पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
जो पुरुष अन्तःकरण में ही सुख वाला है, अन्तर में ही रमण करने वाला है, और अन्तर में ही ज्योति वाला है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय का यह चौबीसवां श्लोक—"योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥"—वेदांत दर्शन का एक ऐसा शिखर है, जहाँ मनुष्य की चेतना बाह्य जगत की सीमाओं को लांघकर अपने भीतर स्थित अनंत ब्रह्मांड का अनुभव करती है। भारतीय संस्कृति में 'स्व' की खोज ही सबसे बड़ी यात्रा मानी गई है। जब हम बाहरी सुखों, भौतिक आकर्षणों और इंद्रियजन्य विषयों की मृगतृष्णा से मुक्त होकर अपने अंतःकरण की ओर मुड़ते हैं, तब हमें उस शाश्वत प्रकाश का दर्शन होता है जो कभी अस्त नहीं होता।
यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विज्ञान है। आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और एकाकीपन से जूझ रहा है, यह श्लोक हमें सिखाता है कि शांति बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित 'आत्म-रमण' में है। जब योगी अपने भीतर सुख (आंतरिक संतोष), आराम (आंतरिक विश्राम) और ज्योति (आंतरिक विवेक) को जागृत कर लेता है, तो वह 'ब्रह्मभूत' हो जाता है। ब्रह्मभूत होने का अर्थ है—परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करना। यह स्थिति मोक्ष की वह अवस्था है जहाँ जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि उस सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा का अंश हैं। इस ज्ञान का सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह हमें स्व-निर्भरता और आत्म-अनुशासन का पाठ पढ़ाता है, जो किसी भी साधक के लिए आध्यात्मिक उन्नति की प्रथम सीढ़ी है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥
श्लोक का उच्चारण एवं विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर पद्मासन या सुखासन में बैठना चाहिए। अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें और अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग या भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) पर केंद्रित करें। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक अक्षर की स्पष्टता पर ध्यान दें। यह श्लोक 'ध्यान योग' का सार है। इसका पाठ करने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें और मन में यह संकल्प लें कि आप अपनी चेतना को बाह्य जगत से हटाकर अपने अंतःकरण में स्थित कर रहे हैं। इसे प्रतिदिन कम से कम 11 बार शांत वातावरण में जपें। यह अभ्यास धीरे-धीरे मन की चंचलता को कम करता है और साधक को अंतर्मुखी बनाता है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे और अपने कर्तव्यों को लेकर संशय में थे, तब भगवान ने उन्हें 'ज्ञान योग' और 'कर्म योग' का समन्वय समझाया। यह श्लोक अध्याय ५ (कर्मसंन्यास योग) के अंतर्गत आता है। पौराणिक संदर्भों में, यह श्लोक उपनिषदों के 'आत्मनः कामय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक उपनिषद) के सिद्धांत का विस्तार है।
प्राचीन काल में, ऋषियों ने इसी अवस्था को 'स्थितप्रज्ञ' कहा है। महाभारत के युद्ध के दौरान, जब अर्जुन ने पूछा कि स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसा होता है, तो भगवान ने इसी श्लोक के माध्यम से स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपने भीतर ही सुख, आनंद और ज्योति का अनुभव करता है, वह बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होता। यह श्लोक हमें महर्षि पतंजलि के 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' की याद दिलाता है। जिस प्रकार एक कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, उसी प्रकार योगी अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थित कर लेता है। यह ज्ञान केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए है जो संसार के द्वंद्वों—सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय—के बीच फंसी हुई है। इस श्लोक का मूल आधार 'अद्वैत वेदांत' है, जो यह सिखाता है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। जब साधक इस सत्य को जान लेता है, तो वह 'ब्रह्मभूत' हो जाता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य के भाष्य और विभिन्न उपनिषदों के सार के आधार पर तैयार किया गया है। 'भक्तिलोक.इन' का उद्देश्य सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय हमने गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और वेदांत दर्शन के सिद्धांतों का पालन किया है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-ज्ञान के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसे अपने भीतर ही सुख मिलता है, जो अपने भीतर ही रमण करता है, और जिसे अपने भीतर ही प्रकाश दिखता है – वह योगी ब्रह्ममय होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।