श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 5 (कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga))

अध्याय 5 · श्लोक 6

कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 29 22 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
संन्यासः
संन्यास (कर्मों का त्याग)
तु
तो
महाबाहो
हे महाबाहो
दुःखम्
कष्टपूर्वक
आप्तुम्
प्राप्त करने में
अयोगतः
कर्मयोग के बिना
योगयुक्तः
कर्मयोग में स्थित
मुनिः
मुनि
ब्रह्म
ब्रह्म को
नचिरेण
शीघ्र ही
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! कर्मयोग के बिना (केवल) संन्यास (कर्मों का त्याग) प्राप्त करना कठिन है। किन्तु कर्मयोग में स्थित मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

संन्यासस्तु महाबाहो: श्रीमद्भगवद्गीता का गूढ़ रहस्य

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का पंचम अध्याय 'कर्मसंन्यासयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय का छठा श्लोक मानव जीवन के सबसे बड़े द्वंद्व—'कर्म' और 'संन्यास'—के बीच के सेतु को स्पष्ट करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए यह समझाते हैं कि केवल बाहरी वेशभूषा बदल लेने या कर्मों को छोड़ देने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता। वास्तविक संन्यास तो मन की उस अवस्था का नाम है, जहाँ कर्तापन का अहंकार विलीन हो जाता है।

वैदिक संस्कृति में 'संन्यास' का अर्थ पलायन नहीं, अपितु 'समर्पण' है। जब तक जीव का मन आसक्तियों, वासनाओं और कामनाओं के जाल में उलझा है, तब तक वह कर्मों का त्याग करके भी मानसिक रूप से उन्हीं में लिप्त रहता है। इसे ही 'मिथ्याचार' कहा गया है। ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि आत्मा का स्वभाव 'अकर्ता' है। जब हम योगयुक्त होकर, अर्थात परमात्मा को केंद्र में रखकर कर्म करते हैं, तो वही कर्म बंधन का कारण न बनकर मुक्ति का मार्ग बन जाता है। यह श्लोक उन साधकों के लिए एक प्रकाश स्तंभ है जो संसार में रहकर भी वैराग्य की अग्नि को प्रज्वलित रखना चाहते हैं। यह केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की वह कुंजी है जो हमें 'दुःख' के सागर से निकालकर 'ब्रह्म' की अनंत शांति में प्रवेश कराती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ॥ ६॥

पाठ विधि: इस श्लोक का पाठ प्रतिदिन ब्रह्ममुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है। सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें, अपने मन को शांत करें और फिर शुद्ध उच्चारण के साथ इस श्लोक का तीन बार पाठ करें। पाठ के उपरांत, अपने दैनिक कर्मों को 'ईश्वरार्पण' करने का संकल्प लें। यह अभ्यास धीरे-धीरे चित्त की शुद्धि करता है और साधक को निष्काम कर्म की ओर अग्रसर करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
संन्यासःत्यागकेवल कर्मों का त्याग नहीं, अपितु कामनाओं का पूर्ण विसर्जन।
महाबाहोहे महाबाहु (अर्जुन)शक्तिशाली भुजाओं वाले, अर्थात कर्म करने में समर्थ व्यक्ति।
दुःखम्कष्टदायकबिना योग के संन्यास केवल मानसिक अशांति और द्वंद्व पैदा करता है।
अयोगतःयोग के बिनापरमात्मा से संबंध जोड़े बिना किया गया त्याग निष्फल है।
योगयुक्तःयोग से युक्तजिसने अपने मन को ईश्वर में लीन कर लिया है।
मुनिःमननशील व्यक्तिजो निरंतर आत्म-चिंतन और परमात्मा के स्वरूप का ध्यान करता है।
ब्रह्मपरम सत्यवह अनंत चेतना जो सर्वत्र व्याप्त है।
नचिरेणशीघ्र हीबिना किसी देरी के, निरंतर अभ्यास से।
अधिगच्छतिप्राप्त कर लेता हैब्रह्म के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान में, जब अर्जुन अपने कर्तव्यों के प्रति विमूढ़ हो गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन के गूढ़ रहस्यों का उपदेश दिया। यह श्लोक उसी संवाद की एक कड़ी है। पौराणिक संदर्भों में, 'संन्यास' को आश्रम व्यवस्था का अंतिम चरण माना गया है, परंतु गीता का दर्शन इसे 'मन की अवस्था' के रूप में परिभाषित करता है।

