कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 27
श्लोक २७ ध्यान के आसन और प्राणायाम की विधि बताता है।
संस्कृत श्लोक
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७॥
sparśān kṛtvā bahir bāhyāṃś cakṣuś caivāntare bhruvoḥ | prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantara-cāriṇau ||27||
पदच्छेद / शब्दार्थ
स्पर्शान्: स्पर्शों (इन्द्रिय-विषयों) को; कृत्वा: करके; बहिः: बाहर; बाह्यान्: बाह्य; चक्षुः: दृष्टि; च: और; एव: ही; अन्तरे: बीच में; भ्रुवोः: दोनों भौहों के; प्राणापानौ: प्राण और अपान वायु को; समौ: समान; कृत्वा: करके; नासाभ्यन्तरचारिणौ: नासिका के भीतर विचरण करने वाले।
हिंदी अनुवाद
बाह्य (सब) विषयों को बाहर ही त्यागकर, दोनों भौहों के बीच दृष्टि को स्थिर करके, नासिका के भीतर विचरण करने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके...
English Translation
Shutting out all external sense objects, fixing the vision between the eyebrows, making the prana and apana (incoming and outgoing breaths) even and flowing within the nostrils...
टीका / Commentary
यह श्लोक अगले श्लोक के साथ ध्यान योग की विधि बताता है – इन्द्रियों को विषयों से हटाना, दृष्टि को भृकुटी के बीच स्थिर करना, और श्वास को नियंत्रित करना।