुखी: सुखी; नरः: मनुष्य।

हिंदी अनुवाद

जो मनुष्य इस जीवन में शरीर त्यागने से पहले ही काम और क्रोध से उत्पन्न वेग को सहन करने में समर्थ है, वह योगी है और वह सुखी है।

English Translation

He who is able to withstand the impulse of desire and anger even before giving up the body – he is a yogi, he is a happy man.

टीका / Commentary

योगी की कसौटी है कि वह शरीर में रहते हुए ही काम और क्रोध के आवेगों पर नियंत्रण रखता है। ऐसा व्यक्ति ही सच्चा सुखी है।