श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 28

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 23 मिनट का पठन 143 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
यतेन्द्रियमनोबुद्धिः
संयत इन्द्रिय, मन और बुद्धि वाला
मुनिः
मुनि
मोक्षपरायणः
मोक्ष परायण
विगतेच्छाभयक्रोधः
इच्छा, भय और क्रोध से रहित
यः
जो
सदा
सदा
मुक्त
मुक्त
एव
ही
सः
वह।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

...इस प्रकार जो मुनि संयत इन्द्रिय, मन और बुद्धि वाला, मोक्ष-परायण, इच्छा, भय और क्रोध से रहित है, वह सदा के लिए मुक्त ही है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सनातन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा में 'मोक्ष' केवल एक गंतव्य नहीं, बल्कि एक निरंतर चलने वाली चेतना की अवस्था है। श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय का यह अट्ठाइसवां श्लोक—"यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥"—मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य और उसे प्राप्त करने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का एक वैज्ञानिक दस्तावेज है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मुक्ति के लिए किसी सुदूर लोक में जाने की आवश्यकता नहीं है, अपितु अपने भीतर की उन वृत्तियों को शांत करने की आवश्यकता है जो हमें संसार के मायाजाल में बांधे रखती हैं।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक 'स्थितप्रज्ञ' की उस अवस्था का वर्णन करता है जहाँ साधक का मन, बुद्धि और इंद्रियां एक लय में आ जाती हैं। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं, भय और क्रोध के त्रिकोण से बाहर निकलता है, तो वह काल के चक्र से मुक्त हो जाता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक 'जीवन-दर्शन' है जो हमें सिखाता है कि कैसे हम अपने दैनिक जीवन के संघर्षों के बीच भी एक 'मुक्त पुरुष' की भांति आचरण कर सकते हैं। यह श्लोक उन सभी साधकों के लिए एक प्रकाश स्तंभ है जो आत्म-नियंत्रण के माध्यम से ईश्वरत्व की प्राप्ति करना चाहते हैं। इसकी महत्ता इस बात में निहित है कि यह जटिल दार्शनिक सिद्धांतों को अत्यंत सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे एक सामान्य गृहस्थ भी अपने जीवन में शांति और मुक्ति का अनुभव कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८॥

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को एकाग्रता और शांत चित्त की आवश्यकता होती है। यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 'कर्मयोग' का सार है। इसका विधिपूर्वक पाठ करने के लिए साधक को सर्वप्रथम पद्मासन या सुखासन में बैठकर अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना चाहिए। श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करते हुए, मन को अपनी इंद्रियों के स्वामी (भगवान श्रीकृष्ण) में केंद्रित करना चाहिए। इस श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के अर्थ पर ध्यान देना ही वास्तविक 'ध्यान' है। यह श्लोक केवल वाणी से नहीं, अपितु हृदय की गहराई से उच्चारित होना चाहिए। जब आप 'विगतेच्छाभयक्रोधो' का उच्चारण करते हैं, तो संकल्प लें कि आप अपने भीतर के भय और क्रोध को त्याग रहे हैं। यह एक मानसिक शुद्धि की प्रक्रिया है जो साधक को धीरे-धीरे सांसारिक बंधनों से ऊपर उठाती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यतेन्द्रियइंद्रियों को वश में करने वालाबाह्य विषयों से इंद्रियों का प्रत्याहार करना।
मनोबुद्धिमन और बुद्धि को वश में करने वालासंकल्प-विकल्प करने वाले मन और निर्णय लेने वाली बुद्धि का नियंत्रण।
मुनिमननशील पुरुषजो निरंतर आत्म-चिंतन में लीन रहता है।
मोक्षपरायणःमोक्ष को ही परम लक्ष्य मानने वालाजिसका एकमात्र ध्येय जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति है।
विगतजो पूरी तरह से निकल चुका हैअतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिंताओं से मुक्ति।
इच्छाकामनाएंसांसारिक वस्तुओं के प्रति आसक्ति का अभाव।
भयडरअस्तित्व खोने या हानि होने का मानसिक संकोच।
क्रोधगुस्साइच्छाओं के अवरुद्ध होने पर उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रिया।
सदा मुक्तनित्य मुक्तजो काल और परिस्थिति से परे हो चुका है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

