श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 27

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 24 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
स्पर्शान्
स्पर्शों (इन्द्रिय-विषयों) को
कृत्वा
करके
बहिः
बाहर
बाह्यान्
बाह्य
चक्षुः
दृष्टि
च
और
एव
ही
अन्तरे
बीच में
भ्रुवोः
दोनों भौहों के
प्राणापानौ
प्राण और अपान वायु को
समौ
समान
कृत्वा
करके
नासाभ्यन्तरचारिणौ
नासिका के भीतर विचरण करने वाले।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

बाह्य (सब) विषयों को बाहर ही त्यागकर, दोनों भौहों के बीच दृष्टि को स्थिर करके, नासिका के भीतर विचरण करने वाले प्राण और अपान वायु को समान करके...

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का पांचवां अध्याय 'कर्मसंन्यास योग' के नाम से विख्यात है, किंतु इसके अंतिम श्लोक ध्यान योग की उस पराकाष्ठा को स्पर्श करते हैं, जहाँ साधक स्वयं को परमात्मा के साथ एकाकार करने का प्रयास करता है। श्लोक 27 केवल एक निर्देश नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जब हम 'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्' की बात करते हैं, तो यह इंद्रियों के बाह्य विषयों से पूर्ण विरक्ति का आह्वान है। आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य का मन निरंतर शोर, सूचनाओं और भौतिक आकर्षणों से घिरा है, यह श्लोक एक 'मेंटल डिटॉक्स' (मानसिक शुद्धि) की तरह कार्य करता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक 'प्राणायाम' और 'धारणा' के संगम को दर्शाता है। भृकुटी के मध्य दृष्टि को स्थिर करना, जिसे हम 'आज्ञा चक्र' कहते हैं, चेतना को उच्चतर आयामों में ले जाने का द्वार है। यह ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ हमारे सूक्ष्म शरीर के तालमेल को बिठाने की प्रक्रिया है। जब साधक अपनी श्वास को सम (समान) करता है, तो वह अपने भीतर के द्वैत (सुख-दुःख, शीत-उष्ण) को समाप्त कर देता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि शांति बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि भीतर की स्थिरता में है। यह आत्म-अनुशासन का वह मार्ग है जो मनुष्य को पशुवत प्रवृत्तियों से उठाकर दिव्य चेतना की ओर ले जाता है। इस श्लोक का अभ्यास करने वाला साधक न केवल मानसिक तनाव से मुक्त होता है, बल्कि वह अपने भीतर के उस 'अविनाशी तत्व' को पहचानने में सक्षम हो जाता है जो जन्म-मरण के चक्र से परे है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७॥

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को ध्यान की वह अवस्था बता रहे हैं जहाँ बाह्य जगत का प्रभाव शून्य हो जाता है। विधि अत्यंत स्पष्ट है: प्रथम, बाहरी विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) को मन से बाहर निकालें। द्वितीय, अपनी दृष्टि को दोनों भौहों के मध्य (आज्ञा चक्र) पर एकाग्र करें। तृतीय, नासिका के भीतर चलने वाली प्राण और अपान वायु को समान (सम) करें। यह श्लोक योग के 'प्रत्याहार' और 'धारणा' अंगों का एक संक्षिप्त सार है। जब साधक इन तीनों क्रियाओं को एक साथ करता है, तो उसका मन स्वतः ही अंतर्मुखी हो जाता है। यह विधि केवल बैठने का तरीका नहीं है, बल्कि यह चेतना को भौतिक शरीर की सीमाओं से मुक्त करने का एक आध्यात्मिक विज्ञान है। इसे 'हठयोग' और 'राजयोग' का सुंदर समन्वय माना जाता है, जहाँ श्वास का नियंत्रण मन के नियंत्रण का आधार बनता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
स्पर्शान्विषयों कोइंद्रियों के भोग्य पदार्थ जो मन को विचलित करते हैं।
बहिर्बाह्यान्बाहर ही रखकरइंद्रियों को विषयों के संपर्क से पूरी तरह काट देना।
चक्षुःदृष्टिसाधक की एकाग्रता का केंद्र।
अन्तरे भ्रुवोःभृकुटी के मध्यआज्ञा चक्र, जहाँ से दिव्य दृष्टि का उदय होता है।
प्राणापानौप्राण और अपानभीतर जाने वाली और बाहर आने वाली श्वास।
समौ कृत्वासमान करकेश्वास की गति को संतुलित कर मन को शांत करना।
नासाभ्यन्तरनासिका के भीतरश्वास के सूक्ष्म प्रवाह का अनुभव करना।
चारिणौविचरण करने वालेप्राण शक्ति का निरंतर प्रवाह जो जीवन का आधार है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में स्थित है। जब अर्जुन विषाद में डूबे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें 'योग' का मार्ग दिखाया। यह श्लोक 'ध्यान योग' का आधार स्तंभ है। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि महर्षि पतंजलि ने अपने 'योग सूत्र' में इसी प्रक्रिया को 'प्राणायाम' और 'प्रत्याहार' के रूप में परिभाषित किया है। महाभारत के शांति पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इसी प्रकार की ध्यान विधियों का उपदेश दिया था, जो प्राचीन ऋषियों की परंपरा का हिस्सा रही हैं।

