श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 25

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 23 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
लभन्ते
प्राप्त करते हैं
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म-निर्वाण
ऋषयः
ऋषिगण
क्षीणकल्मषाः
जिनके पाप (संस्कार) नष्ट हो गए हैं
छिन्नद्वैधाः
जिनके सन्देह छिन्न हो गए हैं
यतात्मानः
संयत चित्त वाले
सर्वभूतहिते
सब प्राणियों के हित में
रताः
लगे रहने वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब सन्देह कट गए हैं, जो संयत चित्त वाले हैं और सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं – ऐसे ऋषिगण ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय का यह पच्चीसवां श्लोक मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य 'ब्रह्मनिर्वाण' को प्राप्त करने की एक विस्तृत कार्ययोजना प्रस्तुत करता है। भारतीय संस्कृति में मोक्ष का अर्थ केवल मृत्यु के बाद की मुक्ति नहीं है, अपितु जीवित रहते हुए अपने स्वरूप को पहचान लेना ही वास्तविक निर्वाण है। यह श्लोक उन चार स्तंभों को रेखांकित करता है जो एक साधक को सामान्य मनुष्य से ऊपर उठाकर 'ऋषि' तुल्य बना देते हैं।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखें तो यह श्लोक 'समत्व' और 'परोपकार' के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। जब एक साधक अपने पापों (क्षीणकल्मषाः) को धो डालता है, तो उसके भीतर का द्वैत (छिन्नद्वैधा) स्वतः समाप्त हो जाता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। आज के भौतिकवादी युग में, जहाँ मानसिक अशांति और वैचारिक द्वंद्व चरम पर हैं, यह श्लोक हमें सिखाता है कि 'सर्वभूतहिते रताः' (सभी प्राणियों के हित में रत रहना) ही वह कुंजी है जो आत्म-साक्षात्कार के द्वार खोलती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि ईश्वर की प्राप्ति किसी गुफा में छिपकर नहीं, बल्कि संसार के बीच रहकर, निष्काम भाव से सेवा करते हुए और अपने मन को वश में रखकर ही संभव है। यह सनातन धर्म का वह सार है जो व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठाकर ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार होने का मार्ग प्रशस्त करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५॥

उच्चारण विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को शांत चित्त होकर बैठना चाहिए। 'ब्रह्मनिर्वाण' शब्द का उच्चारण करते समय नाभि से ध्वनि का अनुभव करें। यह श्लोक गीता के 'कर्मयोग' और 'ज्ञानयोग' का अद्भुत मिलन है। नित्य प्रातः काल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके इसका तीन बार पाठ करना मानसिक एकाग्रता और आत्म-शुद्धि में सहायक होता है। श्लोक के प्रत्येक शब्द के अर्थ को हृदयंगम करते हुए जब हम इसका जप करते हैं, तो हमारे अवचेतन मन में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह श्लोक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि अपने आचरण में उतारने के लिए है। इसे 'मोक्ष-मंत्र' के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यह उन गुणों को परिभाषित करता है जो आत्मा को बंधन मुक्त करते हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
लभन्तेप्राप्त करते हैंसाधक का अधिकार, जो प्रयत्नशील है उसे फल मिलना निश्चित है।
ब्रह्मनिर्वाणम्परम शांति/मोक्षपरमात्मा में विलीन हो जाना, जहाँ कोई दुःख शेष न रहे।
ऋषयःऋषि/ज्ञानीवे लोग जो सत्य के दृष्टा हैं और जिन्होंने इंद्रियों को जीता है।
क्षीणकल्मषाःपाप रहितजिनके कर्मों के संस्कार और अज्ञानता का मैल धुल चुका है।
छिन्नद्वैधासंदेह रहितजिनके मन में 'मैं' और 'पर' का भेद समाप्त हो गया है।
यतात्मानःसंयमित मन वालेजिन्होंने अपनी इंद्रियों और मन को पूर्णतः वश में कर लिया है।
सर्वभूतहितेसभी प्राणियों के हित मेंसमस्त सृष्टि को अपना ही विस्तार मानना।
रताःलीन/तत्परनिरंतर सेवा और प्रेम के भाव में डूबे रहना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का एक अभिन्न अंग है। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं, तब भगवान उन्हें 'स्थितप्रज्ञ' होने का मार्ग बताते हैं। इस श्लोक की पृष्ठभूमि में 'ज्ञानयोग' का वह शिखर है जहाँ साधक को यह बोध होता है कि वह शरीर नहीं, आत्मा है।

