श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 24

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 23 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यः
जो
अन्तःसुखः
अन्तर में सुख वाला
अन्तरारामः
अन्तर में ही रमण करने वाला
तथा
तथा
अन्तर्ज्योतिः
अन्तर में ही ज्योति वाला
एव
ही
यः
जो
स
वह
योगी
योगी
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को
ब्रह्मभूतः
ब्रह्मरूप हुआ
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष अन्तःकरण में ही सुख वाला है, अन्तर में ही रमण करने वाला है, और अन्तर में ही ज्योति वाला है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के पंचम अध्याय का यह चौबीसवां श्लोक—"योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥"—वेदांत दर्शन का एक ऐसा शिखर है, जहाँ मनुष्य की चेतना बाह्य जगत की सीमाओं को लांघकर अपने भीतर स्थित अनंत ब्रह्मांड का अनुभव करती है। भारतीय संस्कृति में 'स्व' की खोज ही सबसे बड़ी यात्रा मानी गई है। जब हम बाहरी सुखों, भौतिक आकर्षणों और इंद्रियजन्य विषयों की मृगतृष्णा से मुक्त होकर अपने अंतःकरण की ओर मुड़ते हैं, तब हमें उस शाश्वत प्रकाश का दर्शन होता है जो कभी अस्त नहीं होता।

यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विज्ञान है। आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और एकाकीपन से जूझ रहा है, यह श्लोक हमें सिखाता है कि शांति बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित 'आत्म-रमण' में है। जब योगी अपने भीतर सुख (आंतरिक संतोष), आराम (आंतरिक विश्राम) और ज्योति (आंतरिक विवेक) को जागृत कर लेता है, तो वह 'ब्रह्मभूत' हो जाता है। ब्रह्मभूत होने का अर्थ है—परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करना। यह स्थिति मोक्ष की वह अवस्था है जहाँ जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम केवल शरीर नहीं, बल्कि उस सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा का अंश हैं। इस ज्ञान का सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह हमें स्व-निर्भरता और आत्म-अनुशासन का पाठ पढ़ाता है, जो किसी भी साधक के लिए आध्यात्मिक उन्नति की प्रथम सीढ़ी है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४॥

श्लोक का उच्चारण एवं विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर पद्मासन या सुखासन में बैठना चाहिए। अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें और अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग या भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) पर केंद्रित करें। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक अक्षर की स्पष्टता पर ध्यान दें। यह श्लोक 'ध्यान योग' का सार है। इसका पाठ करने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें और मन में यह संकल्प लें कि आप अपनी चेतना को बाह्य जगत से हटाकर अपने अंतःकरण में स्थित कर रहे हैं। इसे प्रतिदिन कम से कम 11 बार शांत वातावरण में जपें। यह अभ्यास धीरे-धीरे मन की चंचलता को कम करता है और साधक को अंतर्मुखी बनाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यःजोवह साधक जो सत्य की खोज में तत्पर है।
अन्तःसुखःभीतर ही सुख पाने वालाबाहरी सुखों की अपेक्षा आत्मा के आनंद में लीन होना।
अन्तरारामःभीतर ही रमण करने वालामन का विषयों से हटकर आत्म-चिंतन में रमना।
अन्तर्ज्योतिःभीतर ही प्रकाश देखने वालाहृदय में स्थित आत्म-ज्योति का साक्षात्कार।
एवहीनिश्चयात्मकता, यानी केवल आत्म-केंद्रित होना।
स योगीवह योगीजो योग के माध्यम से परमात्मा से जुड़ चुका है।
ब्रह्मनिर्वाणम्मोक्ष/परम शांतिजन्म-मरण के चक्र से मुक्ति और ब्रह्म में विलीन होना।
ब्रह्मभूतःब्रह्म के समान हो गयास्वयं को ब्रह्म के रूप में अनुभव करना।
अधिगच्छतिप्राप्त करता हैसाधना के फलस्वरुप मोक्ष की प्राप्ति।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश का हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे और अपने कर्तव्यों को लेकर संशय में थे, तब भगवान ने उन्हें 'ज्ञान योग' और 'कर्म योग' का समन्वय समझाया। यह श्लोक अध्याय ५ (कर्मसंन्यास योग) के अंतर्गत आता है। पौराणिक संदर्भों में, यह श्लोक उपनिषदों के 'आत्मनः कामय सर्वं प्रियं भवति' (बृहदारण्यक उपनिषद) के सिद्धांत का विस्तार है।