वेदों में 'प्राण' को ही ब्रह्म माना गया है। 'प्राणो वै ब्रह्म' (प्राण ही ब्रह्म है)। जब हम नासिका के भीतर श्वास को नियंत्रित करते हैं, तो हम वास्तव में उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) को नियंत्रित कर रहे होते हैं। रामायण में हनुमान जी की एकाग्रता और श्वास पर नियंत्रण का वर्णन मिलता है, जो उन्हें 'योगिराज' की श्रेणी में खड़ा करता है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, बल्कि यह उन प्राचीन गुरुकुलों की विद्या है जहाँ शिष्य वर्षों तक श्वास के संतुलन का अभ्यास करते थे ताकि वे अपनी चेतना को शरीर से ऊपर उठा सकें। यह विधि भगवान शिव के 'विज्ञान भैरव तंत्र' से भी मेल खाती है, जहाँ श्वास के माध्यम से ही समाधि तक पहुँचने का मार्ग बताया गया है। अतः, यह श्लोक सनातन धर्म की उस अखंड परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जो मनुष्य को 'नर' से 'नारायण' बनाने की क्षमता रखती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक एकाग्रता में वृद्धि: नियमित अभ्यास से मन का भटकाव कम होता है और कार्यक्षमता बढ़ती है।
  • तनाव और चिंता का शमन: श्वास के संतुलन से 'कोर्टिसोल' हार्मोन का स्तर कम होता है, जिससे मन शांत रहता है।
  • आज्ञा चक्र का जागरण: भृकुटी के मध्य ध्यान लगाने से अंतर्ज्ञान (Intuition) और दूरदर्शिता विकसित होती है।
  • प्राणिक ऊर्जा का शुद्धिकरण: नाड़ियों में जमा नकारात्मक ऊर्जा का निष्कासन होता है, जिससे आभा मंडल (Aura) तेजस्वी बनता है।
  • भावनात्मक स्थिरता: साधक सुख-दुःख के द्वंद्वों से ऊपर उठकर समभाव (Equanimity) प्राप्त करता है।
  • आत्म-साक्षात्कार का मार्ग: यह विधि साधक को स्वयं के स्वरूप को पहचानने में सहायता करती है।
  • अनिद्रा से मुक्ति: श्वास पर नियंत्रण करने से मस्तिष्क को गहरी विश्राम की अवस्था प्राप्त होती है।
  • दैवीय अनुकंपा: निरंतर अभ्यास से साधक को ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होने लगता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, आदि शंकराचार्य के भाष्य और स्वामी विवेकानंद के 'राजयोग' दर्शन के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्या का उद्देश्य पाठकों को योग की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गहराई से परिचित कराना है। हम स्पष्ट करते हैं कि आध्यात्मिक प्रगति साधक के व्यक्तिगत अभ्यास, श्रद्धा और गुरु-निर्देश पर निर्भर करती है। यह सामग्री केवल शैक्षिक और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए है और इसे किसी भी चिकित्सा उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, यह विधि सार्वभौमिक है। हालांकि, इसे किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करना श्रेष्ठ होता है ताकि श्वास की गति और एकाग्रता का सही संतुलन बना रहे।

इसे 'आज्ञा चक्र' कहा जाता है। यहाँ ध्यान लगाने से मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं और साधक को उच्च चेतना का अनुभव होता है।

इसका अर्थ है श्वास की गति को इतना धीमा और लयबद्ध करना कि भीतर जाने वाली और बाहर आने वाली वायु में कोई अंतर न रहे, जिससे मन की चंचलता समाप्त हो जाए।

सुखासन या पद्मासन में रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठना सबसे उत्तम है, ताकि ऊर्जा का प्रवाह निर्बाध रूप से हो सके।

आरंभ में 10-15 मिनट का अभ्यास पर्याप्त है। धीरे-धीरे इसे अपनी क्षमतानुसार बढ़ाया जा सकता है। निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

बाह्य इन्द्रिय-विषयों को मन से बाहर करके, दृष्टि को भौहों के बीच स्थिर करके, और नासिका में विचरण करने वाली श्वास-प्रश्वास (प्राण-अपान) को समान करके... (योगी ध्यान में स्थित होता है)।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/29 93% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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