श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 26

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 24 मिनट का पठन 126 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् । अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
कामक्रोधवियुक्तानाम्
काम और क्रोध से रहित
यतीनाम्
योगियों (संन्यासियों) के
यतचेतसाम्
संयत चित्त वाले
अभितः
सब ओर (निकट ही)
ब्रह्मनिर्वाणम्
ब्रह्म-निर्वाण
वर्तते
स्थित है
विदितात्मनाम्
आत्मज्ञानियों के।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

काम और क्रोध से रहित, संयत चित्त वाले, आत्मज्ञानी योगियों के लिए ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) सब ओर (निकट ही) विद्यमान है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का यह छठा अध्याय, जिसे 'आत्मसंयम योग' के नाम से जाना जाता है, मानव चेतना के उत्थान का एक मार्गदर्शक स्तंभ है। प्रस्तुत श्लोक—"कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्"—मानव जीवन के उन दो सबसे बड़े शत्रुओं पर प्रहार करता है जो आत्मा और परमात्मा के मिलन में सबसे बड़ी बाधा हैं: 'काम' (वासना) और 'क्रोध' (आवेश)।

वैदिक परंपरा में, मनुष्य का मन एक चंचल अश्व के समान है। जब तक यह अश्व इंद्रियों के वश में रहता है, तब तक जीव संसार के चक्र में भटकता रहता है। परंतु, जब साधक अपनी चेतना को 'यतचेतसाम्' (नियंत्रित मन) की स्थिति में ले आता है, तब वह ब्रह्म के साक्षात अनुभव के योग्य बनता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया है। 'ब्रह्मनिर्वाण' का अर्थ केवल मृत्यु के बाद की मुक्ति नहीं है, बल्कि यह वह अवस्था है जहाँ साधक जीवित रहते हुए भी द्वैत से मुक्त हो जाता है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि शांति बाहर की परिस्थितियों में नहीं, बल्कि भीतर की इंद्रिय-विजय में निहित है। जब काम और क्रोध का दमन नहीं, बल्कि रूपांतरण होता है, तब साधक के चारों ओर एक दिव्य आभा मंडल (Aura) निर्मित होता है, जो उसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ देता है। यह श्लोक उन सभी साधकों के लिए एक प्रकाश पुंज है जो आत्म-साक्षात्कार की यात्रा पर अग्रसर हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता बनाए रखें। 'काम-क्रोध-वियुक्तानां' को लयबद्ध तरीके से उच्चारित करें। 'ब्रह्मनिर्वाणं' शब्द का उच्चारण करते समय नासिका के स्वर का ध्यान रखें। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में कम से कम 11 बार जप करने से मन की एकाग्रता में अद्भुत वृद्धि होती है। पाठ के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें और मन में यह संकल्प लें कि आप अपनी इंद्रियों को परमात्मा की सेवा में समर्पित कर रहे हैं। यह श्लोक गीता के अध्याय 5, श्लोक 26 से उद्धृत है, जो संन्यास और कर्मयोग के समन्वय को दर्शाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कामवासना, इच्छाइंद्रियों की वह अतृप्त भूख जो आत्मा को संसार से बांधती है।
क्रोधआवेश, गुस्साविवेक के नष्ट होने पर उत्पन्न होने वाली वह अग्नि जो स्वयं के ही गुणों को जला देती है।
वियुक्तानांमुक्त, अलगइन विकारों से पूर्णतः विरक्त हो जाना, जैसे कमल का पत्ता जल से अलग रहता है।
यतीनांसंन्यासियों, साधकोंवे लोग जिन्होंने संसार के मोह को त्याग कर ईश्वर की ओर मुख किया है।
यतचेतसाम्नियंत्रित मन वालेजिसने अपने मन की चंचलता को स्थिर कर लिया है।
अभितोसब ओर, सर्वत्रईश्वर की उपस्थिति का हर क्षण अनुभव करना।
ब्रह्मनिर्वाणंमोक्ष, परम शांतिअहंकार का विलय और परमात्मा में स्थिति।
वर्ततेविद्यमान हैमोक्ष कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि वर्तमान में उपलब्ध है।
विदितात्मनाम्आत्म-ज्ञानीजिन्होंने स्वयं को जान लिया है, वही परमात्मा को जान सकते हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन विषाद में डूबे थे और उन्हें लग रहा था कि संसार के मोह और शत्रुओं के प्रति क्रोध के बीच धर्म का पालन कैसे हो, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें 'स्थितप्रज्ञ' होने का मार्ग दिखाया।

पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि विश्वामित्र जैसे ऋषियों ने भी काम और क्रोध पर विजय पाने के लिए वर्षों तक तपस्या की। काम और क्रोध को 'नरक के द्वार' कहा गया है (गीता 16.21)। जब तक मनुष्य इन दो विकारों के अधीन है, वह अपनी वास्तविक आत्मा को नहीं देख सकता। महाभारत की कथा में, दुर्योधन का क्रोध और काम (राज्य की लालसा) ही उसके विनाश का कारण बना, जबकि युधिष्ठिर का 'यतचेतसाम्' (नियंत्रित मन) उन्हें धर्मराज के पद पर प्रतिष्ठित करने में सहायक हुआ। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे मृत्यु के बाद खरीदा जाए; यह एक मानसिक अवस्था है। यदि आप वर्तमान में अपने मन को वश में कर लेते हैं, तो आप उसी क्षण ब्रह्म के आनंद का अनुभव कर सकते हैं। यह ज्ञान उपनिषदों के 'तत्त्वमसि' (वह तुम ही हो) के सिद्धांत का व्यावहारिक अनुप्रयोग है। श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को समझा रहे हैं कि संन्यास का अर्थ जंगल जाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के विकारों का संन्यास करना है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक लाभ

  • मानसिक शांति: नियमित जप से मस्तिष्क में अल्फा तरंगों का संचार होता है, जिससे तनाव और चिंता का स्वतः शमन होता है।
  • इंद्रिय निग्रह: यह श्लोक साधक को अपनी इंद्रियों का स्वामी बनाता है, जिससे व्यर्थ की वासनाओं से मुक्ति मिलती है।
  • क्रोध का रूपांतरण: क्रोध की ऊर्जा को सहनशक्ति और धैर्य में बदलने की अद्भुत क्षमता प्राप्त होती है।
  • आत्म-साक्षात्कार: स्वयं के वास्तविक स्वरूप को जानने की जिज्ञासा और शक्ति जागृत होती है।
  • कर्मिक शुद्धि: पुराने संचित कर्मों के प्रभाव को कम करने में यह श्लोक एक कवच का कार्य करता है।
  • दिव्य आभा मंडल: निरंतर पाठ से साधक के व्यक्तित्व में एक सकारात्मक ओज और तेज की वृद्धि होती है।
  • निर्णय लेने की क्षमता: मन शांत होने से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही और धर्मसम्मत निर्णय ले पाता है।
  • ईश्वरीय कृपा: यह श्लोक साधक को परमात्मा की निकटता का अनुभव कराता है, जिससे भय का नाश होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य कृत गीता भाष्य और आधुनिक आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों के समन्वय से तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के सार से जोड़ना है। हम यह स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक प्रगति एक निरंतर अभ्यास है और यह सामग्री केवल मार्गदर्शन हेतु है। किसी भी प्रकार के आध्यात्मिक प्रयोग से पूर्व गुरु-निर्देश या शास्त्र-अध्ययन अनिवार्य है। यह सामग्री 'Bhaktilok.in' की संपादकीय टीम द्वारा गहन शोध के उपरांत प्रस्तुत की गई है, जिसमें गीता के अध्याय 5 के दार्शनिक भावों को प्राथमिकता दी गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

काम और क्रोध मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ हैं। शास्त्र इन्हें मिटाने के बजाय 'रूपांतरित' करने की बात कहते हैं। काम को 'ईश्वर प्रेम' में और क्रोध को 'अधर्म के प्रति आक्रोश' में बदलना ही यति का लक्षण है।

ब्रह्मनिर्वाण का अर्थ है—अहंकार का पूर्ण विलय। जब साधक को यह बोध हो जाता है कि वह शरीर नहीं, आत्मा है, तो उसे संसार के सुख-दुख प्रभावित नहीं करते। यही अवस्था ब्रह्मनिर्वाण है।

निश्चित रूप से। गीता का उपदेश अर्जुन को युद्धभूमि में दिया गया था, न कि किसी गुफा में। गृहस्थ रहते हुए भी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मन को ईश्वर में लगाना ही श्रेष्ठ योग है।

सबसे सरल उपाय है 'नाम जप' और 'साक्षी भाव'। अपने विचारों को एक दर्शक की तरह देखें, उनमें उलझें नहीं। धीरे-धीरे मन स्थिर होने लगेगा।

नहीं, 'यतीनां' का अर्थ केवल गेरुआ वस्त्रधारी नहीं, बल्कि वे सभी हैं जो आत्म-संयम का प्रयास कर रहे हैं। यह प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए है जो अपने जीवन को उच्च स्तर पर ले जाना चाहता है।

© 2024 Bhaktilok.in | सनातन धर्म के प्रचार हेतु समर्पित | आत्म-कल्याण की ओर एक कदम

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

काम और क्रोध से मुक्त, मन को वश में किए हुए और आत्मतत्त्व को जानने वाले योगियों के लिए ब्रह्म-निर्वाण (मोक्ष) सदा ही प्राप्त है – वह उनसे दूर नहीं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 26 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 26/29 90% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!