प्राचीन काल में, ऋषियों ने इसी अवस्था को 'स्थितप्रज्ञ' कहा है। महाभारत के युद्ध के दौरान, जब अर्जुन ने पूछा कि स्थिर बुद्धि वाला व्यक्ति कैसा होता है, तो भगवान ने इसी श्लोक के माध्यम से स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपने भीतर ही सुख, आनंद और ज्योति का अनुभव करता है, वह बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होता। यह श्लोक हमें महर्षि पतंजलि के 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः' की याद दिलाता है। जिस प्रकार एक कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है, उसी प्रकार योगी अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाकर आत्मा में स्थित कर लेता है। यह ज्ञान केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए है जो संसार के द्वंद्वों—सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय—के बीच फंसी हुई है। इस श्लोक का मूल आधार 'अद्वैत वेदांत' है, जो यह सिखाता है कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। जब साधक इस सत्य को जान लेता है, तो वह 'ब्रह्मभूत' हो जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: निरंतर पाठ से मन की चंचलता समाप्त होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • तनाव से मुक्ति: बाह्य जगत पर निर्भरता कम होने से चिंता और अवसाद का नाश होता है।
  • आत्म-विश्वास में वृद्धि: स्वयं के भीतर दिव्य प्रकाश का अनुभव करने से साधक का आत्मविश्वास अटूट हो जाता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इस श्लोक के जप से साधक के चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।
  • कर्मिक शुद्धि: आत्म-साक्षात्कार की दिशा में बढ़ने से संचित कर्मों का प्रभाव क्षीण होने लगता है।
  • इंद्रिय निग्रह: इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है, जिससे व्यक्ति व्यसनों और कुसंगति से दूर रहता है।
  • ब्रह्मचर्य की शक्ति: यह श्लोक साधक को अपनी ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी बनाने में सहायता करता है।
  • मोक्ष का मार्ग: यह श्लोक साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने की दिशा में अग्रसर करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य के भाष्य और विभिन्न उपनिषदों के सार के आधार पर तैयार किया गया है। 'भक्तिलोक.इन' का उद्देश्य सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाना है। इस सामग्री को तैयार करते समय हमने गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और वेदांत दर्शन के सिद्धांतों का पालन किया है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-ज्ञान के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, बिल्कुल। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति 'अंतर्मुखी' हो सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि आप संसार छोड़ दें, बल्कि इसका अर्थ है कि आप संसार में रहते हुए भी अपने मन को परमात्मा में स्थिर रखें।

ब्रह्मनिर्वाण का अर्थ है ब्रह्म में विलीन हो जाना। यह वह अवस्था है जहाँ साधक को यह बोध हो जाता है कि वह स्वयं ब्रह्म है। यह दुखों की अंतिम निवृत्ति है।

नियमित ध्यान और प्राणायाम के माध्यम से। जब मन शांत होता है, तो हृदय के भीतर एक सूक्ष्म प्रकाश का अनुभव होता है, जिसे योग शास्त्र में 'आत्म-ज्योति' कहा गया है।

गीता के श्लोक सार्वभौमिक हैं। कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति इसे पढ़ सकता है। हालांकि, गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने से आध्यात्मिक प्रगति तीव्र होती है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं है। जब हम बाहरी अपेक्षाएं छोड़ देते हैं, तो मन स्वतः ही शांत हो जाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिसे अपने भीतर ही सुख मिलता है, जो अपने भीतर ही रमण करता है, और जिसे अपने भीतर ही प्रकाश दिखता है – वह योगी ब्रह्ममय होकर ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) को प्राप्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/29 83% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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