वेदों में 'त्याग' को यज्ञ के समान पवित्र माना गया है। उपनिषदों में भी कहा गया है—"तेन त्यक्तेन भुंजीथाः" (त्याग के द्वारा ही भोग करो)। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि यदि तुम बिना योग के संन्यास लोगे, तो वह संन्यास नहीं, बल्कि 'पलायन' होगा। जैसे एक बालक खिलौनों को छोड़ दे पर मन में उनके प्रति आकर्षण बना रहे, तो वह दुखी ही रहेगा। ठीक वैसे ही, यदि कोई व्यक्ति संसार छोड़कर वनों में चला जाए लेकिन मन में अभी भी भोगों की इच्छा हो, तो वह 'दुःख' ही प्राप्त करेगा।

ऐतिहासिक रूप से, यह श्लोक उन सभी साधकों के लिए प्रेरणा है जो गृहस्थ जीवन में रहकर भी 'मुनि' (मननशील) बनने का प्रयास कर रहे हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्मों का त्याग करने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है 'कर्तापन के भाव' को त्यागने की। जब अर्जुन ने यह समझा, तब उन्होंने युद्ध को अपना धर्म माना और बिना किसी आसक्ति के, केवल लोक-कल्याण के लिए शस्त्र उठाए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि ब्रह्म की प्राप्ति किसी विशेष स्थान पर जाने से नहीं, बल्कि अपने कर्मों को योग की अग्नि में शुद्ध करने से होती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्थिरता: निरंतर पाठ से मन में उठने वाले व्यर्थ के विचारों का वेग कम होता है।
  • आसक्ति से मुक्ति: यह श्लोक साधक को यह बोध कराता है कि संसार की वस्तुएं क्षणभंगुर हैं, जिससे मोह कम होता है।
  • कर्मों का शुद्धिकरण: जब हम 'योगयुक्त' होकर कार्य करते हैं, तो हमारे कर्म पाप-पुण्य के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं।
  • एकाग्रता में वृद्धि: 'मुनि' शब्द का चिंतन करने से मन की एकाग्रता और ध्यान की शक्ति बढ़ती है।
  • ब्रह्म की अनुभूति: यह श्लोक साधक को भीतर की शांति से जोड़ता है, जिससे ब्रह्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • तनाव का निवारण: भविष्य की चिंता और अतीत के पछतावे से मुक्ति मिलती है, क्योंकि साधक वर्तमान में 'योग' के साथ जीता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान श्रीकृष्ण के वचनों को आत्मसात करने से साधक पर ईश्वर की विशेष कृपा बनी रहती है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): नियमित जप से व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक दिव्य तेज और शांति का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, आद्य शंकराचार्य के भाष्य और विभिन्न वैष्णव आचार्यों की टीकाओं के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अर्थ और व्याख्याएं वेदों के सार और उपनिषदों के सिद्धांतों के अनुरूप हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है ताकि वे अपने आध्यात्मिक मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, गीता के अनुसार संन्यास का अर्थ घर छोड़ना नहीं, बल्कि मन की आसक्तियों को छोड़ना है। आप गृहस्थ रहकर भी 'योगयुक्त' होकर संन्यासी का जीवन जी सकते हैं।

योगयुक्त होने का अर्थ है अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित करना और फल की इच्छा न रखना। इसे ही निष्काम कर्मयोग कहा गया है।

श्लोक में 'नचिरेण' शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है 'शीघ्र ही'। यह साधक की निष्ठा, निरंतरता और समर्पण पर निर्भर करता है।

अत्यंत प्रासंगिक है। आज के तनावपूर्ण जीवन में, जहाँ हर कोई भागदौड़ कर रहा है, यह श्लोक हमें 'कर्म' के बीच 'शांति' खोजने का मार्ग दिखाता है।

मुनि वह है जो मौन रहकर या मनन के माध्यम से आत्म-चिंतन करता है और जिसका मन परमात्मा में स्थिर हो गया है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

केवल कर्मों को त्याग देने से संन्यासी नहीं बना जा सकता। कर्मयोग द्वारा मन की शुद्धि आवश्यक है। कर्मयोगी ही सच्चे अर्थों में शीघ्र ब्रह्म को प्राप्त करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 5: कर्मसंन्यास योग (Karma Sanyans Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/29 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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