श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 29

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 22 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
भोक्तारम्
भोक्ता (स्वीकार करने वाला)
यज्ञतपसाम्
यज्ञ और तपों का
सर्वलोकमहेश्वरम्
सम्पूर्ण लोकों का महेश्वर
सुहृदम्
सुहृद (हितैषी)
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों का
ज्ञात्वा
जानकर
माम्
मुझे
शान्तिम्
शांति
ऋच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो पुरुष मुझे सम्पूर्ण यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महेश्वर, और सब प्राणियों का सुहृद (हितैषी) जान लेता है, वह शांति को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय का यह अंतिम श्लोक (श्लोक २९) न केवल एक उपदेश है, बल्कि यह मानव चेतना के उत्थान का वह सर्वोच्च शिखर है जहाँ पहुँचकर जीव को परम शांति की प्राप्ति होती है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं को तीन मुख्य स्वरूपों में परिभाषित करते हैं: यज्ञ और तप के भोक्ता, समस्त लोकों के महेश्वर, और समस्त प्राणियों के सुहृद (निस्वार्थ मित्र)।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक 'भक्ति योग' का सार है। जब एक साधक यह समझ लेता है कि इस संसार में जो कुछ भी यज्ञ, तपस्या या शुभ कर्म हो रहे हैं, उनका अंतिम गंतव्य और उपभोगकर्ता स्वयं परमात्मा हैं, तो उसके भीतर का 'अहं' स्वतः ही विलीन होने लगता है। 'सर्वलोकमहेश्वरम्' का बोध हमें यह सिखाता है कि हम किसी भी भौतिक वस्तु के स्वामी नहीं हैं, बल्कि केवल ट्रस्टी हैं। यह बोध ही वह चाबी है जो संसार के द्वंद्वों (सुख-दुःख, लाभ-हानि) से मुक्ति दिलाती है।

ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना से जोड़ता है। जब हम यह जान लेते हैं कि ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में 'सुहृद' बनकर विराजमान हैं, तो घृणा, ईर्ष्या और द्वेष के लिए कोई स्थान नहीं बचता। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है, जो हमें अशांत संसार के बीच भी आंतरिक शांति (Inner Peace) का अनुभव कराती है। यह वैदिक दर्शन का वह प्रकाश स्तंभ है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'भोक्तारं' में अनुस्वार का ध्यान रखें। 'यज्ञतपसां' में 'ज्ञ' का उच्चारण 'ज+ञ' के रूप में करें। शांत चित्त होकर, पद्मासन या सुखासन में बैठकर, नेत्र बंद करके इस श्लोक का कम से कम ११ बार मानसिक जप करना अत्यंत फलदायी माना गया है। जप के समय भगवान के उस स्वरूप का ध्यान करें जो समस्त ब्रह्मांड का पालनहार और आपका परम मित्र है। यह श्लोक गीता के पांचवें अध्याय (कर्मसंन्यास योग) की पूर्णता है, अतः इसके पाठ से कर्मों के बंधन ढीले पड़ने लगते हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
भोक्तारम्भोगने वालाईश्वर ही समस्त यज्ञों और तपस्याओं के अंतिम फल के स्वामी हैं।
यज्ञतपसाम्यज्ञ और तप कासंसार के सभी शुभ अनुष्ठान और आत्म-संयम के प्रयास।
सर्वलोकमहेश्वरम्सब लोकों का महान ईश्वरवे केवल पृथ्वी के नहीं, अपितु समस्त ब्रह्मांडों के नियंता हैं।
सुहृदम्मित्रबिना किसी स्वार्थ के प्रेम करने वाला, जो सदा कल्याण चाहता है।
सर्वभूतानाम्सभी प्राणियों काईश्वर का प्रेम किसी एक जाति या धर्म तक सीमित नहीं, अपितु सर्वव्यापी है।
ज्ञात्वाजानकरकेवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, अपितु अनुभवजन्य साक्षात्कार।
माम्मुझे (श्रीकृष्ण को)परम पुरुषोत्तम परमात्मा का साक्षात स्वरूप।
शान्तिम्शांतिवह अवस्था जहाँ कोई कामना या भय शेष न रहे।
ऋच्छतिप्राप्त करता हैसदा के लिए उस आनंदमय स्थिति में स्थित हो जाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अर्जुन के विषाद को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उच्चारित किया गया है। महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता, स्वयं में उपनिषदों का सार है। इस श्लोक का संदर्भ 'कर्मसंन्यास योग' (अध्याय ५) के समापन का है। यहाँ अर्जुन प्रश्न करते हैं कि क्या कर्म करना श्रेष्ठ है या संन्यास? भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्मफल की आसक्ति का त्याग ही वास्तविक संन्यास है।

पौराणिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक वेदों के 'पुरुष सूक्त' के उस भाव को प्रतिध्वनित करता है जहाँ ईश्वर को 'यज्ञपुरुष' कहा गया है। वेदों में कहा गया है कि 'यज्ञो वै विष्णुः' (यज्ञ ही विष्णु हैं)। अतः जो भी यज्ञ किया जाता है, वह अंततः विष्णु (श्रीकृष्ण) को ही प्राप्त होता है। जब साधक यह समझ लेता है कि उसका मित्र (सुहृद) स्वयं परमात्मा है, तो उसके जीवन में भय का अंत हो जाता है। यह वही ज्ञान है जो प्रह्लाद, ध्रुव और अर्जुन जैसे भक्तों को प्राप्त हुआ था। इतिहास गवाह है कि जिन ऋषियों ने इस सत्य को आत्मसात किया, उन्होंने ही समाधि की अवस्था प्राप्त की। यह श्लोक उपनिषदों की उस श्रुति का सार है जो कहती है—'तमेव विदित्वाति मृत्युमेति' (उन्हें जानकर ही मृत्यु के पार जाया जा सकता है)।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: निरंतर जप से मन की चंचलता कम होती है और तनाव दूर होता है।
  • अहंकार का नाश: 'भोक्तारं' के बोध से व्यक्ति का अहंकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
  • भय से मुक्ति: यह जानकर कि ईश्वर 'सुहृद' (मित्र) हैं, भविष्य की चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।
  • कर्म शुद्धि: प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित करने की भावना से कर्म बंधन कट जाते हैं।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इस श्लोक के नियमित पाठ से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य ऊर्जा का संचार होता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: ध्यान की गहराई में उतरने के लिए यह श्लोक एक शक्तिशाली मंत्र का कार्य करता है।
  • दैवीय कृपा: शरणागति का भाव जागृत होने से साधक को ईश्वर का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन महसूस होता है।
  • सद्बुद्धि का उदय: यह श्लोक अज्ञान के अंधकार को मिटाकर विवेक को जागृत करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्करणों (जैसे गीता प्रेस गोरखपुर) के भाष्य और शंकराचार्य, रामानुजाचार्य एवं मधुसूदन सरस्वती जी की टीकाओं के आधार पर तैयार किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अर्थ और भावार्थ वेदों और उपनिषदों के सिद्धांतों के अनुरूप हैं। यह सामग्री पाठकों को आध्यात्मिक पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करने के उद्देश्य से संकलित की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, गीता के श्लोक सार्वभौमिक हैं। श्रद्धा और पवित्रता के साथ कोई भी व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है।

सुहृद का अर्थ है 'सु' (अच्छा) + 'हृद' (हृदय)। यह वह मित्र है जो बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के सदैव आपका कल्याण चाहता है, जो सांसारिक मित्रों से भिन्न है।

इसका अर्थ है कि आप जो भी शुभ कार्य करते हैं, उसका अंतिम फल ईश्वर को समर्पित है। वे ही उस ऊर्जा को ग्रहण करते हैं और आपको शांति प्रदान करते हैं।

यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों के लिए है, ताकि वे अपने दैनिक कार्यों को करते हुए भी ईश्वर से जुड़े रहें और मानसिक शांति प्राप्त करें।

जब हम यह जान लेते हैं कि ईश्वर ही सब कुछ हैं, तो 'मैं' और 'मेरा' का भाव समाप्त हो जाता है। यही वह स्थिति है जहाँ शांति का उदय होता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो मुझे (कृष्ण को) सभी यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का स्वामी, और सभी प्राणियों का हितैषी मित्र जान लेता है, वह सच्ची शांति को प्राप्त होता है। यह ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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