कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – श्लोक 29
श्लोक २९ में कहा गया है कि भगवान् को यज्ञ-तपों का भोक्ता, सर्वेश्वर और सबके मित्र के रूप में जानकर मनुष्य शांति पाता है।
संस्कृत श्लोक
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् । सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९॥
bhoktāraṃ yajña-tapasāṃ sarva-loka-maheśvaram | suhṛdaṃ sarva-bhūtānāṃ jñātvā māṃ śāntim ṛcchati ||29||
पदच्छेद / शब्दार्थ
भोक्तारम्: भोक्ता (स्वीकार करने वाला); यज्ञतपसाम्: यज्ञ और तपों का; सर्वलोकमहेश्वरम्: सम्पूर्ण लोकों का महेश्वर; सुहृदम्: सुहृद (हितैषी); सर्वभूतानाम्: सब प्राणियों का; ज्ञात्वा: जानकर; माम्: मुझे; शान्तिम्: शांति; ऋच्छति: प्राप्त होता है।
हिंदी अनुवाद
जो पुरुष मुझे सम्पूर्ण यज्ञों और तपों का भोक्ता, समस्त लोकों का महेश्वर, और सब प्राणियों का सुहृद (हितैषी) जान लेता है, वह शांति को प्राप्त होता है।
English Translation
He who knows Me as the enjoyer of sacrifices and austerities, the great Lord of all worlds, and the friend of all beings, attains peace.
टीका / Commentary
यह अध्याय का अन्तिम श्लोक है। भगवान् कृष्ण स्वयं को परमेश्वर, यज्ञ-तपों के भोक्ता और सबके मित्र के रूप में प्रकट करते हैं। उन्हें इस प्रकार जानने वाला शांति को प्राप्त होता है। यह भक्ति का मार्ग है – ईश्वर को सर्वोच्च मानकर उनकी शरण में जाना।