पौराणिक संदर्भों में, महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से उन ऋषियों की जीवनशैली का वर्णन किया है जो प्राचीन काल में तपस्या करते थे। उदाहरण के लिए, ऋषि दधीचि का उदाहरण लें, जिन्होंने लोक कल्याण के लिए अपने अस्थि दान कर दिए थे। वे 'सर्वभूतहिते रताः' के साक्षात उदाहरण थे। इसी प्रकार, भगवान राम का जीवन भी इसी श्लोक का जीवंत चित्रण है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों का त्याग कर 'सर्वभूतहिते' के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

शास्त्रों के अनुसार, यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह 'राजर्षि' बनने की प्रक्रिया है। राजा जनक का उदाहरण लें, जो संसार के सभी कार्यों को करते हुए भी 'छिन्नद्वैधा' (संदेह रहित) थे। वे जानते थे कि संसार का कार्य करना उनका कर्तव्य है, लेकिन वे उसमें आसक्त नहीं थे। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मोक्ष के लिए जंगल जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने मन के भीतर के द्वैत को समाप्त करने की आवश्यकता है। जब हम दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझने लगते हैं, तब हमारे भीतर का 'अहंकार' क्षीण होने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ से ब्रह्मनिर्वाण की यात्रा प्रारंभ होती है। यह श्लोक उपनिषदों के 'तत्त्वमसि' महावाक्य का व्यावहारिक अनुप्रयोग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: नियमित पाठ से विचारों का कोलाहल शांत होता है और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • पापों का क्षय: 'क्षीणकल्मषाः' के चिंतन से अनजाने में हुए अपराधों के प्रति पश्चाताप की भावना जागृत होती है, जो चित्त को शुद्ध करती है।
  • संदेहों का निवारण: जीवन के कठिन निर्णयों में 'छिन्नद्वैधा' की स्थिति प्राप्त होती है, जिससे भ्रम दूर होता है।
  • इंद्रिय निग्रह: 'यतात्मानः' का अभ्यास करने से व्यक्ति अपनी इंद्रियों का दास न रहकर उनका स्वामी बन जाता है।
  • सकारात्मक औरा (Aura): दूसरों के हित में रत रहने से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य औरा निर्मित होता है, जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखता है।
  • तनाव मुक्ति: जब हम स्वयं को 'सर्वभूतहिते' से जोड़ते हैं, तो व्यक्तिगत चिंताएं गौण हो जाती हैं।
  • आत्म-विश्वास में वृद्धि: स्वयं के स्वरूप को पहचानने से भय का नाश होता है।
  • दिव्य अनुकंपा: इस श्लोक का भावपूर्ण जप करने से साधक को ईश्वर की कृपा का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 5, श्लोक 25 के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें प्रयुक्त व्याख्याएं आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद और गीता प्रेस गोरखपुर के भाष्य ग्रंथों के सार पर आधारित हैं। यह सामग्री आध्यात्मिक शोध और शास्त्रीय अध्ययन के मानकों को ध्यान में रखते हुए संकलित की गई है, ताकि पाठक को मूल अर्थ और उसके व्यावहारिक अनुप्रयोग का सटीक ज्ञान प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

ब्रह्मनिर्वाण का अर्थ है उस परम शांति की स्थिति को प्राप्त करना जहाँ आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है। यह दुखों की पूर्ण समाप्ति और आनंद की अवस्था है।

हाँ, गीता स्पष्ट करती है कि यदि व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से करे और 'सर्वभूतहिते रताः' के भाव को अपना ले, तो वह गृहस्थ में रहकर भी मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

इसका अर्थ है मन के सभी द्वंद्वों (जैसे सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय) का समाप्त हो जाना। जब व्यक्ति सत्य को जान लेता है, तो द्वैत स्वतः समाप्त हो जाता है।

पापों का नाश केवल पश्चाताप और सत्कर्मों से होता है। जब हम दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करते हैं, तो हमारे पुराने कर्मों का प्रभाव क्षीण होने लगता है।

दैनिक जीवन में किसी भी कार्य को करते समय यह सोचें कि क्या यह कार्य दूसरों के हित में है? अपने मन को क्रोध और लोभ से बचाएं और निरंतर सेवा भाव रखें। यही इस श्लोक का व्यावहारिक उपयोग है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिन ऋषियों के सारे पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सन्देह मिट गए हैं, जिनका मन वश में है और जो सभी प्राणियों के हित में संलग्न हैं – वे ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त करते हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/29 86% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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