यह श्लोक महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन युद्ध के मैदान में अपने सगे-संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए और अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगे, तब भगवान ने उन्हें 'कर्मयोग' का मार्ग दिखाया। यह श्लोक उसी श्रृंखला की एक कड़ी है जहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि युद्ध केवल बाहर नहीं, बल्कि भीतर भी लड़ा जा रहा है।

पौराणिक संदर्भ में, 'मुनि' शब्द का अर्थ केवल मौन रहने वाला व्यक्ति नहीं है, बल्कि वह है जो 'मनन' (चिंतन) करता है। वेदों में भी ऋषियों को 'मुनि' कहा गया है, जो अपनी इंद्रियों को वश में करके ब्रह्मांड के रहस्यों को समझते थे। महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इसी प्रकार के आत्म-नियंत्रण का उपदेश दिया था। यह श्लोक हमें बताता है कि मोक्ष कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे खरीदा जा सके या किसी देवता से वरदान के रूप में प्राप्त किया जा सके। यह तो स्वयं के भीतर के 'अहंकार' को गलाने की प्रक्रिया है। जब इच्छा, भय और क्रोध का नाश होता है, तो आत्मा का स्वरूप स्वतः ही प्रकाशित हो जाता है। यह वही अवस्था है जिसे उपनिषदों में 'आत्म-साक्षात्कार' कहा गया है। भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश आज के युग में और भी प्रासंगिक है, जहाँ मनुष्य तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता के बीच जी रहा है। यह श्लोक हमें एक 'स्थिर केंद्र' प्रदान करता है, जहाँ से हम संसार को देख सकें, बिना उसमें उलझे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: नियमित जप से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  • क्रोध पर नियंत्रण: 'विगतेच्छाभयक्रोधो' का चिंतन करने से व्यक्ति के स्वभाव में सौम्यता आती है।
  • भय से मुक्ति: भविष्य की अनिश्चितताओं के प्रति डर कम होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • कर्म की शुद्धि: जब इच्छाएं कम होती हैं, तो व्यक्ति निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): साधक के चारों ओर एक शांत और सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।
  • निर्णय लेने की क्षमता: बुद्धि के शुद्ध होने से व्यक्ति सही और गलत का अंतर स्पष्ट रूप से समझ पाता है।
  • तनाव मुक्ति: सांसारिक अपेक्षाओं के बोझ से मुक्ति मिलने पर मानसिक शांति का अनुभव होता है।
  • आध्यात्मिक जागृति: यह श्लोक साधक को आत्म-ज्ञान की ओर ले जाने वाला एक मार्गदर्शक है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्करणों (गीता प्रेस गोरखपुर) और उपनिषदों के दार्शनिक सिद्धांतों के आधार पर तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत व्याख्याएं प्राचीन ऋषियों की परंपरा और आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक अनूठा संगम हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों को केवल श्लोक का अर्थ बताना नहीं, बल्कि उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। यह सामग्री पूर्णतः आध्यात्मिक शोध और शास्त्रीय अध्ययन पर आधारित है, जिसे Bhaktilok.in के विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, इस श्लोक के अनुसार 'सदा मुक्त' होने का अर्थ है कि मोक्ष इसी जीवन में, इसी शरीर में प्राप्त किया जा सकता है। जब आप अपनी इच्छाओं और भय से मुक्त हो जाते हैं, तो आप जीवित रहते हुए भी मुक्त हैं।

इंद्रियों को वश में करने का अर्थ दमन नहीं, बल्कि 'नियंत्रण' है। इंद्रियां घोड़े की तरह हैं और बुद्धि सारथी है। सारथी को घोड़ों को मारना नहीं है, बल्कि उन्हें सही दिशा में ले जाना है।

यह अभ्यास से संभव है। जब हम यह समझ लेते हैं कि आत्मा अजर-अमर है, तो भय स्वतः समाप्त हो जाता है। क्रोध तब आता है जब हमारी इच्छा पूरी नहीं होती। इच्छाओं को कम करने से क्रोध का मूल कारण ही समाप्त हो जाता है।

अवश्य। जनक जैसे राजाओं ने गृहस्थ में रहते हुए भी इस अवस्था को प्राप्त किया था। यह मन की स्थिति है, न कि बाहरी वेशभूषा की।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम अपने कार्यों के प्रति समर्पित रहें, लेकिन परिणामों के प्रति आसक्त न हों। यह हमें मानसिक तनाव से बचाकर एक संतुलित जीवन जीने की कला सिखाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है, और जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित है – ऐसा मुनि सदा के लिए मुक्त है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 28 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 28/29 97% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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